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दुनिया मेरे आगे: एकांगी दृष्टि

हममें से बहुत कम लोग व्यक्तियों, घटनाओं और विचारों को समग्रता से देख, परख और समझ पाते हैं।

Author Updated: February 16, 2021 7:35 AM
generationसांकेतिक फोटो।

अनिल त्रिवेदी

देश के लोगों, घटनाओं और विचारों के मूल्यांकन में भी हम सबका अधिकांश, बहुत कृपणदृष्टि और एकांगी सोच-समझ वाले मनुष्यों की बिरादरी की तरह हो गया है। हममें से अधिकतर लोग हर छोटी-मोटी बात का श्रेय खुद लेना चाहते हैं और निजी तथा सार्वजनिक जीवन में खामियों, त्रुटियों, कमियों के लिए अन्यों को जिम्मेदार ठहराने में अतिशय उतावलापन बरतते हैं।

इस कारण हममें से ज्यादातर की समझ, सोच और जीवन-दृष्टि इतनी गहरी दार्शनिक विरासत वाले मानव समाज की होने पर भी व्यापक न होकर अपने आसपास ही चलती रहती है। इसकी परिणति इतनी विराट दुनिया और जिंदगी ‘मैं’ और ‘मेरे’ की संकीर्णता में सिमट गई है। नतीजतन, हमारा समूचा जीवन क्रम एक विशाल दुनिया में छोटी-सी ‘मेरी दुनिया’ में बदल जाता है।

भौतिक और शारीरिक रूप में या हम सबके बाहरी स्वरूप में दुनिया भर के मनुष्यों में कमोबेश समानता है। थोड़ा-बहुत शरीर के वजन, चेहरे-मोहरे और लंबाई-चौड़ाई में अंतर होता है। पर सोचने की दृष्टि और विचारों की व्यापकता में हम सबमें आकाश-पाताल का अंतर हो जाता है। कभी-कभी कुछ विचार बिंदुओं में मेल हो जाता है। हम सबके मन में आर्थिक और वैचारिक संपन्नता-विपन्नता का विरोधाभास होता है।

यह भी होता है कि न तो हम संपन्न हों, न विपन्न हों, केवल सहज मनुष्य हों। है, जबकी वैचारिक संपन्नता आंतरिक। महज मनुष्य होना हमारा मूल स्वरूप है। आज भी पुरातन काल के मुकाबले देखने और सोआर्थिक संपन्नता हमारा बाहरी स्वरूप चने में कोई विशेष बदलाव हम सबमें महसूस नहीं होता।

जैसे जो लोग इस दुनिया को संवारने में उत्पादन और निर्माण के कामों में निरंतर कई पीढ़ियों से लगे हैं, वे वैसे ही आज भी लगे हैं। ऐसे मेहनतकश लोग बिना बोले मेहनत करते-करते इस दुनिया से चले जाते हैं, पर हम ऐसे लोगों को मजदूर के रूप में ही जानते हैं, उनसे मजदूरों की तरह ही व्यवहार करते हैं।

हर तरह से हुनरमंद मजदूरों के बिना दुनिया का कोई काम चलना संभव नहीं है, उसके बाद भी हम सब मजदूरों को मजदूर से ज्यादा हैसियत या सम्मान देने की जरूरत नहीं समझते। दुनिया भर में निरंतर श्रम करने वाले सनातन काल से अनाम ही रहते हैं। कोई उनके योगदान को कभी भूले-भटके भी मनुष्य की गौरवगाथा के रूप में कहता या गाता नहीं है। फिर भी दुनिया भर का मजदूर, कारीगर, किसान और खेतिहर मजदूर मौन साधक की तरह अपने काम को निरंतर करते रहते हैं।

मान-सम्मान और अपमान- ये मनुष्य मन की ऐसी स्थितियां हैं, जो हम सबके मन में छिपे घनघोर विरोधाभासों को खुले रूप मे उजागर करती हैं। अपने लिए मान-सम्मान की निरंतर चाहत और मेहनतकश की मेहनत को मान न देना या अपमान करना मनुष्य मन की ऐसी खोट है, जो हम सबको कचोटती रहती है। इस तरह मेहनतकश उत्पादक लोगों की अनवरत शक्ति का दोहन करने की हम सबमें चाहत निरंतर होती है, पर ऐसे मौन साधकों को प्रणाम करने की इच्छा भूले-भटके भी मन में नहीं आती। यह हम सबकी दृष्टि और मूल्यांकन के एकांगीपन को उजागर करता है।

हम सबको अच्छी सड़कें, मकान, बड़े-बड़े बांध, पुल और निर्माण बहुत अच्छे लगते हैं, पर यह सारा निर्माण करने वाले लोग हमेशा हमारी दृष्टि में कमजोर वर्ग के लोग ही रहते हैं। ‘काम करने वाला कमजोर और बात करने वाला सिरमौर’। यह सोच की समदृष्टि नहीं समझी या मानी जा सकती। भेदभावमूलक विचार हम सबको अपनाने में झिझक नहीं लगती और समभाव को आजीवन मानना अपनाना कठिन लगता है।

क्या सोच-समझ, विचार-व्यवहार, दृष्टि में मनुष्य को सबके प्रति समभाव रखना संभव नहीं है? या असमानता को अपनाने में हममें से ज्यादातर आनंद की अनुभूति होती है! शायद इसी से विशाल मानव समाज असमानता का आदी हो चला है। मानव समाज में दर्शन के रूप में महज बातचीत तक समत्व की बात होती है, पर हम सबका रोजमर्रा का आचरण और व्यवहार असमानता की अमरबेल की तरह है, जो हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन का अविभाज्य अंग हो गया है।

हमारे दर्शन, विधान, संविधान और आदर्श में प्राणी-मात्र के साथ एकरूपता और समभाव को स्वीकार किया है। पर हममें से ज्यादातर इसे मानने और अंगीकृत करने के बाद भी व्यवहार में लाने के आदी नहीं हैं। हम सबको अपनी इस सोच और व्यवहार से आमतौर पर आपत्ति भी नहीं होती, मन नहीं कचोटता। फिर भी हम सबकी यह हिम्मत नहीं होती कि असमानता के गुण गाएं या असमानता को जीवन, समाज और देश-दुनिया का आदर्श मान्य करें। आदर्श, सिद्धांत, विधान, संविधान में सुविचारित चिंतन, मनन, अध्ययन और सहमति के बाद भी रोजमर्रा का हमारा व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन आपस में इस विरोधाभास को अपने जीवन में क्यों अपनाए हुए है? यह वह बड़ा सवाल है, जो हम हल नहीं करना चाहते।

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