इंसान की खोज

एक जमाना था जब पति-पत्नी अपने रिश्ते घर की चारदिवारी के भीतर खुशी-खुशी बिताया करते थे। जिंदगी दिन के उजाले की तरह चमचमाती थी।

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सांकेतिक फोटो।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

एक जमाना था जब पति-पत्नी अपने रिश्ते घर की चारदिवारी के भीतर खुशी-खुशी बिताया करते थे। जिंदगी दिन के उजाले की तरह चमचमाती थी। अब सब कुछ बदलता जा रहा है। दांपत्य जीवन की छोटी-छोटी बातें गली-मुहल्लों से होते हुए समाचार-पत्रों, टीवी चैनलों की सुर्खियां बनती जा रही हैं। वहीं दिन-सा चमचमाने वाला जीवन अंधेरे की काल कोठरियों में बंद होता जा रहा है। मनुष्य अपने व्यक्तित्व के लिए जाना जाता है। अफसोस कि लोग व्यक्तित्व का अर्थ मात्र शारीरिक सौंदर्य समझ कर उसे व्यायाम तक सीमित कर देते हैं। व्यक्तित्व का अंग्रेजी अर्थ ‘पर्सनालिटी’ है।

यह शब्द ग्रीक भाषा के ‘पसोर्ना’ शब्द से उद्घृत है, जिसका अर्थ मुखौटा है। यहां हर कोई व्यक्तित्व का मुखौटा पहने हुए है। इसका मतलब शायद यह भी कि जितने भी रिश्ते-नाते हैं, यह सब मुखौटे हैं। इन्हें पहन कर हम जीवन का निर्वाह करते हैं। इन मुखौटों के साथ निर्वाह करने के लिए शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और नैतिक रूप से स्वस्थ रहना पड़ता है। रिश्ते-नाते में बंध कर रहने वाला व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझता है। यह मुखौटा न केवल उठने-बैठने, खाने-पीने, आने-जाने, बातचीत करने का शऊर देता है, बल्कि दूसरों की भावनाओं का आदर करने के प्रति प्रेरित भी करता है।

एक समय था जब परिवार में किसी पर मुसीबत आन पड़ती थी तो परिवार के सभी सदस्य आगे बढ़ कर धीरज बांधते, सहारा देते, रुपए-पैसों की मदद करते, अपना सब कुछ दांव पर लगा देते। देखते ही देखते परिवार की संरचना बदल गई। संयुक्त परिवार बदलते-बदलते और सिमटते हुए आज एकल परिवार बन गए हैं। धीरज बंधाना तो दूर, फोन बंद कर ‘आउट आॅफ कवरेज एरिया’ हो जाते हैं। सहारा देने की जगह खुद को बेसहारा बताते है। रुपए-पैसों की मदद के बारे में पूछिए ही मत।

यही तो इस जमाने की सबसे बड़ी विडंबना है। इसी के चलते अब लोगों की जुबान पर एक ही कथन रह-रह कर दोहराया जाता है- बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया। अब परिवार के सदस्यों में पहले जैसी बात नहीं रही। वे अपना सब कुछ दांव पर लगाना तो दूर सामने वाले का कुछ छीन न लें, यही गनीमत समझिए। इस बीच इस दौर में आपस में दूरी बरतने के संदेश ने व्यक्ति और समाज की संरचना को कैसा शक्ल दे दिया है, यह सभी जान और झेल रहे हैं, लेकिन किसी से कह नहीं पा रहे हैं। न किसी के दुख में शामिल हो पाना, न अपने दुख में किसी का साथ हासिल हो पाना!

पहले पेट पालने के लिए मेहनत करते थे। अब खाए हुए भोजन को पचाने के लिए मेहनत करते हैं। पहले बीमार व्यक्ति फल-फूल और दूध का सेवन कर ठीक हो जाता था, अब वही पैसे लगा कर दवाइयां, सूई आदि खरीद कर खुद को ठीक करने के नाम पर उल्टे बीमारी की दुकान बनाता जा रहा है। आज की तरह सुविधाएं न होने पर भी पहले के लोग व्यायाम करके अपने शरीर को एकदम स्वस्थ और दुरुस्त रखते थे। अब ऐसा नहीं रहा। एक समय था जब वैद्य घर-घर घूम कर लोगों की दवा-दारू किया करता था और फीस की तो पूछिए ही मत। जो दे दें, वह ले लेता था। अब लोग अस्पतालों और डॉक्टरों के पास चक्कर लगा-लगा कर रुपया-पैसा पानी की तरह बहाते नजर आते हैं।

अगर रुपया-पैसा बहा कर कुछ फायदा मिल जाता तो कोई बात न थी। त्रासदी देखिए कि आॅपरेशन कामयाब हो रहा है और मरीज की मौत होती जा रही है। वे दिन भी क्या दिन थे, जब दस किलोमीटर पैदल चल कर, मात्र कुछ रुपए का टिकट खरीद कर सिनेमा देखा करते थे। अब घर के पास सिनेमा हॉल है, लेकिन देखने का कीमत हजार रुपए हो गई है। पहले किसी से उधार लेना पाप-सा लगता था, अब उधार का नाम क्रेडिट कार्ड हो गया है। क्रेडिट कार्ड जिसके पास होता है, उसका समाज में मान-सम्मान बढ़ गया है। पहले की नैतिकताएं आज पाताल में धंस गई हैं और आज के पाप एवरेस्ट की ऊंचाई से सौ गुना बढ़ गए हैं। यह इंसान का उत्थान है या पतन, यह निजी तौर पर आंका जा सकता है।

जीवन की आपाधापी में समय कब गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता। सब अपने में लगे हैं। स्वार्थ के मोहजाल से घिरे पड़े हैं। उनमें खुद से पहले दूसरों के हित के बारे में सोचने, त्याग करने, मिल बैठ कर बांटने की प्रेरणा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। सच यह भी है कि इन सबके बावजूद कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो हमेशा याद किए जाते हैं। वे इंसान होने का सच्चा दायित्व निभाते हैं।

ऐसे लोग समाज की चिंता में दिन-रात मोमबत्ती की तरह जलते रहते हैं। अपने आस-पड़ोस, समाज की सहायता करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। जीवन में कभी न कभी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए इन चुनौतियों को किसी भी सूरत में छोड़ना नहीं चाहिए। इंसान हैं तो इंसान से प्यार करना सीखा जाए। मानव जीवन अनमोल है, मानवता ही उसका सच्चा मोल है। हमें धर्म, जात-पात आदि भेदभाव से उठ कर मानवता की सेवा करनी चाहिए।

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