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दुनिया मेरे आगे : कहां गए वे फेरी वाले

फेरीवाले अपनी किस्म-किस्म की आवाजों और बोलियों के बहाने भाषा को समृद्ध बनाते थे। सच्चे अर्थों में वे भाषा का विकास करने वाले व्यावहारिक ‘अध्यापक’ होते थे। उनके शब्द-भंडार, वाक्य, संदर्भ और अनुच्छेद किसी प्रवाहमय सरिता का स्मरण कराती थी। वहीं शॉपिंग मॉल में पहले से रिकॉर्ड की गई सूचनाएं हमेशा एक ही रोना रोती हैं।

Author Updated: November 23, 2020 4:23 AM
Literatureहॉकर अपनी आवाज से ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करते हुए। फाइल फोटो।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

एक समय था जब फेरीवाले अपनी किस्म-किस्म की आवाजों से हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते थे। अब फेरी वालों की पेट पर लात मारने के लिए बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, बहुराष्ट्रीय कंपनियां बाजार में ऐसे उग आए हैं, जैसे बारिश के दिनों में कुकुरमुत्ते। ये कहां से और कैसे इतनी तादाद में उग आते हैं। जहां फेरीवाले अपनी ऊंची आवाज में हमें अपनी ओर बुला कर थोड़े-बहुत नफे-नुकसान के साथ सामान के बहाने प्यार बांटते थे, अब वहीं बड़े-बड़े स्टोर के स्पीकरों से निकलने वाली धीमी और भड़काऊ आवाज से दिल का भट्ठा बैठ जाता है। फेरीवालों के बिना जीवन नीरस-सा हो गया है। जिनकी यादों में फेरीवाले बसते हैं, वे बड़े सौभाग्यशाली हैं। वरना शॉपिंग मॉल में जाना, खुद सामान चुनना, खुद सामान ढोना और खुद सामान लेकर बिल काउंटर पर पहुंचना अजीब लगता है।

फेरीवाले अपनी किस्म-किस्म की आवाजों और बोलियों के बहाने भाषा को समृद्ध बनाते थे। सच्चे अर्थों में वे भाषा का विकास करने वाले व्यावहारिक ‘अध्यापक’ होते थे। उनके शब्द-भंडार, वाक्य, संदर्भ और अनुच्छेद किसी प्रवाहमय सरिता का स्मरण कराती थी। वहीं शॉपिंग मॉल में पहले से रिकॉर्ड की गई सूचनाएं हमेशा एक ही रोना रोती हैं। एक ही सूचना को बार-बार दोहराना तालाब में स्थिर दूषित जल की तरह प्रतीत होता है। वास्तव में हमने फेरीवालों को नहीं, फेरीवालों के बहाने संस्कृति, सभ्यता, परिवेश को खोया है। लॉर्ड मैकाले ने ठीक ही कहा था कि किसी देश को गुलाम बनाने के लिए उसकी भाषा और संस्कृति को छिन्न-भिन्न करना काफी होता है।

लच्छेदार, मजेदार, जानदार, शानदार और दमदार शैली में गाकर, बजा कर, सुना कर, दिखा कर, ललचा कर बेचने की कला अगर किसी में थी तो वह था फेरीवाला। क्या याद है आपको गंडेरीवाला? वही जो आकर मुहल्ले के एक कोने में बैठ जाता था। हाथ में एक सरौता लिए वह गन्ने को छील कर कपड़े पर बिछाता और सुरीली आवाज में गाकर कहता- ‘पेट का भोजन, हाथ की टेकन होंठों से छीलो, कटोरा भर शरबत पी लो।’ तो वहीं कचालू बेचने वाला बच्चों को कचालू पकड़ाता जाता और दुआएं देते हुए कहता- ‘ईश्वर का तू नन्हा बंदा, खा कचालू ओ मेरे नंदा।’ खजूर वाला आमतौर पर शाम को आता था और दलील देता- ‘कलकत्ते से मंगाई है और रेल में आई है।’

