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स्वाद की संगत

किसी भी उम्र में शादी करें, लेकिन शादी के बाद के जीवन का सीखना उन तमाम तरह के सीखने से अच्छा-खासा अलग हो जाता है, जिन्हें हम शादी से पहले तक सीखते आ रहे होते हैं।

सांकेतिक फोटो।

आलोक रंजन

किसी भी उम्र में शादी करें, लेकिन शादी के बाद के जीवन का सीखना उन तमाम तरह के सीखने से अच्छा-खासा अलग हो जाता है, जिन्हें हम शादी से पहले तक सीखते आ रहे होते हैं। दरअसल, अकेले जीने वाले दो लोग साथ रहने लगें तो एक दूसरे के साथ रहने के लिए बहुत कुछ सीखना पड़ता है। मैं ठीकठाक खाना बना लेता हूं और यही वजह थी कि शादी के बाद दोनों के लिए खाना बनाने को लेकर मैं खासा उत्साहित था। शुरू-शुरू में पत्नी ने बड़े चाव से खाया, लेकिन बीतते समय के साथ उसमें कमी आती गई।

कुछ ऐसे भी लम्हे आए जब मैं उनके खा लेने के बाद प्रतिक्रिया का इंतजार करता रह जाता था। आरंभिक काल के प्रयोगों के बाद खान-पान में उस तरह के स्वाद की तलब शुरू हुई, जिसकी उन्हें आदत थी। मुख्य समस्या सब्जी को लेकर थी। उन्हें बिना रस वाली तरकारी पसंद थी और मैं टिलटिलैया का शौकीन। टिलटिलैया वह तरकारी होती है, जिसमें रस ज्यादा हो। एक दोपहर खीझ कर मैंने कह ही दिया कि आगे से सब्जी वे खुद बना लें, ताकि उन्हें जो स्वाद अपेक्षित है, वह मिल सके। निश्चित तौर पर यह ऐसी स्थिति थी, जिसे अप्रिय कहा जा सकता है।

हम दोनों के परिवार जिन समाजों में रहे, उनके पलने-बढ़ने की जगह के बीच हजार किलोमीटर से ऊपर की दूरी है। दोनों ही स्थलों के रहन-सहन और खान-पान के तरीके मुख्तलिफ हैं। लिहाजा कई बार इस तरह की स्थिति दूरी को और बढ़ाने का काम भी करती है। मैं जिस संस्था में काम करता हूं, उसमें विद्यार्थियों का आदान-प्रदान होता है। मसलन, नवीं कक्षा के बीस-पच्चीस विद्यार्थी अपने राज्य से बाहर के किसी विद्यालय जाते हैं और उस विद्यालय के उतने ही विद्यार्थी यहां आते हैं।

उत्तर प्रदेश के बलिया के विद्यार्थी केरल के एणार्कुलम आते हैं। उनके पहले कदम के साथ ही खाने को लेकर उनकी जद्दोजहद शुरू हो जाती है। एकाध फलों को छोड़ दिया जाए तो हर व्यंजन उन्हें अजीब लगता है। खाना फेंकने पर उन्हें डांट पड़ती है। अब तक मिलने वाले खाने से बिल्कुल अलग तरह का भोजन उन्हें नहीं रुचता। जो स्वाद उनके भीतर रच-बस गया, उससे इतर कुछ भी स्वीकार नहीं। यह बात मेरी पत्नी के लिए भी उतनी ही सटीक बैठती है।

मेरे माता-पिता और किशोर होने तक मेरी भी परवरिश संयुक्त परिवारों में हुई। खाने वाले लोगों की संख्या ज्यादा होने के कारण सब्जी ज्यादातर अधिक तरी वाली बनती रही। सूखी सब्जी तभी रहती, जब साथ में दाल या कोई अन्य रसदार तरकारी। रस वाली सब्जी सुभीते के लिहाज से भी मुफीद होती है। एक सब्जी बनाई और रोटी या चावल के साथ खा ली। श्रम और संसाधन दोनों की ही बचत।

‘भक्तिन’ नामक रेखाचित्र में महादेवी वर्मा भी इस तरह की स्थिति का जिक्र करती हैं। जब वे अपने और भक्तिन के परिवार की स्थिति को समझती हैं तो सुविधाओं की बात तो दूर, असुविधाएं भी छिपाने लगती हैं। परिवार के दबाव में खान-पान की उचित व्यवस्था के लिए उन्होंने ‘भक्तिन’ को रखा था और वह व्यवस्था ही जाती रही।

मेरी पत्नी की स्वाद ग्रंथियों का प्रशिक्षण उसके परिवार और आस-पड़ोस में उपलब्ध भोजन के आधार पर हुआ। स्वाभाविक है कि उनके लिए वह भोजन ज्यादा स्वादिष्ट होगा जो स्वाद में उसकी ‘मां के हाथ के खाने’ के करीब हो। एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले लोगों के साथ यही दिक्कत होती है। विरले ही होते हैं जो सर्वथा नवीन स्वाद के साथ सामंजस्य बिठा पाते हैं, वरना घर का खाना, घर जैसा खाना तलाशने की अंतहीन प्रक्रिया चलती ही रहती है। हालांकि यह आमतौर पर देखा गया है कि कुछ समय तक लगातार एक माहौल में रहने पर रहन-सहन से लेकर खान-पान तक के मामले में लोग अभ्यस्त होते हैं। इसमें रुचियां बदलती भी हैं।

खाना बनाने के मामले में अब तक का सीखना मेरे अपने घर, पड़ोस और प्रयोग करने की उत्कट लालसा के अनुरूप होता था। मैं यह मान कर चलता था कि सामने वाले को वह सब उसी तरह से अच्छा लगेगा जिस तरह से मुझे लगता है। विद्यार्थियों के मामले में जो बात मुझे सहज रूप से समझ में आ जाती थी पत्नी के मामले में देर से समझ में आई।

यों देखा जाए तो तरकारी सूखी हो या तरी वाली, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अपना बनाए हुए खाने के स्वाद की छाप जब खाने वाले के चेहरे पर दिख जाए तो वह अनुभूति बहुमूल्य होती है। उसे हासिल करने की जिद में बिल्कुल आरंभ से सीखने की कोशिश शुरू हो गई है, ताकि वह सब सीखा जा सके, जिसे पत्नी मां के हाथ के खाने जैसा कह सके। यह प्रक्रिया मुझे भी उस नए तरह के स्वाद के साथ जोड़ेगी। तब कभी जाकर स्वादों का एक सहकार स्थापित हो पाएगा, जहां एक दूसरे की खानपान की आदतों का मजाक उड़ाए बिना भोजन का लुत्फ लिया जा सके।

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