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मशीन कौन

अगर व्यक्ति समय से आना चाहे तो दुनिया की कोई ताकत उसे ऐसा करने से नहीं रोक सकती! व्यक्ति कितना झूठा हो गया है!

चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

वक्त का मोल समझने वाला समाज जड़ नहीं होता। लेकिन इस मामले में हमारे यहां स्थिति निराली है। कुछ दिन पहले योजना थी हिंदू कॉलेज में होने वाले नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ को देखने की। नाटक तो साढ़े बजे से शुरू होना था, लेकिन मैं सुबह करीब दस बजे ही घर से निकल गई। जो बस सीधी वहां जाती थी, उसका इंतजार करते हुए जब देर होने लगी तो दूसरी बस में सवार हो गई। बस खचाखच भरी हुई थी, धूप तेज होने लगी थी और गरमी से बस में लोगों का बुरा हाल था। मैं लगातार यही मना रही थी कि आज रास्ते में जाम न मिले और नाटक शुरू होने के समय पर पहुंच जाऊं। ऐसी ख्वाहिश कभी पूरी हो जाए तो समझिएगा कि ‘यमुना पारियों’ का पांव जमीन पर नहीं पड़ेगा। कई ‘बड़े लोगों’ द्वारा हमें इसी नाम से पुकारा जाता है, यानी जो केंद्रीय दिल्ली के हिसाब से यमुना पार के इलाकों में रहते हैं।

न जाने कितने खयाल मन में उमड़ पड़ते हैं, मसलन, क्या आज कोई वीआइपी इधर से निकलने वाले हैं, क्या आज कोई सरकारी छुट्टी का दिन है, ऑड-ईवन का फार्मूला सबने मान लिया क्या… या आज भारत-पाकिस्तान का क्रिकेट मैच है! खैर, उस दिन ऐसा कुछ भी नहीं था। लेकिन थोड़ी देर चलने के बाद बस जाम में फंस गई। करीब पंद्रह मिनट तक जब बस अपनी जगह से हिली भी नहीं, तब मैंने घड़ी देखी। आखिरकार एक बार फिर मैंने हमेशा की तरह पैदल चल कर जाम को पार करना शुरू कर दिया। तय कर लिया था कि नाटक देखने वक्त पर पहुंचूंगी। धूप, धूल, धुआं और पैदल यात्रियों की धक्कड़ के साथ ही कुछ पुरुषों ने हमेशा की तरह अपना रोजमर्रा का काम जारी रखते हुए मुझ पर दो-चार भद्दी टिप्पणियां कस दीं। आज इन्हें जवाब देने का मन नहीं किया, क्योंकि आज इन ‘छोटी-छोटी बातों’ से अपना मूड खराब न करने की एक ‘बड़ी-सी चाहत’ मैं घर से लेकर चली थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के अपने ठिकाने पर पहुंचते-पहुंचते तकरीबन साढ़े बारह बज गए। तेजी से कदम बढ़ाते हुए मैं गेट तक पहुंची लेकिन नाटक शुरू हुआ लगभग एक बजे।

मैंने वहां समय से पहुंचने की कितनी जद्दोजहद की थी! समय की पाबंदी मुझे उस समय कितना सता रही थी, जब जाम में फंसी बस में खड़ी-खड़ी सोच रही थी कि काश जाम खुल जाए, इसकी वजह से मुझे पैदल न चलना पड़े, किसी पुरुष की कोई दिन खराब कर देनी वाली फब्ती न सुननी पड़े…। कुछ दूरी का सफर कितना लंबा हो जाता है कभी-कभी!

अब नाटक शुरू होने में इतनी देर…! यह घड़ी भी कितना कुछ करती है! मेरे सारे भाव यह क्यों निर्धारित कर देती है? मशीन यह है या मैं? औद्योगिक पूंजीवादी संस्कृति ने कैसे अपनी इतनी गहरी पैठ बनाई है कि हर कोई समय की पाबंदी को एक ‘मूल्य’ बना बैठा, एक-एक मिनट की पाबंदी, एक-एक मिनट पर नजर!

बारहवीं कक्षा में अच्छे अंक आने पर मैंने जब अपने पिताजी से घड़ी दिलवाने की जिद की थी तो कभी सोचा भी नहीं था कि इसमें इतनी ताकत होती होगी कि यह मनुष्य को मशीन बना दे। घड़ी को कितना गुमान होता होगा खुद पर कि देखो कैसे ये सारे मेरी वजह से हर किसी के साथ ‘निष्पक्ष व्यवहार’ करना सीख गए हैं। देरी से आने वाला हर व्यक्ति या तो आलसी होगा या लापरवाह या कामचोर या बहानेबाज। अगर व्यक्ति समय से आना चाहे तो दुनिया की कोई ताकत उसे ऐसा करने से नहीं रोक सकती! व्यक्ति कितना झूठा हो गया है!

शायद इसी तरह की सोच होती होगी हर उस व्यक्ति की जो औद्योगिक पूंजीवाद के गहरे असर को खुद पर महसूस नहीं कर पाया है। समय का पाबंद कौन हो पाता है और कौन नहीं? क्या हर किसी के लिए समय से पहुंचने के अनुभव एक-से हो सकते हैं? समय के प्रति भी कोई संदर्भगत व्यवहार रखने की अपेक्षा कुछ खास अवसरों पर नहीं हो सकती? अक्सर अपनी पहली घड़ी के साथ, जो आज भी मैंने संभाल कर रखी है, अपने रिश्ते की व्याख्या करती हूं तो सोचती हूं कि इसे खुशी से अपनी कलाई पर बांधते वक्त लगा था- दुनिया मेरे आगे है…! आज जब हांफते हुए इसे बार-बार देखती हूं तो लगता है कि मानो यह घड़ी जोर से हंसते हुए मुझसे कहती है कि दुनिया मेरे पीछे!

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