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दुनिया मेरे आगे: खालीपन की मुश्किल

मशीन और कल-कारखानों के कारण लोगों की निर्भरता एक-दूसरे पर कम हुई है। ऐसे में सामाजिकता की भावना का लोप होना स्वाभाविक है। एक जमाना था जब गांव में लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में खड़े होते थे।

crisisबेरोजगारी को दर्शाता ग्राफ।

चंदन कुमार चौधरी

एक समय था जब गांव के लोग दिन-रात अपने खेत-खलिहान और दूसरे काम-धंधे में व्यस्त रहते थे। महिला-पुरुष से लेकर बच्चे तक हर इंसान सृजन और सकारात्मक काम में लगे रहते थे। बहुत कम लोग खाली वक्त गुजारते थे। हालांकि बच्चों के काम करने को बहुत आदर्श स्थिति नहीं कहा जा सकता है, उसका विश्लेषण तत्कालीन समाज और उसके भिन्न वर्गों के सामने खड़ी चुनौतियों के संदर्भ में किया जा सकता है। बहरहाल, समय के साथ ऐसा लगता है जैसे भारत के ग्रामीण समाज में बहुत कुछ बदल गया है।

कुछ समय पहले गांव से लौटने के बाद ऐसा लगा, मानो देश के ग्रामीण इलाकों में काम की कमी हो गई है। मौजूदा दौर में देश और विश्व जिस तरह के हालात का सामना कर रहा है, उसमें यह एक स्वाभाविक अंजाम है, लेकिन अतीत की यादों के साथ इस पक्ष पर ध्यान जाना स्वाभाविक था।

दरअसल, ग्रामीण समाज में खेती के काम में लगातार गिरावट आती गई है। ऐसे में खेती-किसानी पर निर्भर लोगों की व्यस्तता कम हो गई है। दूसरे काम-धंधे और रोजगार की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। इसलिए स्वाभाविक ही है कि लोग अब खाली रहने और पर्याप्त समय मिलने के कारण नकारात्मक बातों और काम में शामिल होंगे।

थोड़ा करीब से देखने पर समझ में आता है कि गांव के लोग, खासतौर पर युवा वर्ग बेरोजगारी से हारता जा रहा है। यह परिवर्तन अब सूक्ष्म नहीं रह गया है, जिसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। बल्कि कोई भी इंसान अब इसे स्पष्ट रूप से देख सकता है। खाली रहने के कारण उनमें निराशा, ईर्ष्या और द्वेष की भावना ज्यादा बढ़ गई है।

कहा भी गया है- ‘खाली मन शैतान का’। शायद उसी का प्रभाव लगता है। गांव में लोग आमतौर पर दूसरों की शिकायत करते मिल जाएंगे। समाज में एक आम धारणा बनती जा रही है कि गांव के बेरोजगार युवा खाना तो अपने घर में खाते हैं, लेकिन सोचते दूसरों के बारे में हैं। इसका कारण युवाओं का खाली रहना और उनके पास काम-धंधा नहीं रहना है।

एक ओर शहरों में लोगों के पास समय का इस कदर अभाव रहता है कि एक दूसरे से मिलना और बात करना भी मुश्किल होता है। वहीं गांव में एक वर्ग के पास काफी समय रहता है। ऐसा लगता है कि सदुपयोग करने के बजाय वे इस समय का दुरुपयोग ज्यादा करते हैं। यही वजह है कि गांवों में लड़ाई-झगड़े के मामले बढ़ते जा रहे हैं और मुकदमों की संख्या बढ़ती जा रही है।

अब तक दर्ज होने वाले मुकदमों में भूमि विवाद के मामले ज्यादा होते थे, अब आपसी रंजिश और दूसरे अपराधों तक के मामले बढ़ रहे हैं। ये मामले खाली रहने के कारण छोटी खुराफातों से शुरू होता है और गंभीर अपराधों तक पहुंच जाता है।

गांव में बहुत कम लोग मिलेंगे जो कहेंगे कि बेरोजगार रहने वाले लोगों की खुराफात के कारण उन्हें परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा हो। अभाव और खालीपन के लगातार स्थिर रहने की वजह से लोगों में आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति में काफी कमी आई है। कामकाज और व्यस्तता के ठिकानों पर रहने वाले लोग जहां आगे बढ़ने और हमेशा नई चीजें सीखने के लिए उत्साहित नजर आते हैं, वहीं बेरोजगार और खाली लोगों में इन बातों का अभाव नजर आता है।

निराश मन से बुझे युवकों की आकांक्षा और उम्मीद सो गई लगती है। अपनी काबिलियत और ऊर्जा के उपयोग के अवसर की संभावनाएं खत्म या सीमित होने की हालत में बेहतरीन प्रतिभाएं इसी तरह कुंद हो जाती हैं।

एक समय था जब गांव को काफी मजबूत और आत्मनिर्भर माना जाता था। हालांकि अब स्पष्ट रूप से यह दिखने लगा है कि गांव कमजोर होने लगे हैं और वहां लोग दूसरों की सहायता पर निर्भर होते जा रहे हैं। हम मशीनों और आधुनिकीकरण का चाहे जिस तरह समर्थन कर लें, लेकिन यह भी हकीकत है कि बड़ी तादाद में लोगों को बेरोजगार बनाने में मशीनों का कम योगदान नहीं है।

मशीन और कल-कारखानों के कारण लोगों की निर्भरता एक-दूसरे पर कम हुई है। ऐसे में सामाजिकता की भावना का लोप होना स्वाभाविक है। एक जमाना था जब गांव में लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में खड़े होते थे। आज यह भावना कहीं गायब-सी हो गई है। इसकी जगह पर लोगों के मन में एक-दूसरे के प्रति दुर्भावना आ गई है और सामाजिकता का पतन हो रहा है।

निश्चित रूप से गांव में पनप रही इन समस्याओं का कारण अधिकतर लोगों का खालीपन है। अगर लोगों के पास रोजगार होता और वे अपने काम-धंधे में लगे रहते तो शायद आज गावों में नजर आने वाली समस्याएं बहुत अधिक नहीं होतीं।

लोग अपने कामकाज में लगे होते तो उन्हें दूसरों के बारे में सोचने का समय नहीं मिलता और वे नकारात्मक काम में कम शामिल हो पाते। देश के गांवों को उनके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता। उसके सर्वांगीण विकास के लिए नीति निमार्ताओं के साथ-साथ समाज के हर वर्ग को सामने आना होगा और काम करना होगा। देश का विकास तभी संभव है जब ग्रामीण भारत का स्वरूप बदलेगा।

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