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दुनिया मेरे आगे: अपराध का अजगर

आज राजनीति हो, सामाजिक व्यवस्था हो, शैक्षिक संस्थाएं हो, धार्मिक संस्थान हो या आर्थिक व्यवस्था। या चाहे पिता द्वारा अपने ही परिवार में अपनी पत्नी और बच्चों की हत्या कर देने या नाबालिग लड़के द्वारा अपनी मां को चाकू मार देने तक की खबरें आज आम बात हो गई है।

अपराध का भाव मन में इतनी तेजी से पनपते हैं कि इसको करने वाले इसके बारे में सोचना बंद कर दिया है

लगता है अपराध के अजगर ने हमें अपनी लपेट में ले लिया है, वह राजनीति हो, सामाजिक व्यवस्था हो, शैक्षिक संस्थाएं हो, धार्मिक संस्थान हो या आर्थिक व्यवस्था। पिता द्वारा अपने ही परिवार में अपनी पत्नी और बच्चों की हत्या कर देने या नाबालिग लड़के द्वारा अपनी मां को चाकू मार देने तक की खबरें आ जाती हैं। इन घटनाओं के पीछे कोई बड़ा कारण नहीं होता। रोजमर्रा की छोटी-छोटी अनचाही स्थितियां होती हैं। परिवार जो हमारे जीवन की नींव है, जीवन का आधार होता है। वहां ऐसे अपराध! पति और पत्नी के बीच मनमुटाव, लड़ाई झगड़ा अंत में हत्या तक भी पहुंच जाता है। भाई बहन की हत्या कर देता है, क्योंकि उसने मर्जी से किसी लड़के से शादी कर ली।

ऐसी अनेक घटनाओं की खबरें आती हैं। हम सुनते हैं, देखते हैं और एक ‘खबर’ की तरह सरका देते हैं। लेकिन ये हमारे रिश्तों, संस्कारों, भावनाओं, मूल्यों और मान्यताओं की भरभरा कर गिरती इमारतें है। हमारे समय की बढ़ती हताशा, घटती सहनशीलता के अतिरिक्त आज भी वैश्विक होती संस्कृति और बाजारीकरण जैसे कई दूसरे कारण भी हैं। डिजिटल की आभासी दुनिया, मीडिया और फिल्मों में दिखाई जाने वाली हिंसा भी बड़ी वजहें हैं। इनमें बच्चे, युवा तो प्रभावित होते ही हैं, पर बड़े समझदार कहे जाने वाले लोग भी प्रभावित होते हैं।

एक पति ने एक फिल्म देख कर पत्नी को मारने की तरकीब सीखी और पत्नी की हत्या कर दी। अदालत में उसने स्वीकार भी किया। हर इंसान एक जैसा नहीं होता। उसकी प्रतिक्रिया भी ‘अपनी’ और ‘अलग’ होती है। जल्दबाज और प्रतिक्रियावादी लोग जल्दी ही आवेश में आ सकते हैं और गलत कदम उठा सकते हैं। उस समय उनको यह पता नहीं चलता जो सामने है, उससे उसका क्या रिश्ता है या इसका परिणाम क्या होगा! आज चारों ओर का माहौल भी ऐसा दिख रहा है।

हालत यह है कि आश्रम जैसी जगहों पर भी ऐसे अपराध हो रहे हैं कि कल्पना करना दुश्वार है। यौन शोषण से लेकर, आर्थिक शोषण, सामाजिक दुराचार, बाल शोषण और प्रताड़ना। आश्रमों के स्वामी दुराचारी और अपराधी सिद्ध हो रहे हैं। जेलों में सजा काट रहे हैं। हम सब जानते हैं कि आश्रमों में क्या हो रहा है! फिर भी साधारणजन अभी भी अपने विश्वास और निष्ठा के कारण या दुख में वहां जाता है, पर छला जाता है। जब तक उसे पता है कि उसके साथ क्या हुआ, बहुत देर हो चुकी होती है। वह पूरी तरह लुट चुका होता है। ऐसे में गुरुद्वारों की व्यवस्था अपवाद जैसी दिखती है। अथाह सेवा भाव, बेघरों को सहारा, निशुल्क खाना, रहना। सबके लिए, सबके प्रति एक-सा प्रेम भाव, आपदा के समय सबसे आगे खड़े, सबकी सेवा को और सहायता को तत्पर।

