ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः बदलाव की बयार

महिलाओं के प्रति पुरुषों के व्यवहार के मसले पर ‘मी टू’ मुहिम में जिस तरह कई क्षेत्रों से जुड़े संभ्रांत और जानी-मानी हस्तियों पर आरोप की खबरें आर्इं, वह अपने आप में इस बात का उदाहरण है कि पर्दे के पीछे कैसी तकलीफें दबी रही हैं।

Author October 22, 2018 3:02 AM
प्रतीकात्मक चित्र

चंद्रकुमार

महिलाओं के प्रति पुरुषों के व्यवहार के मसले पर ‘मी टू’ मुहिम में जिस तरह कई क्षेत्रों से जुड़े संभ्रांत और जानी-मानी हस्तियों पर आरोप की खबरें आर्इं, वह अपने आप में इस बात का उदाहरण है कि पर्दे के पीछे कैसी तकलीफें दबी रही हैं। हालांकि फिलहाल ये आरोप ही हैं और उनकी जांच बाकी है। लेकिन जिस तरह से महिलाओं ने आपबीती बयान की है, उसने हमारे सामने एक आईना रखा है। समाज और परंपराओं से जुड़े जिस मानस के बीच हम रहते हैं, उसमें एक महिला अपने शोषण के बारे में कोई बात सार्वजनिक रूप से बताने से पहले हजार बार सोचती है, इस जोखिम के साथ कि उस पर हमेशा के लिए कोई खास पहचान जबरन चस्पां कर दिया जा सकता है। बहरहाल, अपने चरम पर पहुंचने से पहले ही इस मुहिम की खामियों, समय-काल और मंतव्य पर कई तरह से चर्चा की जाने लगी है। हर कोई अपने नजरिए से महिलाओं के साथ हुई यौन उत्पीड़न-शोषण की घटनाओं की विवेचना कर रहा है। कुछ लोग दबे स्वर में इसे एक गैरजरूरी प्रक्रम करार दे रहे हैं, शायद इसलिए कि जिन पर आरोप हैं वे हमारे तथाकथित संभ्रात समूह से आते हैं। इसे खुल कर समर्थन देने से पहले भी सभी तोल-मोल कर बोल रहे हैं।

अमूमन सभी आंदोलन सड़क के रास्ते संसद में पहुंचते हैं। लेकिन यह मुहिम, जो हमारे देश में अभी अपने शैशव काल में ही है, एक अत्याधुनिक माध्यम सोशल मीडिया के जरिए चारों ओर फैली है। देर से ही सही, लेकिन समाज के विभिन्न तबकों का समर्थन इस मुहिम को मिल रहा है। देश में महिलाओं की स्थिति और उनकी उलझनों पर चिंतन के लिए इससे बेहतर कोई और समय नहीं हो सकता। यहां हमें उन सभी महिलाओं के हौसले को नमन करना चाहिए, जिन्होंने इसके जोखिम की परवाह किए बिना पुरुष-प्रधान व्यवस्था की इस व्याधि को ललकारा है। जब महिलाओं के यौन उत्पीड़न का मुद्दा सामाजिक रूप से स्वीकार्य हो गया है तो फिर उनकी सुरक्षा और उनके सम्मान के लिए जितने भी प्रयास हो सकें, हमें अभी से करने होंगे। चकाचौंध की दुनिया और महानगरों से आगे समूचे भारतीय समाज में वह माहौल होना चाहिए, जहां महिलाएं खुल कर अपनी बात कह सकें और सम्मानपूर्वक रह सके। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा महज सरकारी आयोजनों में ही सिमट कर न रह जाए, इसलिए हमें बेटियों के हक और सम्मान के लिए ठोस उपाय करने होंगे।

इस मुहिम ने उस आम राय को भी ध्वस्त किया है जो मध्यम और कमजोर तबके की महिलाओं को ही यौन उत्पीड़न का शिकार मानती आई है। सोशल मीडिया पर जिन महिलाओं ने अपने साथ हुए उत्पीड़न को साझा किया, अमूमन वे सभी सक्षम, शहरी, पढ़ी-लिखी और कामकाजी महिलाएं हैं। दरअसल, देश में महिला होना अभिशाप जैसा ही है, फिर चाहे वे किसी भी तबके से आती हों। पुरुष मानसिकता समाज में उन्हें बराबरी का हक देना ही नहीं चाहती, बल्कि ताकत, रसूख, धन-बल और हैसियत के दबदबे से उन्हें कुचल देना भी चाहती है। सार्वजनिक जगहों पर शारीरिक शोषण के साथ ही जिन मानसिक यातनाओं से एक महिला को गुजरना पड़ता है, वह हमारे समाज को शर्मसार कर देने वाला है, लेकिन इस पर सोचना लोगों को जरूरी नहीं लगता।

एक ओर आजकल डिजिटल क्रांति को महिला सशक्तीकरण का महत्त्वपूर्ण कारक माना जा रहा है, वहीं चिंता की वजह यह है कि सूचना तकनीक के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं भी बड़ी तादाद में उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं। कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा और यौन उत्पीड़न के खिलाफ कड़े कानून के बावजूद निजी क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं की सुरक्षा के गंभीर उपायों में भारी कमी दिखती है। लोकलाज और नौकरी पर जोखिम के दबाव में ज्यादातर महिलाएं अपने उत्पीड़न की शिकायत तक नहीं कर पातीं। बल्कि निजी क्षेत्रों में ऐसे कई मामले दबा दिए जाते हैं और कालातंर में उल्टे पीड़ित महिला ही उपहास का पात्र बनती है। कोई महिला कब तक ऐसी परिस्थितियों का सामना कर पाएगी?

यह बेबसी न केवल उनके सम्मान को ठेस पहुंचाती है, बल्कि उनकी क्षमता पर भी बुरा प्रभाव छोड़ती है। निजी क्षेत्र के ऐसे तमाम संस्थान हैं, जहां शिकायत सुनने के लिए समिति तक गठित नहीं होती और न ही पीड़ितों को उचित मार्गदर्शन मिलता है। जबकि कानूनन सभी संस्थानों को महिला उत्पीड़न के मामलों की सालाना रिपोर्ट भी जमा करानी होती है। लेकिन सरकारों से यह अपेक्षा करना बेमानी ही होगा कि वे कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा और सम्मान के लिए बने कानून पर सख्ती से अमल सुनिश्चित करे। इस बहती बयार में हमें अपने मन-मस्तिष्क की खिड़कियां खोलनी होगी। महिलाओं को उनका हक मिले और वे सम्मान से अपना जीवन निर्वहन कर सके, इसके लिए वातावरण तैयार करना होगा। नए भारत के निर्माण में इतना सहयोग तो हम कर ही सकते हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App