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दुनिया मेरे आगेः समीक्षा का पैमाना

समीक्षा का मतलब है मूल्यांकन। यानी किसी भी कृति या रचयिता का गुण-दोष के आधार पर उचित ईमानदार, संतुलित और सही आकलन। इसीलिए डॉ सैम्युअल जॉनसन ने समीक्षक को ‘हैंगिग जज’ यानी अधर में लटके और संतुलन कायम रखे हुए न्यायाधीश कहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

समीक्षा का मतलब है मूल्यांकन। यानी किसी भी कृति या रचयिता का गुण-दोष के आधार पर उचित ईमानदार, संतुलित और सही आकलन। इसीलिए डॉ सैम्युअल जॉनसन ने समीक्षक को ‘हैंगिग जज’ यानी अधर में लटके और संतुलन कायम रखे हुए न्यायाधीश कहा है। मतलब साफ है कि समीक्षा न्यायसंगत, संतुलित, गुण-दोष पर आधारित और इस या उस पक्ष में झुकी हुई नहीं होनी चाहिए। तटस्थता की बात इसलिए करना उचित नहीं है कि कई बार फैसला देने वाले कुछ पंच भी सौ फीसदी तटस्थ नहीं रह पाते! उन्हें भी न्याय के पक्ष में झुकना ही होता है।
लेकिन आजकल ऐसा लगता है कि समीक्षा तयशुदा ढांचे में फिट होने योग्य यानी प्रतिबद्ध होती जा रही है। अगर समीक्षक किसी कृति में लेखक द्वारा व्यक्त किए गए अर्थ के बजाय अपना ही अर्थ ढूंढ़ने का प्रयास करेगा तो उसकी समीक्षा अच्छी, अर्थपूर्ण और औचित्यपूर्ण कैसे होगी? समीक्षक होने का मतलब भाग्य-विधाता हो जाना नहीं है। मनमर्जी को मूल्यांकन नहीं कहा जा सकता। साहित्य की अन्य विधाओं की तरह आलोचना के क्षेत्र में भी सभी का अपना-अपना अहम है। सभी खुद को श्रेष्ठ मानते हैं।

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बीसवीं सदी के महान कवि, नाटककार और समीक्षक टीएस इलियट ने तीन तरह के आलोचकों के प्रति आगाह किया था। पहला, जोश में रचना के आते ही प्रतिक्रियास्वरूप एकदम अधिकारिक राय दे देना। दूसरे किस्म के समीक्षक वे हैं जिन्हें इलियट ने ‘प्रोफेशनल क्रिटीक’ कहा है, जिनमें वे लोग हैं जो किसी समाचार पत्र या पत्रिका में समीक्षा कार्य के लिए नियुक्त हैं। ये लोग किसी कृति के आते ही अपनी कलम लेकर उस पर वैसे ही झपट पड़ते हैं, जैसे कोई मैकेनिक अपना टूल बॉक्स लेकर वाहन दुरुस्त करने के लिए निकलता है और तीसरी किस्म की समीक्षा को इलियट ने ‘नींबू निचोड़’ समीक्षा कहा है।

ऐसे समीक्षक रचना को तोड़-मरोड़ कर उसका पूरा खून वैसे ही निकाल लेते हैं जैसे नींबू का रस निकाला जाता है। नतीजतन, रचना बेजान हो जाती है। इलियट के अनुसार श्रेष्ठ समीक्षा वह है, जब लेखक खुद अपनी रचना का मूल्यांकन करता है। पर ऐसा अपवाद स्वरूप ही हो पाता है। लेकिन असली समीक्षा वह है जिसमें रचना का ईमानदार मूल्यांकन किया जाए और समीक्षक वह छुए जो पाठक से अनछुआ रह गया हो। लेकिन आमतौर पर सारा साहित्य संसार ही खेमेबंदी और अपने-पराए में बंटा हुआ है।
पिछले कुछ वर्षों से गीत के खिलाफ लिखने और ऐसा करके खुद को प्रगतिशील और आधुनिक बताने की कोशिश करने वालों का मानो फैशन चल पड़ा है। गीत को कविता से बाहर करके लोगों ने कविता को दरिद्र ही किया है। 1990 के दशक से तो मानो गीत और गीतकारों को खारिज करने का आंदोलन-सा चल पड़ा। अच्छे और स्तरीय गीतकार भी सहम कर घर बैठ गए। उनमें एक कैलाश वाजपेयी भी थे और मेरठ के भारत भूषण, बालस्वरूप राही और रमानाथ अवस्थी भी।

छंद को तोड़ने के जोश में छंद ही को छोड़ दिया गया। जबकि छंद मुक्त कविता के प्रणेता इलियट खुद मानते थे कि छंद को तोड़ने का अधिकार उसे ही है जिसने छंद में बंधना जाना है। नतीजतन, गीत की विदाई की चर्चा होने लगी। जबकि सच यह है कि हरिवंश राय बच्चन, नेपाली, वीरेंद्र मिश्र, नीरज, भारत भूषण, रामावतार त्यागी जैसे कद्दावर गीतकारों ने दिनकर और भवानी प्रसाद मिश्र जैसे कवियों के साथ मंच पर जाकर हिंदी को लोकप्रिय तो किया ही, कविता को गरिमा और प्रतिष्ठा भी दिलाई। इनके साथ रामकुमार चतुवेर्दी चंचल, मुकुट बिहारी सरोज व शिशुपाल सिंह शिशु के नाम भी लिए जा सकते हैं। पर आजकल जब भी छंद की वापसी व गीत के महत्त्व की चर्चा होती है, समीक्षक केदारनाथ सिंह, नागार्जुन और अन्य नई कविता के कवियों के नाम तो लेते हैं पर इनमें से किसी का भी नाम नहीं लेते। इन कवियों की बहुत-सी कविताएं उच्चस्तरीय हैं, भले ही उनमें सभी कविताएं उतनी अच्छी न हों। लेकिन किस कवि की सभी कविताएं समान रूप से उच्चस्तरीय हैं? कम से कम अच्छे को तो अच्छा कहा जाए!

समीक्षा सटीक, संतुलित, निजी दुराग्रह या पूर्वाग्रह से रहित और गुण-दोष पर आधारित तो होना ही चाहिए, कृति की उन खूबियों को सामने लाने के लिए होना चाहिए जो अभी तक सामान्य पाठकों से छिपी रही हैं। साथ ही उसका उद्देश्य रुचि को परिष्कृत करना भी होना चाहिए। समीक्षा ऐसी हो कि जिस कृति की समीक्षा की गई है, वह सोने-सी चमक उठे। समीक्षा का कोई एक पैमाना नहीं हो सकता। यही कारण है कि अलग-अलग युगों और समय में समीक्षा के तरीके बदलते रहे हैं। आदर्श समीक्षक मुश्किल से ही मिलता है। किसी ने कहा भी है- ‘कौन हलका है, कौन भारी है/ ये तराजू की जिम्मेदारी है, तो ऐसी तराजू है कहां!’

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