वे सहचर हैं हमारे

आज सुबह ही मकान की छत पर बंदरों का एक झुंड आकर बैठ गया।

सांकेतिक फोटो।

देवेश त्रिपाठी

आज सुबह ही मकान की छत पर बंदरों का एक झुंड आकर बैठ गया। उनमें कुछ बहुत गदीले और कुछ पतले शरीर के थे। उनमें कुछ बंदरिया भी थीं। जब बंदरों का झुंड इधर से उधर उछल-कूद करता था, तो उनके बच्चे अपनी मां के पेट से इस तरह चिपक जाते थे कि कितनी भी ऊंचाई से वे कूद रहे हों, छूटते नहीं थे। और कुछ भी खाते-पीते थे, उनके बच्चे भी उनके साथ उतरने लगते थे। डंडे से जब भगाया जाता, तो तेजी से भाग कर अपनी मां की गोद में छिप जाते थे, तब मां और बच्चे का वात्सल्य देखते ही बनता।

बंदरों का झुंड वैसे हमें खास प्रिय नहीं है, क्योंकि वे ज्यादा उत्पात मचाते हैं। इसलिए बंदरों से सुरक्षा के उपाय करने पड़ते हैं। शहरों और गांव में सबसे अधिक दो ही तरह के बंदर दिखाई देते हैं- लाल और काले। लाल बंदर आदमियों से बहुत डरते हैं। जब कोई उन्हें भगाने जाता है, तो वे डंडे और गुलेल देख कर ही भागने लगते हैं। काले बंदर की पूंछ बड़ी लंबी होती है। उनकी छलांग भी बहुत लंबी होती है।

कभी बंदरों की आंखों में झांक कर देखिए, वे हम मनुष्यों को बहुत ध्यान से देखते हैं। उन्हें जब भी कुछ खाने मिलता है, वे खाते समय बड़े ध्यान से हर चीज को देखते हैं। उसका परीक्षण करते हैं, तब उठाते और खाते है। बंदर बहुत चतुर होते हैं। कुछ बंदर इतने शरारती और ढीठ होते हैं कि उन्हें किसी भी डंडे और छर्रे से भगाने का भय ही नहीं रहता। वे निडर होकर आदमियों का सामना करते और उनकी तरफ झपट््टा मारने की ताक में रहते हैं। अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग बंदर के बच्चों को कैद करके उन्हें मदारी का खेल दिखाने में इस्तेमाल करते हैं। उससे जो कुछ कमाई होती है उससे अपने घर का खर्चा चलाते हैं। बंदरों को कैद करना, उन्हें चूड़ी पहनाना, साड़ी पहनाना या अन्य शृंगर प्रसाधन लगाना और भीड़ का हिस्सा बनाना वन्य जीव संरक्षण कानून के विपरीत है। इससे हमारे वन्यजीवों को हानि पहुंचती है।

उत्तर प्रदेश की आनंद नगर तहसील बंदरों के लिए विशेष तौर पर जानी जाती है। वहां से गोरखपुर की तरफ जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर बंदर घने जंगलों में रहते हैं। आने-जाने वाले अधिकांश यात्री उन्हें चना, गुड़, केला, अंगूर वगैरह खिलाते रहते हैं। जब चार पहिया में बैठने वाली यात्री खिड़की का शीशा नीचे करके केले या चना-गुड़ गाड़ी के बगल में गिराते हैं, तो बंदरों का झुंड घने जंगलों से बहुत तेजी से भाग कर उनकी तरफ आता और धीरे-धीरे करके सारे दाने खा लेता है। फिर गाड़ी के बंद शीशे पर अपने हाथ पटकने लगता है। और दाने, फल आदि मांगने लगते हैं। उनकी बार-बार इस तरह की पुकार अन्य राहगीरों को अपनी तरफ आकर्षित करती है। वे अपनी बाइक को रोक कर अपने फोन के कैमरे में कैद करने लगते हैं। शहरों में बंदरों से सुरक्षा के लिए ऊंची बाड़ वाले घर बने हैं, इसलिए उन्हें झाड़ियों, जंगलों में पत्ते आदि कुछ खाने के लिए गांव की तरफ लौटना पड़ता है।

एक बार किसी जगह आतंकवादियों द्वारा बम लगाया गया था। बंदर उसे बहुत ध्यान से देख रहे थे। जब आतंकवादी बम लगा कर और उसमें समय सेट कर के वहां से हट गए, तो बंदरों का एक झुंड वहां गया और कुतर-कुतर कर उसके पूरे तारों को चबा डाला। इस प्रकार उन्होंने बम को निष्क्रिय कर दिया। बंदर हम मनुष्यों की गतिविधियों को बहुत ध्यान से देखते हैं। उन्हें ऊंची से ऊंची इमारत पर चढ़ने और वहां से नीचे कूदने की शक्ति प्राप्त है। जब भी मनुष्य किन्ही विपरीत परिस्थितियों की ओर जाता है, तो बंदर किसी भी वंश या रूप-रंग का हो, मनुष्य का सहायक जरूर बन जाता है।

बंदर एक निर्देशक है और एक नेतृत्वकर्ता भी। जिधर उसका सबसे बड़ा दल नायक चलेगा, उसके पीछे उसका पूरा दल रहेगा। बंदरों में एकजुटता रहती है। कभी-कभी जब बंदर के किसी बच्चे को कई लोग मिल कर तंग करने लगते हैं, तब उसकी सूचना उन तक पहुंचती है। फिर न जाने कहां से इतने सारे बंदर आकर उस बच्चे को छुड़ाने के लिए जद्दोजहद करने लगते हैं। तब उनकी एकता और संघर्ष करने की क्षमता देखते ही बनती है। एक बंदर की आवाज पर बहुत सारे बंदरों का झुंड इकट्ठा हो जाना, यह शक्ति पूरे ब्रह्मांड में सिर्फ बंदरों को प्राप्त है। बंदर हमारा सहचर वन्य जीव है। उनकी रक्षा, सुरक्षा करना सभी व्यक्तियों की जीवनचर्या में शामिल होना चाहिए। वनों के रक्षार्थ, प्राणी के रक्षार्थ अगर कोई भी चालाक पशु कभी किसी व्यक्ति के काम आया है, तो वह सिर्फ और सिर्फ बंदर है। मगर विडंबना है कि हम उसे उत्पाती जीव मान कर अपने से दूर ही रखने का प्रयास करते हैं।

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