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बची हुई उम्मीदें

कुछ रोज पहले भयंकर आंधी चली तब आमों के पेड़ों से कुछ कच्चे आम धरती पर टपक पड़े। वहीं अधिक कच्चे आम डालियों पर मजबूती से झूलते रहे।

Mangoसांकेतिक फोटो।

संगीता कुमारी

कुछ रोज पहले भयंकर आंधी चली तब आमों के पेड़ों से कुछ कच्चे आम धरती पर टपक पड़े। वहीं अधिक कच्चे आम डालियों पर मजबूती से झूलते रहे। शायद इस धैर्य के साथ की यह आंधी कभी तो रुकेगी। प्रकृति में व्याप्त सभी चीजों की आयु निर्धारित है, इसलिए वह आम हो या आम लोग, सभी अपनी यात्रा करके न जाने किस लोक की यात्रा करते हैं। मरना कोई नहीं चाहता! समय से पहले कोई भी अपने अस्तित्व को नष्ट नहीं करना चाहता!

आम का अचार बनाने के लिए कच्चे आमों का पेड़ से तोड़ना उसका सम्मान है, मगर इस प्रकार भीषण आंधी से नीचे गिर जाना! महामारी से अचानक मरने वालों की संख्या में आई बढ़ोतरी बेहद दुख पहुंचाने वाली बात है। ऐसा लग रहा है जैसे कि मानव जाति के पास अपने अस्तित्व को बचाने के अलावा कोई और दूसरा कार्य बचा ही नहीं है। गरीबों को तो सरकार अनाज और रुपए दे रही है, फिर भी उनका भविष्य अधर में है। मगर मध्यवर्गीय लोग पहले से ही अपनी जमा पूंजी खा रहे थे, इस विश्वास के साथ कि अब सब सामान्य हो जाएगा। मगर ऐसा हो नहीं रहा है। बढ़ते कोरोना के मामलों ने एक बार फिर देश की जनता और सरकार को चिंता में डाल दिया है।

लोग चाह कर भी घरों से बाहर कोरोना के भय से नहीं निकल पा रहे हैं। क्या बूढ़े, क्या बच्चे, कमाने और नौकरी की तलाश करने वाले, सभी लोग घरों में बंद होकर केवल अपनी जान बचाने में लगे हुए हैं। पढ़े-लिखे युवाओं की बढ़ती आबादी कुंठित होती जा रही है। अधिकतर सरकारी या निजी संस्थाएं नाममात्र की रह गई हैं, जिनमें नई भर्ती न करके दैनिक वेतन भोगी पर लोगों से काम लिया जा रहा है। वहां शोषण का ऐसा बोलबाला है कि कोई जुबान खोले तो उसे सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। कारण, एक अनार लाख बीमार!

वर्तमान सामाजिक परिवेश पर जब हम नजर डालते हैं तब दुख, विपदा के अलावा कुछ भी नहीं पाते हैं। माना कि अचानक आई विपदा ने सभी की सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, शारीरिक और भावानात्मक कमर तोड़ दी है, फिर भी एक पल को सोचें तो क्या हम इतने कमजोर हो चुके हैं कि मरीजों को अस्पतालों में भर्ती भी नहीं कर सकते हैं? तमाम मरीज इलाज के लिए तरस कर मर रहे हैं। अनेक तो अस्पतालों के बाहर ही दम तोड़ रहे हैं। यह हाल तब है, जब अधिकतर आबादी अपना इलाज घर पर ही कर रही है। दिल्ली देश की राजधानी का ही हाल जब इतना बेहाल है तब सोच कर भी दहशत होती है कि पूरे देश और गांवों-कस्बों का कितना बुरा हाल होगा! मेरा भारत महान का नारा आज देश की चरमराई व्यवस्था को देख कर देश के नेताओं को आईना दिखा रहा रहा है।

सच तो यह है कि इस महामारी से व्याप्त अव्यवस्था ने व्यवस्था की पोल खोल दी है। हमने चाहे कितनी भी तरक्की की हो, मगर प्रकृति को दूषित करके मनुष्य को सांसें नहीं दे सकते। एक साल से ज्यादा होने को आ रहा है, हम अभी तक संक्रमण के कम होने के बजाय और ज्यादा भयंकर रूप से फैलते हुए देख रहे हैं। अजीब लगता है! क्या इन सब अव्यवस्थाओं के लिए सिर्फ महामारी जिम्मेदार है या हमारी सरकारों की अस्पतालों के प्रति लापरवाही?

वर्षों से हरे-भरे पेड़ों की जड़ों में ही मट्ठा डाल दिया हो, तब पेड़ क्या खाक जीवित बचेंगे! अस्पतालों की सुविधा देश की आबादी के अनुपात में होनी चाहिए, मगर हमारे यहां तो देश की आबादी विस्फोट नेताओं के भ्रष्टाचार की तुलना में बढ़ती गई, मगर चिकित्सा सुविधा में ईमानदारी की जरा-सी भी सुगंध नहीं मिली। प्रकृति की शुद्ध हवा को दूषित करने के लिए हम तरक्की के प्लास्टिक, मोबाइल कूड़े को भर-भर कर जो जलाते हैं, तो क्या उससे हवा दूषित नहीं होती!

जीने की बुनियाद हवा-पानी को ही हमने प्रदूषित कर डाला है। जिस देश में गंगा जैसी पवित्र नदी हो, वहां की जनता खरीद कर पानी पीए, आरओ फिल्टर करके पानी पीए, तो वह दिन दूर नहीं जब घर-घर आॅक्सीजन सिलेंडर सांस लेने के लिए खरीदना होगा! हमें प्रकृति को दूषित करने वाले सभी विकास कार्यों और जीवनशैली से सचेत हो जाना चाहिए, क्योंकि गांव से शहर, देश से विदेश जाया जा सकता है, मगर इस पृथ्वी से जीते जी कहां किस पृथ्वी पर जाएंगे?

बहरहाल, हमें इस विपरीत परिस्थिति में धैर्य से काम लेना ही होगा। बचाव के तमाम साधनों और उपायों को लेकर ज्यादा सचेत होना पड़ेगा। जनसंपर्क का धर्म मोबाइल से ही निभाना होगा, नहीं तो हालात में सुधार की उम्मीद धराशायी हो सकती है। कई बार यह लगता है कि सब कुछ तबाह हो जाते दिखते इस दौर में से निकल कर हम किसी नए युग में प्रवेश कर रहे हैं। अगर सचमुच ऐसा होगा, तो यह हमारे नेतृत्व तबकों पर निर्भर होगा कि वे भविष्य का कैसा समाज हमें देते हैं और उसमें इंसानियत, भावनाओं-संवेदनाओं की कितनी और कैसी जगह होगी! सबके भीतर यह उम्मीद बची रहेगी कि पृथ्वी हर हाल में बचे, लेकिन इस पर जीव-जगत के साथ इंसानी मूल्य भी बचे!

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