सामाजिक संस्थाएं, विशेष रूप से कई स्वयंसेवी संगठन, जिन्हें कई जगह से आर्थिक सहायता मिलती है, उनका उद्देश्य सामाजिक हित में हर स्तर पर समाज सेवा होता है। कई स्तरों पर ये संस्थाएं कार्यरत होती हैं। लेकिन अपराध और शोषण यहां भी अपनी जगह बना लेते हैं। शिक्षा संस्थाएं जो देश का निर्माण करती है और जिनका दायित्व है भावी पीढ़ी को शिक्षित-प्रशिक्षित करने का, वहां भी अपराध का अंधेरा घिरता दिखता है। यौन अपराध बढ़ रहे हैं।

राजनीति तो अपराधियों का अड्डा-सा हो गया है। आंकड़े कहते हैं कि तीस फीसद सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि से हैं जो किसी न किसी अपराध में लिप्त रहे। अगर ये राजनेता किसी मामले में फंस भी जाएं, तो अपने रसूख से सुरक्षित हो जाते हैं। अखबार, साहित्य, मीडिया इनकी करतूतों से भरे रहते हैं, पर इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आम नागरिक छोटी-सी चोरी के लिए सालों जेल में सड़ता है।

ऐसा लगता है कि हमारे जीवन मूल्य धसक रहे हैं। लेकिन आखिर क्यों? हमारी सांस्कृतिक-सामाजिक चेतना परंपराओं में, परमात्मा, धर्म, दुनिया मेरे आगे सांस्कृतिक मूल्यों में गहरे विश्वास और निष्ठा की है। हम पारिवारिक और सामाजिक जीव हैं। यही हमारे अस्तित्व का आधार भी है। आज बाजारीकरण और भौतिक सुख-सुविधाओं के प्रति बढ़ता लगाव हमें अपने ‘होने’ से दूर ले जा रहे हैं। इसलिए छोटी-छोटी हताशा हत्या या आत्महत्या की ओर ले जाती है।

इस अंधेरे से बाहर आने का कोई रास्ता है? हमें लौट कर जाना होगा। पारिवारिक रिश्तों में, आपसी संबंधों में! परिवार ही वह जगह है जहां भावी पीढ़ियों के जीवन मूल्य बनते हैं। हमारी परंपराएं, हमारे त्योहार, पर्व, उत्सवधर्मिता, आपसी खुशियां, होली, दिवाली। ये सभी मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती हैं। उनके बीच की दूरियों को मिटा देती है। त्योहार चाहे वर्ष में एक बार आते हैं, पर उनकी मीठी सुगंध वर्ष भर प्रतीक्षा कराती है। अगली बार आने वाले दिन की।

हालांकि यहां भी एक चिंता है त्योहारों, पर्वों, उत्सवों, उत्सवों के बाजारीकरण की। दिखावे की, जिसमें भावनाओं की अपेक्षा भौतिक दिखावा आ जाता है। पर जैसे भी इससे परे जाकर भीतरी संवेदनशीलता ही से परस्पर जुड़ना होगा। तभी नकारात्मक और हिंसात्मक प्रवृत्तियों से छुटकारा मिल सकता है। अपराध के अजगर की लपेट से मुक्ति मिल सकती है। इंसान का इंसान के साथ इंसानी रिश्ता बन सकता है। एक बार ऐसा हुआ तो अपराध के अंधेरे से मुक्ति

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