दूसरी ओर खरबूजे वाला लहक-लहक कर गाता- ‘नन्हे के अब्बा चक्कू लाना चख के लेना, फीके या मीठे सच्ची कहना।’ सबसे लाजवाब तो ककड़ियों वाला था। वह ककड़ियों को पानी से तर करता रहता- ‘लैला की अंगुलियां, मजनूं की पसलियां, तैर कर आई हैं बहते दरियाव में।’ दही के बड़े और पकौड़े वाला आता तो उसके गिर्द एक भीड़ लग जाती थी- ‘दही के बड़े, मियां-बीबी से लड़े’ और ‘खाओ पकौड़ी, बनो करोड़ी।’ पानी के बताशे यानी गोलगप्पे वाला किसी को देखता कि जुकाम हो रहा है तो कहता- ‘पानी के बताशे खाओ, नजला भगाओ।’

आनलाइन कारोबार की वजह से सबसे ज्यादा जो नुकसान हुआ है, वह इन फेरी वालों को ही हुआ है, क्योंकि वे अधिक सामान नहीं खरीद सकते, जिसकी वजह से थोक विक्रेता उन्हें थोड़े कम मुनाफे पर सामान देते हैं। वहीं दूसरी ओर आॅनलाइन विक्रेताओं की बात करें तो वे काफी अच्छी बचत पर उत्पाद को बेच हैं। आज किसी के पास अधिक वक्त न होने के कारण लोग आॅनलाइन खरीदारी करने की ही इच्छा दिखाते हैं।

फेरी वालों के पास में रियायत या छूट के ज्यादा विकल्प नहीं होते हैं और डिजाइन या नए उत्पाद भी नहीं देखने को मिलते हैं, जिसकी वजह से ग्राहक आनलाइन खरीदारी की तरफ अधिक से अधिक आकर्षित हो रहे हैं। जिसका असर सीधे-सीधे फेरीवालों पर पड़ता है। आज यही मानसिकता और चलन के कारण फेरी वाले नदारद होते जा रहे हैं। हम ब्रांडेड दुकानों पर जाकर महंगा सामान बिना मोल भाव कर खरीदने के आदी हो चुके हैं।

जो चीजें ढक कर बेची जाती है, उसे खुले में और जो चीजें खुले में बेची जानी चाहिए, उन्हें ढक कर बेचने के चलन वाले इस उल्टे जमाने में फेरी वाले का लुप्त होना अधिक आश्चर्यचकित नहीं करता। शॉपिंग मॉलों मे जाकर फल-सब्जियां भी बिना मोल-भाव के ले लेते है, लेकिन जब बात फेरि वालों की आती है तो हम हमेशा मोल-भाव करते हैं। हम भूल जाते हैं कि कुछ खुशियों के साथ मोल-भाव नहीं करना चाहिए।

अब न वे फेरी वाले रहे और न उनकी तुकबंदियों वाली फेरियां। अब तो शॉपिंग माल में कंप्यूटरीकृत आवाज में अंग्रेजी भाषा में एक ही ध्वनि निकलती रहती है कि ‘कृपया ध्यान दीजिए… हमारे पास आलू पर छूट है… इतने आलू खरीदें… इतने पैसे बचाएं… यह छूट केवल बारह बजे तक है..!’ इस तरह की सूचना मनुष्य को यंत्र बनाती है। संवेदनाओं को नेस्तनाबूद करती है। यांत्रिक खरीदारी के बहाने हम द्वीप बन जाते हैं, जहां एक ग्राहक का दूसरे ग्राहक से कोई संबंध नहीं होता। फेरी वाले के यहां सामान के साथ मानवता, प्रेम, अपनापन, दुख-सुख बांटने का बहाना मिलता था। अब यह सब लापता हो गए हैं। न जाने कहां गए वे फेरी वाले!

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