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दुनिया मेरे आगे: संवेदना का दायरा

मोर-मोरनी का सोसाइटी के परिसर तक आ जाना बच्चों को भी प्रफुल्लित करता रहा। चारों ओर सब कुछ बंद होने और अपने लिए सुरक्षित और खुला माहौल होने की वजह से निश्चित रूप से पक्षियों को उन्मुक्त विचरण का अवसर मिला और शायद वे थोड़े निर्भीक भी हो गए। लोगों के पास भी पक्षियों को देखने, तस्वीरें लेने और उनके बारे में बातचीत करने का समय मिला।

लॉकडाउन के दौरान आबादी की ओर जाता हाथियों का झुंड। फाइल फोटाेे ।

पिछले करीब छह-सात महीने के दौरान जब दुनिया भर में सब कुछ ठप्प पड़ा तब अपने देश से लेकर अमेरिका तक में आवासीय इलाके में हिरणों के आने की तस्वीरें रोमांचित कर रही थीं। दिल्ली के भी कई इलाकों में गौरैया, मैना, तोता, कबूतर, हरियल कबूतर, पड़की, सनबर्ड, नीलकंठ, कोटूर, धनेश, फुदकी जैसे पक्षी छतों और छोटे पार्कों तक आने लगे।

मोर-मोरनी का सोसाइटी के परिसर तक आ जाना बच्चों को भी प्रफुल्लित करता रहा। चारों ओर सब कुछ बंद होने और अपने लिए सुरक्षित और खुला माहौल होने की वजह से निश्चित रूप से पक्षियों को उन्मुक्त विचरण का अवसर मिला और शायद वे थोड़े निर्भीक भी हो गए। लोगों के पास भी पक्षियों को देखने, तस्वीरें लेने और उनके बारे में बातचीत करने का समय मिला। कई लोगों ने बालकनी और छत पर पक्षियों के लिए दाना-पानी भी रखना शुरू किया। देश के अलग-अलग हिस्से में आसमान साफ होने के कारण दूर तक के मीनार, गुंबद और पहाड़ दिखने की खबरें आ रही थीं।

इसी बीच केरल से खबर आई कि वहां एक गर्भवती हथिनी की मौत हो गई है। पंद्रह साल की यह हथिनी पहली बार गर्भवती हुई थी और भोजन की तलाश में घूम रही थी। भूख की वजह से उसने अनानास देखा और खा लिया। लेकिन वह अनानास नहीं था, बल्कि उसमे विस्फोटक भरा हुआ था। इसको खाते ही विफोट हुआ और हथिनी का मुंह, जबड़ा और सूंड़ क्षतिग्रस्त हो गए। अपार पीड़ा से वह कराहती रही। मुंह में जख्म होने के कारण वह कुछ खा नहीं सकती थी। कुछ दिनों के संघर्ष के बाद अपने बचाव के लिए नदी में पानी पीने गई।

आखिर में उसी नदी में उसकी जीवन लीला समाप्त हो गई। इस चर्चित खबर ने मुझे पिछले साल कुछ हाथियों के साथ मेरी मुलाकात की याद दिला दी। तब मुझे मथुरा-आगरा रोड पर वन्यजीवों पर काम करने वाली एक संस्था के जरिए संचालित हाथियों और भालुओं के लिए बने बचाव केंद्र पर जाने का मौका मिला। वहां मैंने कुछ हाथी देखे, जिन्हें बचाया गया था। उनमे एक विशाल कद के गजराज की उम्र सत्तर वर्ष से अधिक थी। देश के एक पूर्व राजघराने ने अपनी राजकुमारी के विवाह के अवसर पर गजराज को भी ससुराल पक्ष को सौंपा था।

फिर गजराज एक मंदिर के साथ संबद्ध हो गया। दर्शनार्थी, श्रद्धावश गजराज को कुछ भी खिला देते थे। गजराज को पैरों और कूल्हे में परेशानी के चलते 2017 में महाराष्ट्र से लाया गया। वहां उसका इलाज चल रहा था। बुढ़ापे के कारण सर्दी के दिनों में उसकी मालिश की जाती है। गजराज शांत-निर्मल स्वाभाव का है और उसे नरम घास, पके फल और विशेष रूप से आम पसंद है।

हाथियों को करीब देखते हुए कई ऐसी जानकारियां मिलीं, जिस पर कभी ध्यान भी नहीं गया था। हालांकि इतना मालूम था कि पशुओं में हाथी की संवेदनशीलता को अलग तरीके से दर्ज किया जाता है। इसमें एक खास बात यह है कि वह व्यक्तियों और जगहों की पहचान को याद रखता है। मसलन, अगर आप किसी सर्कस के, तस्कर के या फिर पालतू हाथी को कहीं और ले जाते हैं तो आपको उसी महावत को साथ रखना पड़ सकता है, जिसने उस हाथी को प्रशिक्षित किया है।

दरअसल, आमतौर पर दूसरे महावत को हाथी स्वीकार नहीं करते हैं। इस पहलू ने मुझे खासा रोमांचित किया। तभी मुझे हाथियों के पसंदीदा भोजन, खेल, स्वाभाव और दिनचर्या के बारे में अहम जानकारी मिली, जिस पर गौर करने पर यह लगा कि बुद्धि के प्रयोग और संवेदना के मामले में हाथी शायद दूसरे जानवरों के मुकाबले थोड़ा अलग है।

अफसोस इस बात पर हो रहा था कि बचाव केंद्र में रखे गए हाथियों को जिस तरह हमारे मनुष्य समाज ने पीड़ित किया था, उसके बारे में मेरे लिए सोच पाना भी मुमकिन नहीं हो पा रहा था। हालांकि पीड़ा पहुंचाने के तरीके अलग-अलग थे। केरल में जहां अनानास में विस्फोटक खिला दिया गया था, वहीं कुछ लोगों ने श्रद्धा के वशीभूत होकर लोगों ने लक्ष्मी नाम की हथिनी को दुलार में मिठाई, बड़ा पाव और तैलीय पदार्थ खिला कर उसका वजन अप्रत्याशित रूप से अधिक कर दिया था।

इसे खयाल रखने के चक्कर में नुकसान पहुंचाना कह सकते हैं। यों लगातार व्यायाम करने और हरी सब्जी खाने से अब लक्ष्मी का वजन कम हो गया है। फिर भी उनकी देखभाल करने वालों के लिए यह चिंता की बात है कि पहले बढ़े वजन के कारण उसके आंतरिक अंगों पर कोई दुष्प्रभाव न पड़ा हो। हरेक पशु-पक्षी की कुदरती जरूरतें अलग-अलग होती हैं।

जंगल में अपने स्वाभाविक भोजन और जीवन-शैली से दूर होकर जब कोई पशु मनुष्य समाज के संपर्क में आता है या उसे आना पड़ता है तो उसे एक तरह से अपनी समूची प्राकृतिक बनावट और जरूरतों से समझौता करना पड़ता है। मनुष्य कभी क्रूरता की वजह से तो कभी पशु-पक्षियों के प्रति अपनी अतिरिक्त संवेदनशीलता के चलते उनके साथ ऐसा बर्ताव करता है, उसे खाने-पीने की ऐसी चीजें देता है, जो उसके सामान्य जीवन को बाधित कर देता है। बल्कि कई बार मौत के मुंह में भी धकेल देता है।

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