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बाजार में संवेदनाएं

प्रेम एक शब्द से अधिक भाव है। इसकी भाषा को हर कोई जानता है, भले ही भाषा कोई हो।

Immotionsसांकेतिक फोटो।

भावना मासीवाल

प्रेम एक शब्द से अधिक भाव है। इसकी भाषा को हर कोई जानता है, भले ही भाषा कोई हो। दरअसल, यह प्रेम ही है जो हमें सभी से जोड़ता है। फिर वह मनुष्य हो या जीव-जंतु। यही प्रेम भाव जीवन को आत्मीय और जीने योग्य बनाता है। सच यह है कि प्रेम के बिना सृष्टि की कल्पना भी संभव नहीं है। इसलिए इसे किसी खास महीने में या किसी खास दिन में समेट कर नहीं देखा जा सकता।

इस विषय पर कितनी ही लंबी-लंबी चर्चा और परिचर्चा क्यों न कर ली जाए, कितने ही बड़े-बड़े आश्वासन क्यों न दे दिए जाएं, चांद-सितारों को तोड़ कर लाने वाले ख्वाब ही क्यों न दिखा दिए जाए, अगर आपके भीतर प्रेम भाव नहीं है तो वह प्रेम नहीं, महज एक शब्द है, जिसका अपना एक बड़ा बाजार है। प्रेम को किसी खास दिन में कैद करके यह बाजार प्रेम बेचता है और हम चाहें या न चाहें, इसके खरीदने वाले भी लाखों की संख्या में हैं।

अपने समय में कबीर कहा करते थे- ‘प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय/ राजा परजा जेहि रुचै, शीश देई ले जाय’। यह प्रेम तत्त्व ऐसा है जो न कहीं उपजता है, न ही बाजार में बिकता है। फिर भी कोई प्रेमी होना चाहता है तो शीश यानी अपना सर्वस्व देकर उस प्रेम को पा सकता है। कबीर ने ऐसे व्यक्ति को ही सच्चे रूप में प्रेमी माना और उसी के हृदय में प्रेम का निवास होने की बात कही।

वहीं आज का समय इसके ठीक विपरीत की स्थितियों का है। आज प्रेम, हृदय यानी भाव से अधिक शब्द होता गया है और बाजार का केंद्र बनता गया है। व्यवहारिक स्तर पर भी प्रेम संबंधों में आत्मीयता से अधिक आवश्यकता शब्द हावी है। संबंधों में प्रेम होने की मर्यादा सार्वजनिक रूप से प्रेम करने वालों के जरिए ही उधेड़ी जा रही है।

ऐसे में ‘प्रेम’ शब्द आज शर्मिंदा होकर अदालतों के चक्कर लगा रहा है, क्योंकि प्रेम करने का दावा करने वालों ने ही कहीं प्रेम की हत्या कर दी तो कहीं आत्महत्या कर ली या किसी को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया। प्रेम को लेकर फिल्मों ने जो धारणाएं तैयार कीं, वे भी आज तक टूट नहीं पाई हैं। आज भी पुरानी पीढ़ी हो या नई पीढ़ी, उसी धारणा को जीना चाहती है। उसकी कल्पनाओं का प्यार सुखांत की अभिलाषा के साथ पूरा होता है, जबकि व्यावहारिक स्तर पर प्रेम दुखांत अधिक होता है।

हालांकि यह स्वाभाविक ही है कि हर व्यक्ति प्रेम करना चाहता है, मगर बात जब उसके खतरों और परिस्थितियों की आती है तो वह उससे लड़ना नहीं चाहता है। इसीलिए प्रतिदिन बनते हजारों प्रेम संबंधों में कुछ ही संबंध प्रेम को एक शक्ल और स्थायित्व दे पाते हैं। उसके महत्त्व और उसकी गरिमा को बनाए रख पाते हैं। वरना अधिकतर तो तलाक और कचहरी की लड़ाइयों में उलझ कर दम ही तोड़ देते हैं।

इसके बाद प्रेम फिर भाव से शब्द बन कर रह जाता है। आज के बाजार की तरह। बाजार के लिए हर वह व्यक्ति, भाव, वस्तु और विचार मूल्यवान है, जिसका बाजार मूल्य है। बाजार व्यक्ति से लेकर उसकी भावनाओं तक को बेच देता है। आज भावनाओं की खरीद-फरोख्त का भी एक बाजार हमारे बीच सक्रिय है। यह बाजार प्रेम संबंधों में कहीं डेटिंग ऐप के रूप में काम कर रहा है तो कहीं कॉल सेंटर की दुनिया का अपरिचित होकर आपकी भावनाओं से खेल रहा है।

इस उपभोक्तावादी दौर में जब सब कुछ बेचा जा रहा है तो ऐसे में मानवीय संबंध, उनकी भावनाएं और प्रेम भी बाजार का हिस्सा बन गया है, तो यह लाजिमी ही है। आज प्रेम को परिभाषित करने वाला व्यक्ति और उसका अनुभव नहीं, बल्कि बाजार है। इन दिनों बाजार में चारो ओर छाया लाल रंग प्रेम का नहीं, बल्कि प्रेम में होने का दबाव का है जो पूरी तरह बाजार से प्रभावित है।

आमतौर पर वसंत का आगमन प्रेम का महीना माना जाता है। हालांकि प्रेम न वसंत से शुरू होता है, न वसंत तक सीमित रहता है। फिर भी प्रकृति में वसंत प्रेम, मादकता, उल्लास, नव सृजन, और उमंग का द्योतक है। वसंत को प्रकृति का शृंगार भी कहा जाता है। यह वसंत प्रकृति से लेकर मनुष्य तक के भीतर में प्रेम, उल्लास और आत्मीयता का भाव पैदा करता है।

शायद इसीलिए वसंत के दौरान ही प्रेम के प्रतीक दिन भी तय कर लिए गए। हालांकि इस दिन को खास मानने वाले भी कहने को हर दिन प्रेम का मानते हैं। हमारे यहां वसंत जीवन में फिर उल्लास, उमंग और प्रकृति से लेकर मनुष्य तक को प्रेम की मादकता में समाहित कर लेने का महीना है। मगर आज न उस तरह का वसंत रहा न प्रेम, क्योंकि एक ओर मानवीय हस्तक्षेप के कारण प्रकृति निरंतर बदलाव के कारण कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रही है।

आत्मीयता, मानवता, प्रेम, सहचर्य, समभाव जैसे शब्दों से अधिक उसके भावों को जोड़ने वाली प्रकृति विलुप्त होने की कगार पर है, तो दूसरी ओर प्रेम, प्रेम में होने के कारण अदालतों के चक्कर काटता हुआ अंत में एक बेजान शब्द बन कर हमारे जीवन में घूम रहा है। अब तो वसंत और प्रेम के आगमन की सूचना या तो कैलेंडर बताता है या बाजार।

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