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दुनिया मेरे आगे: मत काटो ये पेड़

बात केवल परंपरागत त्योहारों की नहीं है। अब आदिवासी ठीक ही सचेत हुए हैं कि जंगल तो उनसे छिन ही रहे हैं, अब गांव और उसके आसपास के पेड़ भी अगर छिन गए तो उनका जीवन कितना उजाड़, कितना बेरंग हो जाएगा! फिर पेड़ की हरियाली केवल देखने के लिए तो होती नहीं है। पेड़ तो जीवन-साथी हैं। शाल के पेड़ भी कितने पुराने होते हैं! पेड़ तो फल-फूल देता है। छाया देता है। काठ देता है। न जाने क्या-क्या बनाने के लिए!

पेड़ों की कटाई से पर्यावरण संकट। फाइल फोटो।

प्रयाग शुक्ल

पेड़ों के काटे जाने की खबरें कहीं न कहीं से आती रहती हैं। और इस तरह हरी-भरी लगने वाली उपयोगी भूमियों को उजाड़े जाने का सिलसिला जारी है। हाल ही में एक सचित्र खबर देखने को मिली कि बस्तर के आदिवासी पेड़ों के काटे जाने के विरुद्ध एकजुट होकर एक कतार में खड़े थे पेड़ों के आगे, कि हम पेड़ों को कटने नहीं देंगे। चित्र देखकर एक जमाना पहले के अद्भुत ‘चिपको आंदोलन’ की याद आई, जिसमें पहाड़ों पर महिलाएं पेड़ों से चिपक कर खड़ी हो गई थीं, यह कहते हुए कि ‘ठेकेदारो पहले हमें काटो, फिर पेड़ों को काटना’! तो क्या कुछ भी नहीं बदला? नहीं, बदला तो है। पेड़ लगाने का सिलसिला जारी है और कर्नाटक की उस बूढ़ी महिला को सारा देश सलाम कर चुका है, जो नंगे पांवों राष्ट्रपति भवन में अपना पद्मश्री अलंकरण लेने आई थी। उसे यह अलंकरण इसलिए मिला कि उसने हजारों की संख्या में पेड़ लगाए हैं।

फिर यह भी कहना पड़ता है कि जितने वे लगाए जा रहे हैं, उतने ही काटे भी जा रहे हैं। कब, कहां जाकर यह सिलसिला रुकेगा? हम जानते हैं कि मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों में भी पेड़ किसी न किसी न किसी बहाने से काटे गए हैं। आंधी-पानी, तूफानी घटनाएं भी होती रहती हैं, जो बड़े-बड़े पेड़ गिरा जाती हैं। कुछ अरसा पहले कोलकाता में ‘अम्फन’ ने न जाने कितने पुराने पेड़ गिरा दिए। उनकी भरपाई क्या आसानी से हो सकती है? बस्तर की खबर यह भी बताती है कि आदिवासी अब कम होते पेड़ों को किसी त्योहार के मौके पर होने वाले आयोजनों और उसके लिए बनाए जाने वाले रथ के लिए काटे जाने पर सहमत नहीं हैं। हां, था एक जमाना जब पेड़ों की बहुतायत थी और उनके कुछ कम हो जाने पर जंगल या हरी भूमि उदास नहीं हो जाती थी। पर अब जमीन उदास हो जाती है। हमने उत्तर प्रदेश के अपने फतेहपुर जिले के गांव में जैसी हरियाली देखी थी पेड़-पौधों की, वह अब कहां नजर आती है!

बात केवल परंपरागत त्योहारों की नहीं है। अब आदिवासी ठीक ही सचेत हुए हैं कि जंगल तो उनसे छिन ही रहे हैं, अब गांव और उसके आसपास के पेड़ भी अगर छिन गए तो उनका जीवन कितना उजाड़, कितना बेरंग हो जाएगा! फिर पेड़ की हरियाली केवल देखने के लिए तो होती नहीं है। पेड़ तो जीवन-साथी हैं। शाल के पेड़ भी कितने पुराने होते हैं! पेड़ तो फल-फूल देता है। छाया देता है। काठ देता है। न जाने क्या-क्या बनाने के लिए! रथ, बैलगाड़ी, तांगा, इक्का, नाव आदि उसी से बनते आए हैं। खिड़की, दरवाजे, पलंग, कुर्सियां, सीढ़ियां— याद करते चले जाइए, और भी कितना कुछ याद आएगा! आलमारी, काठ के बक्से, पीढ़े, खेती-किसानी के भी कई उपकरणों की सामग्री पेड़ से ही तो मिलती आई है। लिखने के कागज के लिए भी पेड़ की ही शरण ली गई है। संगीत के कई वाद्य उसके बिना संभव कहां थे!

यों भी पेड़ शरणदाता हैं। पथिकों, बटोहियों, सामान्य जनों— किसी भी राह चलते के लिए। मानो वह अपनी जगह रुका और खड़ा रहा है। ठीक ही लोक गीतों में संस्कृत ग्रंथों से लेकर आधुनिक काल तक अनेक भाषाओं में, उसे तरह-तरह से याद किया गया है। श्रीधरदास कृत ‘सदुक्तिकर्णामृत’ के राधावल्लभ त्रिपाठी द्वारा किए गए हिंदी अनुवाद की किताब में दर्ज ये पंक्तियां संस्कृत के एक अज्ञात कवि ने न जाने कब लिखी थीं- ‘यह जो तुम देते रहते हो छाया भरपूर/ जो फलों से करते हो चित्त को प्रसन्न/ जो तुम झुकते हो, जो तुम ऊपर उठते हो/ जो तुम मार्ग के चौराहे पर खड़े हुए हो/ जो दूर-दूर तक के बटोही करते रहते हैं तुम्हारी स्तुति/ तो हे धरती के बेटे/ हर बटोही/ आना चाहता है विश्राम के लिए तुम्हारे ही पास।’ अब अगर डेढ़ सौ साल पुराना कोई शाल वृक्ष हो तो जाहिर है कि आदिवासी-ग्रामवासी उससे तो और भी ज्यादा बिछुड़ना नहीं चाहते होंगे।

पेड़ों की कटाई की वजह से न जाने कितनी जगहों में बाढ़ का खतरा और बढ़ा है। हां, वे प्रहरी हैं, पेड़, रक्षक हैं। सिर्फ हमारे नहीं, पाखियों के, मधुमाखियों के, तितलियों-भौरों के। उनसे ही भरती है हवा में सुगंध, जब फल पकते हैं। जब मंजरियां आती हैं। महुआ टपकता है। और हरसिंगार जैसे पेड़- उनसे झर-झर… झरते हैं फूल। कर देता है पलाश दिशाओं को लाल। कर देता है रंगभरा दिशाओं को गुलमोहर। सेमल से उड़ते हैं रुई के फाहे। जितना ही याद करें, सिर्फ स्मृति से मन में आ जाता है कुछ तो हरापन, कुछ तो मोहक-मधुर। जैसा कि इस समय इन पंक्तियों को लिखते हुए मुझे हो रहा है बोध, हरेपन का, मोहक और मधुर का। किनारा नदी का हो या सरोवर का या झील का, कब वह अच्छा लगा है बिना किसी वृक्ष या वृक्षों के! पेड़ हमारे लिए रहे हैं देव-स्वरूप भी, सखा सरीखे भी। वे बने हैं झूला, कितनी ही बार, मन में भरते हुए एक उमंग… एक तरंग।

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