ताज़ा खबर
 

स्त्री के हिस्से

बहुत वक्त से उन लोगों से कुछ कहना चाहती थी जो खुद को समाज कहते हैं, जिन्हें लगता है कि स्त्रियों का जन्म सिर्फ त्याग, सेवा और बलिदान के लिए होता है।

Author Published on: April 12, 2019 3:36 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

वर्षा

बहुत वक्त से उन लोगों से कुछ कहना चाहती थी जो खुद को समाज कहते हैं, जिन्हें लगता है कि स्त्रियों का जन्म सिर्फ त्याग, सेवा और बलिदान के लिए होता है। हाल ही में अपनी मां की तेहरवीं में मैं जिस समाज में पली-बढ़ी, उसे यह कह आई हूं कि तुम औरतों का सम्मान नहीं करते, औरतों को लेकर तुम्हारी सोच संकीर्ण है, औरतों को भी वही सम्मान दो जो तुम अपने लिए चाहते हो। उनकी भावनाओं की कद्र करो। वे भी तुम्हारे जैसी ही इंसान हैं, उन्हें भी दुख होता है, तकलीफ होती है। बस इतना ही कहना चाहती थी। नहीं, कहना तो शायद मैं बहुत कुछ चाहती थी, लिखा भी बहुत कुछ था कहने के लिए, पर इतना ही कह सकी, क्योंकि मैं भी तो उस मां की ही बेटी हूं, जिसे इस बात का बहुत खयाल रहता था कि औरों का दिल न दुखे। भले ही उनके दिल का किसी ने खयाल रखा हो या न रखा हो।

बचपन से यही देखती आई कि पुरुष वही करते हैं जो उन्हें करना होता है। दूसरी ओर, औरतों को पुरुषों के हर गलत या सही निर्णय मानने ही पड़ते हैं। वे नहीं मानना चाहें, तब भी। वे चाहे भावनात्मक रूप से किसी भी स्थिति से गुजर रही हों, पर दुनिया के सामने उसे एक मुस्कुराहट के साथ ही आना चाहिए! मेरी मां की स्थिति भी ऐसी ही थी। उनकी तकलीफ देख कर मेरा मन बहुत भारी हो जाता था। हर बार यही लगता था कि अगर मेरी जगह बेटा पैदा हो जाता तो आज मेरी मां की ये स्थिति नहीं होती। मैं इस अहसास से भर उठती थी कि अपनी मां की हर तकलीफ की जिम्मेदार मैं ही हूं, क्योंकि बचपन से ही सुनती आ रही थी कि ‘इस लड़की की जगह लड़का हो जाता तो ये सब न होता जो हुआ’। यह सुन कर मैं खुद के होने पर शर्मिंदा हो जाती थी और अकेले में जाकर रोते हुए भगवान से शिकायत करती कि आपने मुझे वहां क्यों पैदा किया, जहां मेरी जरूरत ही नहीं थी! मैं अपनी मां की कसूरवार थी और मेरी मां मुझे पैदा करने की कसूरवार थी, जिसकी सजा वह ताउम्र भुगतती रही। अपनी हसरतों को पूरा करने के लिए पुरुष बल से और भावनात्मक रूप से भी एक औरत को मजबूर कर देता है। पुरुष उनके प्रति औरत की मोहब्बत और लगाव का उसी के खिलाफ इस्तेमाल करते हैं। औरत को त्याग की देवी और बलिदान की मूर्ति जैसे शब्दों के जाल में फंसा उसके नाजुक जज्बातों का फायदा उठाते हैं। जब उनका काम निकल जाता है और उन्हें जो चाहिए होता है, वह मिल जाने के बाद उस औरत के अस्तित्व का उनके लिए कोई अर्थ नहीं रह जाता। त्याग की वह देवी बलिदान की मूर्ति उनके लिए एक फालतू सामान की तरह हो जाती है, जिसकी न उसे और न उस पुरुष के परिवार को कोई जरूरत रहती है।

जब तक स्त्री यह समझ पाती है कि उसके साथ धोखा हुआ है, उसे मूर्ख बना कर उसके जीवन की हर खुशी का हरण कर लिया गया और इस सबमें बड़ी सफाई से उसे भी शामिल कर लिया गया, तब वह खुद के लिए आंसू भी बहा नहीं पाती। अपनों के हाथों ठगे जाने का दर्द हमेशा सालता है। वह जैसे सुन्न हो जाती है। अपनी मां को ऐसी सुन्न हालत में मैंने कई बार देखा है। कई बार मैं उनके लिए लड़ पड़ी तो मुझे बागी करार कर दिया गया। पुरुष अपनी हर चाहत को पूरा करना चाहता है, चाहे वह कितनी ही गलत हो, चाहे उसके साथी की जिंदगी पर उसका कुछ भी फर्क पड़े और साथ में वह यह भी चाहता है कि उसकी पत्नी उसकी हर चाहत पूरी करने में उसका साथ दे। ये कैसा एकतरफा नजरिया है, सोच है!

मैं ऐसी कई औरतों को जानती हूं, जिन्होंने अपने पति की खुशी के लिए अपनी हर खुशी की आहुति दे दी। बदले में उन्हें मिला अकेलापन, उपेक्षा, प्रताड़ना और फालतू होने का अहसास। मरते दम तक वह अपने उस प्रिय से इस उम्मीद को संजोए रही कि एक दिन वह उसके मूल्य को समझेगा। लेकिन यह उनकी भूल ही साबित होती है, क्योंकि वह शख्स अब वह नहीं रहा, क्योंकि उसका मतलब निकल गया। शरीर देखने में भले ही वही है, पर उसका मन, उसकी नीयत और उसका जमीर बदल गया है। वह छलिया छल कर चला गया। अब आपका होना उसके लिए एक समस्या से ज्यादा कुछ नहीं है। मैं बस अपनी मां के लिए यही दुआ करती हूं कि उन्हें कम से कम अब आगे वह हर खुशी मिले, जिससे वे अब तक महरूम रह गर्इं। उन्हें प्यार और सम्मान के साथ खुशियों भरा जीवन मिले।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 मेरा क्या
2 शिक्षा की सूरत
3 दुनिया मेरे आगे: आधा गिलास पानी