प्रकृति के साथ

पिछली सदी के पांचवें दशक में लिखी गई अज्ञेय की एक कविता ‘हरी घास पर क्षण भर’ में आधुनिक व्यक्ति से हरी घास पर क्षण भर बैठने का आग्रह किया गया है।

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सांकेतिक फोटो।

अनीता यादव

पिछली सदी के पांचवें दशक में लिखी गई अज्ञेय की एक कविता ‘हरी घास पर क्षण भर’ में आधुनिक व्यक्ति से हरी घास पर क्षण भर बैठने का आग्रह किया गया है। इस आधुनिक व्यक्ति के पास हरी-भरी घास पर चैन से दो पल बैठने का वक्त नहीं। समय ने करवट ली और देखिए अब बैठने के लिए वह घास ही गायब है। चिकित्सा की तमाम पद्धतियों यानी एलोपैथ से लेकर आयुर्वेद तक हरी घास पर सुबह के समय नंगे पैर चलना आंखों की रोशनी और समूचे स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद मानते आए हैं।

आज बदले वकत में कृत्रिम घास का बोलबाला तो है जो हमें कालीन से लेकर चप्पलों तक में जड़ा हुआ मिल जाता है, लेकिन प्राकृतिक घास वाले पार्क या उद्यान परिदृश्य से गायब हैं। इक्का-दुक्का कहीं हैं भी तो वहां आम लोगों की पहुंच बंद होती जा रही है। आज हरी घास हमारे लिए महज कल्पना की चीज होती जा रही है। एक तो पार्कों में घास ही मयस्सर नहीं और अगर कहीं है तो ‘घास पर चलना मना है’ लिखित पट्टी पार्क में जगह-जगह लगी होती है। इस घास के सौंदर्य को केवल दूर से निहार सकते हैं, हाथों से स्पर्श नहीं कर सकते। घास पर बैठना प्रकृति को नजदीक से समझना और महसूस करना है, जिससे हम आज महरूम हो चुके हैं।

कुछ दिन पहले की बात है। उस दिन पार्क में घास की मशीन के जरिए कटाई चल रही थी। हरी-भरी घास के गट्ठर को माली उठा-उठा कर एक टेंपो में भर रहा था। जिज्ञासवश मैंने पूछ लिया- ‘क्या यह घास गाय-भैंसों के लिए आसपास के किसी डेरी फार्म में दी जाएगी?’ माली का जवाब सुन कर मैं चौंक गई। उसने बताया कि इस घास को गाय-भैंस को नहीं खिला सकते, क्योंकि इस घास में रसायन है। ऐसी हरी-भरी घास देख मेरे मानस परकोटे पर बचपन में देखी वे महिलाएं प्रतिबिंबित हो उठीं जो सिर पर घास का गट्ठर उठाए खेत से आती थीं। माली की बात से मन विचलित हो गया। इतनी बड़ी मात्रा में घास चारे के रूप में इस्तेमाल न होकर कूड़े के ढेर में जाएगी! घास का रंग अतिरिक्त हरा रहे और वह देखने में सुंदर लगे, केवल इसलिए कीटनाशक डाल कर घास को कूड़े के ढेर में तब्दील कर दिया जाता है। सुन कर बुरा लगा।

यह कृत्रिमता मात्र घास तक सीमित नहीं है। पार्कों में वृक्ष के नाम पर छोटे-छोटे झाड़ ही देखने को मिलते हैं जो काट-छांट कर बनाई गई कृत्रिम आकृति के कारण भले ही मन को मोह लें, लेकिन उनका यह कृत्रिम रूप उन वृक्षों का मुकाबला नहीं कर सकता, जो हमने बचपन में सड़क के किनारे किनारे लगे देखे हैं। आम, कटहल, नीम, जामुन शीशम के लंबे, गहरे और छायादार। इन विदेशी कृत्रिम झाड़ की तरह देसी वृक्षों को देखभाल की जरूरत कतई नहीं होती। मौसमी बारिश इनका एकमात्र जलस्रोत होता है। इनमें से बहुत सारे वृक्ष न केवल फल देते थे, बल्कि आने-जाने वाले राहगीर को पल भर सुस्ताने के लिए छायादार स्थली भी मुहैया कराते रहे हैं।

आज हम सौंदर्यीकरण के नाम पर वृक्षों में मात्र बौनापन पैदा कर रहे हैं। घने छायादार और फलयुक्त वृक्ष अब न तो पार्कों में दिखते हैं और न ही सड़क किनारे। आज हमें पेड़ और पौधों की विदेशी किस्में ज्यादा भाती हैं। ये किस्म भले ही दिखने में सुंदर हों, लेकिन दैनिक जीवन में किसी काम के नहीं। ऊपर से अतिरिक्त मेहनत और लागत अलग से। एक ओर हम प्रकृति में बौनापन पैदा कर रहे हैं, दूसरी ओर विकास के नाम पर लगातार प्रकृति के फेफड़े कहे जाने वाले जंगलों को काट कर प्रकृति को दोहरी क्षति पहुंचा रहे हैं। हम हजारों वृक्षों को काट कर पौधारोपण का दिखावटी आह्वान करते हैं जो मात्र तस्वीरों में सिमट कर रह जाता है। पौधारोपण का हर साल अभियान चलता है, बावजूद कितने पौधे वृक्ष रूप में विकसित होते हैं? यह एक बड़ा सवाल है।

विश्व में बढ़ती हुई महामारियां और जलवायु परिवर्तन को हम न केवल बेहद नजदीक से देख रहे हैं, आज उसकी जद में है। इससे दुखी भी हैं, लेकिन उपायों के विषय में न तो आम लोग गौर करते हैं और न सरकारें सोचना तक चाहती हैं। प्रत्येक वर्ष धू-धू कर पहाड़ के जंगल जलते हैं। इनके पीछे क्या वास्तव में मात्र गर्मी ही कारण है या व्यक्ति का स्वार्थ इन जंगलों को माचिस की तीली दिखाने का काम करता है? जांच होनी चाहिए। वन क्षेत्र निरंतर घट रहे हैं। प्राकृतिक खनिज और विकास के लिए हम प्रकृति को निरंतर नंगा कर रहे हैं, जिसका खामियाजा महामारी और पर्यावरण असंतुलन के रूप में भुगत भी रहे हैं। लेकिन निहित स्वार्थों के आगे घुटने भी टेकते रहे हैं। वैश्विक स्तर पर विभिन्न देश विभिन्न सम्मेलन आयोजित करते हैं।

सम्मेलनों में पर्यावरण के प्रति चिंता भी जाहिर होती है, लेकिन विकास के घोड़े की लगाम को जरा भी ढील नहीं देना चाहते। सुंदरलाल बहुगुणा जैसा व्यक्तित्व आज हम सबके बीच नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम सबके बीच से ऐसा पर्यावरण प्रेमी एक जुनूनी व्यक्ति उठ खड़ा हो जो अपनी सुख-सुविधा और निजी स्वार्थों को त्याग कर प्रकृति के वास्तविक सौंदर्य की सुधि ले। प्रकृति है तो हम हैं। यह मनुष्य को समझना होगा, अन्यथा समयरूपी सांप के निकल जाने पर लकीर पीटने से क्या फायदा!

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