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दुनिया मेरे आगेः स्वार्थ के संबंध

यह सही है कि बहुत कम लोग स्वार्थ से ऊपर होते हैं। हालांकि दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने अपने स्वार्थ को किनारे कर मानवता, प्रेम, स्नेह, मित्रता, भाईचारा, रक्त संबंधों, सगे-संबंधियों और परिजनों का खयाल रखा है।

Author July 9, 2018 3:21 AM
हमारे देश में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ एक महान सीख सदियों से चली आ रही है। यह सीख मानवता का मूल मंत्र है, इसमें पूरे विश्व को परिवार मानने का भाव है।

चंदन कुमार चौधरी

यह सही है कि बहुत कम लोग स्वार्थ से ऊपर होते हैं। हालांकि दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने अपने स्वार्थ को किनारे कर मानवता, प्रेम, स्नेह, मित्रता, भाईचारा, रक्त संबंधों, सगे-संबंधियों और परिजनों का खयाल रखा है। लेकिन हाल के दिनों में समाज में इसमें काफी गिरावट देखने को मिल रही है और ऐसा लगता है कि कुछ लोग अपने निहित स्वार्थों के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। इंसान थोड़े-से लाभ के लिए भी दूसरे को नुकसान पहुंचाने से बाज नहीं आ रहा है। बल्कि कई बार तो यह भी देखा जा रहा है कि दूसरे को भरपूर नुकसान पहुंचाने के लिए अगर अपना भी थोड़ा-बहुत नुकसान हो जाए तो वह नहीं हिचक रहा है।

कुछ समय पहले वाराणसी से एक खबर आई, जिसके मुताबिक पांच भाइयों ने अपनी मां को मिलने वाली पेंशन के लालच में उसकी मौत के बाद उसके शव को पांच महीने तक घर में छिपा कर रखा। इस परिवार ने पड़ोसियों को बताया कि मां कोमा में हैं। असलियत का पता तब चला जब पड़ोसियों ने घर से अजीब तरह की दुर्गंध की जानकारी पुलिस को दी। यह समझना मुश्किल है कि इन बेटों से यह सब कर पाना कैसे संभव हुआ होगा! मां और संतान के बीच के रिश्ते की संवेदना के पहलुओं पर विचार की बात ही क्या की जाए, अगर समाज में इस तरह की घटनाएं सामने आने लगें तो सोचना पड़ता है कि ऐसे लोगों में मानवीयता कैसे खत्म हुई होगी!

पहले के जमाने में गांव-समाज में लोग इस बात का खयाल रखते थे कि पड़ोस में कोई आदमी भूखा तो नहीं रह गया। अगर भनक लगती थी तो लोग अपने घर से खाना ले जाकर उसे खिलाते थे। लेकिन आज की तारीख में लोगों के पास अपना काम छोड़ दूसरों की तकलीफों-समस्याओं के बारे में सोचने का समय ही नहीं रह गया है। गांव अपने आप में एक पूरा समाज हुआ करता था। लोगों की एक-दूसरे पर निर्भरता थी। हर तरह के लोग सौहार्द के साथ रहते थे, एक-दूसरे के सुख-दुख में हाथ बंटाते थे। एक-दूसरे के यहां होने वाले आयोजनों या सामाजिक गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। अब यह सब देखने को नहीं मिलता। अगर कहीं यह सब होता हुआ दिखता भी है तो इसमें महज औपचारिकता भर रह गई है।

हमारी दादी ईश्वर से कहती थीं कि सबके बच्चों का खयाल रखिए… साथ ही हमारे बच्चों का भी। लेकिन क्या अब कोई ऐसे सोचेगा? अब तो लोगों को लगता है कि हमारे बाल-बच्चे ठीक रहें, दूसरे का चाहे जो हो! मैंने खा लिया बस इतना ही रहे। बाकी ने खाया, नहीं खाया, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा लगता है जैसे हमारे आसपास ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ की भावना कमजोर हुई है। र्इंट-पत्थर और लोहे से बनी चारदिवारी तो आंखों से नजर आती है, लेकिन लोगों के मन के भीतर चौड़ी हुई दरारें नजर नहीं आ रही हैं। यह चारदिवारी काफी ऊंची हुई है और लोग पहले के मुकाबले अधिक संकीर्ण हो गए हैं।

हमारे देश में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ एक महान सीख सदियों से चली आ रही है। यह सीख मानवता का मूल मंत्र है, इसमें पूरे विश्व को परिवार मानने का भाव है। लेकिन अब यह गुजरे जमाने की बात हो गई है। जबकि पहले समाज में दूसरे की खुशी को अपनी खुशी माना जाता था। कुछ मिला तो बांट कर खा लिया। मां अपने बेटे के लिए रख देती थी और बेटा उसमें से थोड़ा मां को खिला देता था। पहले अगर समाज में कोई अपराध करता था तो उसे बहुत खराब नजर से देखा जाता था, लेकिन अब ऐसे लोगों को लेकर सहज होने लगे हैं। अगर कोई सीधे-सादे तरीके से और ईमानदारी से अपना जीवन जीता है तो लोग उसे बुद्धू समझते हैं।

याद किया जा सकता है कि पहले लोग अपने विरोधियों के गुणों की भी कद्र करते थे। अब इसके ठीक विपरीत हो रहा है। पहले लोग अपने विरोधियों को कमजोर करने तक सीमित रहते थे, लेकिन अब उन्हें मटियामेट करने पर तुले रहते हैं। आखिर हम इतने संवेदनहीन, असहनशील क्यों होते जा रहे हैं। ऐसे में कई बार लगता है कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है और हम किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं! पता नहीं, समाज में यह किस तरह का समय आ गया है कि आज ज्यादातर लोग स्वार्थ की अंधी दौड़ में लगे हुए दिखते हैं। ऐसा लगता है कि पूरे कुएं के पानी में ही भांग मिल गया है और इसे सामाजिक स्वीकृति मिल गई है। इस सब के बावजूद यह सवाल अपनी जगह कायम है कि प्रेम और सौहार्द के साथ जीने के लिए मनुष्य के पास सभ्य और संवेदनशील होने के सिवा और रास्ता क्या है!

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