विचार बनाम विवेक

आजादी के लिए अंतिम महान प्रयास के रूप में किया गया ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ से बाबा साहब आंबेडकर और तेज बहादुर सप्रू सरीखे नेता अपनी असहमति जताते हुए इस आंदोलन से अलग ही रहे थे।

raksha bandhan, DTC bus service, free bus service for women in delhi, delhi bus service, raksha bandhan schemes, raksha bandhan offer, latest news, indian news
दिल्ली परिवहन निगन की बस (फाइल फोटो)

अगर हम निरंतरता की बात न करें तो दिल्ली में रहने वाला अमूमन हर शख्स यहां चलने वाली बाहरी मुद्रिका बस में कभी न कभी सफर करता ही रहता है। यह सफर आपको एकाकी विचारों की महरूम दुनिया से विविध विचारों वाले भारत की अनोखी दुनिया में थोड़ी देर के लिए ले जाती है। छोटे-से शहर के इस लंबे रास्ते में अमूमन हर पेशे, पोशाक, उम्र, भाषा के लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और इस विविधता को बनाए रखते हैं। अगर आप मोबाइल, लैपटॉप, के तकनीकी युग में एकाकी जीवन व्यतीत करने के शौकीन नहीं हैं तो आपको यह सफर गांवों की गर्म दोपहर में बरगद के पेड़ के नीचे होने वाली किसी विषय पर चर्चा-परिचर्चा में सहभागी होने का अहसास दिला सकता है। देश के सबसे बड़े चर्चा-स्थल संसद में भी आपको अपने स्वंतत्र विचारों को रखने के लिए पार्टी या विचारधारा की गलियों से होकर गुजरना पड़ता है, लेकिन यहां आप अपनी आजादी का वह अहसास कर सकते हैं, जिसमें आप अपनी रुचि के अनुसार मुद्दे के अलावा चर्चा के लिए आयु-वर्ग, सामाजिक और राजनीतिक वर्ग का चयन भी कर सकते हैं। मसलन, अगर आपको नेट-निरपेक्षता पर बात करनी है तो कॉलेज के युवाओं के बीच, गिरते-संभलते अर्थव्यवस्था पर चर्चा के लिए दफ्तर आते-जाते कर्मचारियों के बीच, मौजूदा ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा के लिए अलग-अलग राय रखने वाले वर्गों के बीच बात या बहस शुरू कर दे सकते हैं।

असल मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी का अहसास आप तब करते हैं, जब आपको अपनी समझ अनुसार आपके किसी भी आलोचनात्मक या समर्थक नजरिए के लिए प्रगति-विरोधी, जड़तावादी या राष्ट्रविरोधी जैसे हर आरोपों और उसको झेलने वाले दंश से आपके खत्म होते सफर के साथ ‘फिर कभी मिलेंगे’ जैसा अभिवादन देकर मुक्त कर दिया जाता है। किसी भी संवेदनशील मुद्दे को चर्चा के माध्यम से निष्कर्ष तक पहुंचाने के मूल में एक ऐसे सौहार्दपूर्ण वातावरण का स्थान होता है जो सभी तरह के नजरिए के प्रति सहनशील हो। इसके अभाव में निकलने वाले निष्कर्षों से ही विचारों को थोपने वाली प्रवृत्ति के बीज अंकुरित होते हैं, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण तानाशाही सोच रखने वालों का इतिहास रहा है। क्या वाकई आज विरोधी विचारों के प्रति असहनशीलता हर समय शारीरिक-मानसिक हिंसात्मक रुख ले सकती है? यह जहर हमारी ऐतिहासिक सहनशील संस्कृति के अंदर कहां तक पहुंच चुका है, इसे समझने के लिए मैं भी इस छोटी-सी दुनिया की चर्चा में अपना आलोचनात्मक रुख लेकर उतर पड़ा था।

खबरिया चैनलों के आभासी अनुभवों के विपरीत यह मुझे अंदर तक झकझोर गया। किसी भी दुर्व्यवहार और हिंसात्मक प्रतिक्रिया से अलग यह जंग महज अपनी समझ और नजरिए को बस बातों के माध्यम से ऊपर रखने तक ही सीमित रहा। मैंने इस ‘युद्ध’ को और ऊंचाई तक ले जाने के लिए अपने नजरिए को और आलोचनात्मक तल्ख टिप्पणियों से सजाते हुए जारी रखा। पर अफसोस कि विचारों के इस युद्ध ने सहनशीलता का अद्भुत परिचय देते हुए चर्चा की अपनी मर्यादा को खूबसूरती के साथ बनाए रखा। इसके बाद मन में इस सवाल के लिए और कोई कारण नहीं रह गया था कि इस छोटे-से समाज का चरित्र यहां से अलग-अलग दिशाओं में जाकर एकत्रीकरण के फलस्वरूप बने बड़े संगठित समाज का सफर तय करने के क्रम में कब कहां और कैसे बदल जाता है।

कारणों की तलाश हम अशिक्षा, ध्रुवीकरण-तुष्टिकरण की राजनीति, खबरिया चैनलों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया, किसी भी रूप में कर सकते हैं। एक महत्त्वपूर्ण कारण यह भी है कि हम अपने राष्ट्रीय आंदोलन के गौरवशाली इतिहास को व्यवसायमूलक शिक्षा पद्धति के माध्यम से देश की भावी पीढ़ी के सामने आदर्श के रूप में रख पाने में नाकाम रहे हैं। ब्रिटिश हुकूमत के साए तले विभिन्न प्रांतों के एकीकरण के बाद राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक कभी भी असहमति को विरोध का स्वरूप मान लेने की प्रवृति भारतीय इतिहास का हिस्सा नहीं रहा। असहयोग आंदोलन को चौरी-चौरा कांड के बाद महात्मा गांधी के स्थगन के निर्णय से पंडित नेहरू भी असहमत थे। वहीं उनके प्रबल समर्थक सुभाषचंद्र बोस ने तो इसे राष्ट्र का दुर्भाग्य करार दिया था।

ठीक इसी प्रकार आजादी के लिए अंतिम महान प्रयास के रूप में किया गया ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ से बाबा साहब आंबेडकर और तेज बहादुर सप्रू सरीखे नेता अपनी असहमति जताते हुए इस आंदोलन से अलग ही रहे थे। तो ऐसे में क्या आंबेडकर और सुभाषचंद्र बोस के बारे में किसी भी संदर्भ में राष्ट्रीय आंदोलन का विरोधी होने के बारे में कल्पना भी की जा सकती है? इन सब लोगों ने राष्ट्र की आजादी और प्रगति को लक्ष्य मान कर सफर को एक-दूसरे के साथ सहमत-असहमत होते हुए भी साथ तय किया। स्वतंत्रता के बाद कुछ राजनीतिक दलों ने अपने निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए एक दूसरे के साथ असहमति को अपनी सुविधा से एक खास पहचान के दुश्मन के रूप में प्रचारित करने का जो सिलसिला शुरू किया, उसका दुष्परिणाम मौजूदा संदर्भ में हर असहमति के हिंसात्मक दमन के रूप में परिलक्षित हो रहा है।

अपडेट