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दुनिया मेरे आगेः माटी का स्वाद

बड़ी लंबी कहानी है मिट्टी के पात्रों और पानी की। जब घरों में फ्रिज नहीं थे और अभी भी सब घरों में फ्रिज कहां हैं- तो क्या अमीर और क्या गरीब-गुरबा, मिट्टी के पात्रों में ही पानी भर कर ‘ठंडा पानी’ पीते थे गरमी में। ‘फिल्टर वाटर’, ‘मिनरल वाटर’ तब अनजानी चीजें थीं।

Author Published on: July 10, 2020 2:03 AM
हमारे देश के कुंभकार ने मिट्टी के पात्रों को विभिन्न अंचलों में बड़े सुंदर आकार भी दिए हैं।

प्रयाग शुक्ल

हमारे देश में मिट्टी के बर्तनों और पानी के बीच बड़ा गहरा संबंध रहा है। लाखों घरों में इन्हीं में भर कर पानी उपयोग के लिए रखा जाता रहा है। पीने के लिए वह परोसा जाता रहा है, सभी मनुष्यों, पशुओं और पक्षियों को। भोजन-पकाने, मुंह-हाथ धोने आदि के काम आता रहा है। बर्तनों के उपयोग का संकेत उनके आकारों से भी मिल जाता है। उन्हीं आकारों के अनुरूप बहुतेरे बर्तनों का नामकरण भी हुआ है। घड़ा, मटका, मटकी, कलश, कलशी, सुराही, कसोरा, कुल्हड़ आदि की याद इस सिलसिले में तत्काल हो आती है। इनके समानार्थी या पर्यायवाची शब्दों की कमी भी नहीं रही है। सो घड़ा, घट, कलश और कुंभ भी है।

वस्तुओं के नामों से भाषाएं समृद्ध होती रही हैं। हमारी हिंदी भी मिट्टी के पात्रों के नामों से समृद्ध हुई है। जो चीजें रोजमर्रा व्यवहार में आती हैं, स्वभावत: वे अत्यंत परिचित और आत्मीय तक हो आती हैं। घड़ा या घट इन्हीं में से है, जिसमें नदियों, सरोवरों, कुओं और नलकों, ट्यूबवेलों से भी पानी भरा जाता रहा है। घट और पनघट के इर्द-गिर्द कहानियां-कविताएं भी बुनी गई हैं। कुछ प्रदेश तो ऐसे रहे हैं, जहां घट-पनघट की बड़ी व्याप्ति रही है। यह अकारण नहीं है कि रवींद्रनाथ ठाकुर के यहां बंगाल का परिदृश्य अक्सर घट-पनघट के साथ ही आया है- कई अर्थों और रूपों को व्यंजित करता हुआ।

अपनी एक कविता में वे लिखते हैं- ‘देर न कर अब, छाया उतरी/ चलें, घाट पर घट भर लाएं, चल री, चल री/ सांध्य गगन को करता आकुल, यह कल कल स्वर/ बुला रहा वह मुझको पथ पर; यह किसका सुर’! हां, स्त्रियां एक अनुष्ठान की तरह गांवों में घाट और पनघट से जल लाती रही हैं। क्रमश: घाट-पनघट के मिट्टी के पात्रों के रूप सामाजिक, दार्शनिक, तात्त्विक, आध्यात्मिक रूप ग्रहण करते गए हैं। वे हमारे मानस में बस गए हैं। घाट-पनघट के यही रूप लोकोक्तियों और मुहावरों में प्रकट हुए हैं- ‘घाट-घाट का पानी पीना’ इन्हीं में से एक है।

‘घट’ के साथ वाली छवियों का अंत नहीं है। सिर पर घड़ा रखे आती हुई स्त्रियां, किसी पेड़ के नीचे पथिकों के लिए रखी हुई मटकी, मटकों-मटकियों वाला घर का वह कोना- सब ऐसी ही छवियों में शामिल हैं। माटी के बर्तनों की वह छवि कितनी मर्मभरी, सुंदर, और मुग्धकारी हैं, जिसमें कोई चिड़िया उड़ती हुई आती है और पानी से भरे हुए मिट्टी के पात्र से पानी पीती है।

बड़ी लंबी कहानी है मिट्टी के पात्रों और पानी की। जब घरों में फ्रिज नहीं थे और अभी भी सब घरों में फ्रिज कहां हैं- तो क्या अमीर और क्या गरीब-गुरबा, मिट्टी के पात्रों में ही पानी भर कर ‘ठंडा पानी’ पीते थे गरमी में। ‘फिल्टर वाटर’, ‘मिनरल वाटर’ तब अनजानी चीजें थीं। घड़े का पानी अपने आप में ‘फिल्टर वाटर’ हुआ करता था। चाहे वह कहीं से भर कर लाया गया हो, कुएं, सरोवर या नदी से, क्योंकि तब इनका जल भी स्वच्छ हुआ करता था। कुएं तो मीठे पानी वाले भी होते थे। हमारे देश के कुंभकार ने मिट्टी के पात्रों को विभिन्न अंचलों में बड़े सुंदर आकार भी दिए हैं। उन्हें चित्रित किया है, सजाया है। याद कीजिए, कच्छ, गुजरात के मिट्टी के पात्रों को। कितनी सुंदर बनती हैं वहां माटी की थालियां भी। और कुल्हड़ ही क्यों, माटी के वे छोटे-छोटे गिलास भी तो अपने संवरे हुए रूप में मन लुभा लेते हैं। पानी हो, चाय हो, ठंडाई हो, इन गिलासों में मानों पेय का स्वाद और बढ़ जाता है।

निश्चय ही गरमी में मिट्टी के पात्रों की कुछ बहार अभी भी दिखाई पड़ती है। पर जब आज से सत्तर वर्ष पहले के अपने बचपन को याद करता हूं तो वहां मिट्टी के पात्रों का ही एक बड़ा संसार दिखता है। हांडी में गरम किए गए दूध की बात ही और होती थी। कई चीजें मिट्टी के ही किसी पात्र में बनाई-पकाई रखी जाती थी। और मिट्टी के घड़ों-सुराहियों में रखे उस पानी के स्वाद को कहां भूला हूं। हां, पानी का स्वाद भी पात्र के अनुसार बदलता है।

जो भी हो, जहां बहुत सारी चीजें अतीत की बिला गई हैं, वहां यह देख कर कुछ तसल्ली होती है कि मिट्टी के पात्रों की कुछ वापसी तो हुई है- भले ही एक ‘फैशन’ की तरह। फिरनी और खीर के लिए तो माटी का पात्र ही सदा से अच्छा माना जाता रहा है, पर कुछ लोग अब घर में फ्रिज होने के बावजूद गरमी में प्यास बुझाने के लिए घड़े, सुराही, मटके आदि रखने लगे हैं। कई वैवाहिक अनुष्ठानों में भी मिट्टी के पात्रों की वापसी देख रहा हूं।

ठीक ही यह मानते हैं कि ‘कोविड-19’ ने हमारी दृष्टि में कई बदलाव किए हैं। पर क्या पर्यावरण संबंधी वे (दृष्टि) बदलाव टिकाऊ साबित होंगे? आएं पानी के गिलास, कुल्हड़ फिर उपयोग में। फिलहाल तो ये पंक्तियां लिखते हुए स्मृति-स्वाद से पानी के उस स्वाद को कुछ तो वापस पा ही रहा हूं जो बरसों-बरस मुझे मिट्टी के घड़ों-मटकों-सुराहियों से मिला है।

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