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गुम होता बचपन

सुबह की प्रकाश किरणें जब खिलती हैं, तो वातावरण प्रफुल्लित हो उठता है। पशु-पक्षियों की आवाजें हमारे कानों में गूंज उठती हैं।

Author Updated: February 18, 2021 6:24 AM
lostप्रतीकात्‍म फोटो।

अजय प्रताप तिवारी

बुजुर्ग और जवान सभी के चेहरों पर एक मुस्कुराहट शायद इसलिए कायम रहती है कि उनके सामने उम्मीदों का आकाश होता है। लोग यही सोचते हैं कि यह दिन कल से बेहतर गुजरेगा। यही वजह है कि लोग ऊर्जा से भरे होते हैं। मगर जब हमारी नजरें कुछ ऐसे नन्हे मासूम बच्चों की ओर जाती हैं, जिनके चेहरे पर मुस्कान के बजाय मायूसी छाई रहती है, तो सोचना पड़ता है। क्या किसी ने गौर किया है कि ऐसा क्यों है?

अफसोस कि किसी को इस पहलू पर गहराई से सोचने का समय नहीं है। आज हम जिस कालखंड में जी रहे हैं, वह तेजरफ्तारी का है। इस वेग और बहाव में जहां पर चीजें चाहे-अनचाहे अपने आकार में तेजी से बदलाव कर रही हैं। हमारा वातावरण, परिवेश, मानसिक स्वरूप, संकुचित होता परिवार, व्यस्त माता-पिता, समयाभाव और इसकी आभासी प्रतिपूर्ति करते साधनों पर अतिनिर्भरता के नतीजे में बचपन की एक विशेष किस्म विकसित होती जा रही है, जो बौद्धिकरूप से उन्नत, अपने अधिकारों के लिए मुखर, लेकिन आत्मकेंद्रित और अतिसंवेदनशील है।

आज तकनीक और वैज्ञानिक उन्नति की जगमगाहट के बीच बचपन यानी जीवन का स्वर्ण-काल अपनी चमक खोता जा रहा है। अक्सर देखने को मिलता है कि बच्चों में एक अजीब किस्म की विकृति जन्म ले रही है। इसके चलते वे कुछ अनपेक्षित व्यवहार और गतिविधियों के शिकार हो जाते हैं। हालांकि इन विकृतियों के शिकार होने वाले बच्चों में गांवों की अपेक्षा शहरी क्षेत्र के बच्चे ज्यादा देखने को मिलते हैं। हममें से ज्यादातर लोग ग्रामीण के बरक्स शहरी जीवन की जटिलताओं को बेहतर समझ रहे हैं।

आज अधिकतर परिवारों में देखने को मिलता है कि परवरिश का अर्थ बच्चों को सिर्फ भौतिक सुख-सुविधाएं उपलब्ध करवाना, उनकी सभी वाजिब-गैर वाजिब मांगों को पूरा करना मान लिया गया है। बच्चों द्वारा किए गए सभी वांछित या अवांछित कार्यों को उनका नैसर्गिक अधिकार समझ कर नजरअंदाज कर दिया जाता है। बच्चों की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता को समानार्थी समझ लिया गया है।

दरअसल, आज प्रतिस्पर्धा का ऐसा दौर है, जिसमें सभी अपने बच्चों को सफल होते देखना चाहते हैं। इसके लिए माता-पिता किसी भी हद तक गुजरने के लिए तैयार रहते हैं। ज्यादातर मामलों में देखने को मिलता है कि बच्चों को उनकी पसंद के हिसाब से कोई काम नहीं करने दिया जा रहा है। यहां तक कि उनके पढ़ने-लिखने की प्रणाली में माता-पिता की दखलंदाजी रहती है। उन्हें परीक्षा में अव्वल आने के लिए प्रताड़ित किया जाता है, जिसके चलते बच्चे तनावग्रस्त हो जाते हैं। इस दबाव के नतीजे में बच्चों का प्राकृतिक या स्वाभाविक विकास रुक जाता है।

बच्चों की ललक अपने हमउम्र यार-दोस्तों के साथ खुले आसमान तले खेलने की होती है। उन्हें कहानी सुनना पसंद है। कई बार वे उसका अनुसरण भी करते हैं। ऐसी कहानियां सुनाने का जिम्मा पहले दादा-दादी का होता था। बच्चों को प्रेरक प्रसंग वाली कहानियां सुनने को मिल जाती थीं और दादा-दादी का अकेलापन भी भर जाता था। अब तो खुले आसमान के बजाय बंद कमरे खेल के मैदान में तब्दील हो गए हैं, जहां टीवी के कार्टून, मोबाइल गेम और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण वाले खिलौनों ने कब्जा कर लिया है।

बची-खुची कसर महामारी ने पूरी कर दी, सबको अकेला करके। इस दौर में पूरी तरह से घरों में कैद रहने और सात-आठ घंटे आॅनलाइन पढ़ाई के दबाव ने बच्चों को मानसिक तनाव के साथ ही अवसादग्रस्त कर दिया। अब बहुत सारे बच्चे आंखों की समस्या, चिड़चिड़ापन और थकान से भरे हुए लगते हैं।

आज बच्चे ज्ञान-विज्ञान की पढ़ाई के क्षेत्र में भले अपने से बड़ी उम्र को मात दे जाएं, लेकिन मौलिकता से परे होते हैं। अधिकतर मामलों में देखने को मिलता है कि बच्चे अब समाज से खुद को अलग रखना पसंद करते हैं। यह समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। हमें आज आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों में सिद्धांत के साथ नैतिकता पर भी ध्यान दिया जाए, ताकि आगे चल कर उन्हें सामाजिक मूल्यों की पहचान करने में कोई समस्या न हो। आज के बच्चे विचारों में बहुत जल्द बह जाते हैं।

वे कई बार सही-गलत में फर्क नहीं कर पाते हैं। आगे चल कर देश और समाज को इसका खमियाजा भुगतना पड़ सकता है। बच्चे कुविचार के चलते गलत रास्ते पर न चले जाएं, इसके लिए उनके अंदर स्वस्थ और भरोसा भरने वाले प्रेरणास्पद विचार भरने की कोशिश करनी चाहिए और ज्ञान के प्रति ललक पैदा करनी चाहिए। बच्चों को चारदिवारी में बंद कर कूपमंडूक बनाने के हालात से बचने की जरूरत है।

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