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तोल मोल के बोल

कब बोलना है, क्या बोलना है, कहां बोलना है, किसके साथ कब नहीं बोलना, क्या नहीं बोलना और कहां नहीं बोलना है, यह भी जानना जरूरी होता है। मगर कई बार हम न तो कब बोलना जरूरी है समझ पाते हैं और न ही कब चुप रहना चाहिए। मौन रह कर सुकून पा लेना और जब सही समय आए तो पूरी ईमानदारी से सच कहना भी बहुत जरूरी होता है।

तोल मोल के बोल

स्वरांगी साने

कई बार जो चुप रहता है, उसके बारे में धारणाएं बनने लगती हैं कि या तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता या जो हो रहा है, उससे वह अनजान है। मगर मौन की स्थिति में रहना, आराम की स्थिति में रहने जैसा है। जब आप मितभाषी हो जाते हैं तो आप अपने भीतर झांकना शुरू कर देते हैं।

तमाम विचारक, दार्शनिक, संत-महंत, यही कहते हैं कि हमारी यात्रा भीतर से बाहर की ओर नहीं, बाहर से भीतर की ओर होनी चाहिए। अपने मौन की ताकत को पहचानिए। मौन रहना सीखिए और शांत हो जाइए। शांत रहेंगे तो आप प्रकृति और अपने आसपास के पर्यावरण से जुड़ पाएंगे। जो मौन की ताकत को जान लेता है, उसे जीतने की कला भी आ जाती है।

आप क्या करने वाले हैं, क्या करने जा रहे हैं, हर विचार, हर योजना को घोषित करने की आवश्यकता नहीं है। हो-हल्ला न करना कई बार बहुत कारगर होता है। मौन हो जाने पर आपकी प्रत्युत्पन्नमति जागृत हो जाती है। आप अपनी क्रिया लोगों को बताते हैं, उस पर प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है और आप अपनी क्रिया करने के बजाय, प्रतिक्रियाओं के उत्तर देने में ही उलझ जाते हैं। इससे आपके समय, शक्ति और ऊर्जा तीनों की हानि होती है। उतना ही समय आप शांत रह कर अपनी क्रिया पर और गहराई से सोच सकते हैं। गुप्त रहना, लुप्त हो जाना नहीं होता।

ध्यान-धारणा का महत्त्व केवल श्वासोच्छवास तक सीमित नहीं है, इसका अर्थ है हर पल ध्यान में रहना, हर पल मौन को धारण करना। धीरे-धीरे आपको समझ आने लगेगा कि कब बोलने का समय है और कब शांत रहने का। अपनी शांति का आनंद लीजिए। शांत रह कर खुद को मौका दीजिए उन सपनों को देखने का, जो आपको कहते हैं आकाश की सीमा हो सकती है, सपनों की नहीं। मौन रह लेंगे तो आप सचेत हो जाएंगे, जागरूक बन जाएंगे। इस बदलाव को एक मौका दीजिए, ताकि आपके जीवन में परिवर्तन आ सके। अपने भीतर पैठिए। अपने आप को देखिए।

दूसरों में क्या बदलाव लाने हैं, से बेहतर हमें खुद को कहां बदलना है यह देखना होगा। शांत रहेंगे तो आप अधिक रचनात्मक हो पाएंगे। सफलता, प्रकाश और सकारात्मकता को आप तभी देख और महसूस कर पाएंगे जब बाहरी कोलाहल से दूर होकर अपने आप को एकाग्र कर पाएंगे। मौन की ताकत आपको साहसी बनाएगी। गाड़ियों के हार्न, धुएं और उनसे आने वाली रोशनी उतनी प्रखर नहीं होती, जितनी मौन रह कर सूर्य अपनी दाहकता और रोशनी दिखा पाता है। अगर आवश्यक न हो तो बिल्कुल मत बोलिए। आपसे राय मांगी नहीं जा रही, तो दीजिए भी नहीं।

बिना मांगे राय नहीं देनी चाहिए, इस कहावत को याद रखिए। आपकी राय ठुकरा दी जाएगी, उसे अमल में नहीं लाया जाएगा, क्योंकि उसकी आवश्यकता किसी ने महसूस नहीं की है। दूसरों को राय देने के बजाय अपने आप से सलाह-मशविरा कीजिए कि आप कब और कहां चमकना चाहते हैं। आप अपने लिए तय कीजिए कि आपको अपना समय किसके साथ बिताना है, आपको अपना समय किसे देना है और अपनी असीम ऊर्जा को किस पर खर्च करना है।

अपने प्रिय लोगों के साथ जुड़िए और उनके साथ बेहतरीन पल गुजारिए। ये आपके परिवार के लोग हो सकते हैं, मित्र या रिश्तेदार हो सकते हैं। आपको अपने आप खुशी और परिपूर्णता का एहसास होने लगेगा। अपने आसपास देखिए, देखिए कि कब आप अपना आपा खो बैठते हैं और कहां आपका संतुलन चला जाता है।

अगर आप अपने आप से नहीं जुड़े हैं तो आप दूसरों से भी नहीं जुड़ पाएंगे। चमक, सफलता, आनंद और खुशी शांति में ही मिलती है। सोचिए कि आप अपने जीवन में अधिक स्थिरता और संतुलन लाने के लिए और क्या कर सकते हैं। अपनी नींव को अस्थिरता के बजाय भरोसे के आधार से मजबूत बनाइए। पहले खुद पर भरोसा करना सीखिए। अपने अवसादों को भी स्वीकार कीजिए।

हर तरह की भावनाओं को स्वीकार कीजिए, लेकिन प्रतिक्रिया देते समय दस बार सोचिए। कोई आपके साथ कितना भी गलत कर रहा हो, आप उसके चरित्र में अपने आप को मत उतारिए। वैसे तो भेदभाव करना गलत है, लेकिन जो आपको दुखी कर रहे हैं उनसे मतभेद-मनभेद करने के बजाय उनसे भेद करते हुए थोड़ी दूरी बना लीजिए। अपनी शक्ति को अपने मौन में पा लीजिए। जितना गुस्सा आ रहा हो, उतना शांत होने की कोशिश कीजिए। किसी दिन सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बनने की अपनी यात्रा भी तो करके देखिए।

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First published on: 19-11-2022 at 03:42:46 am