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दुनिया मेरे आगे: बोझ का हासिल

सही है कि हरेक माता-पिता यह चाहते हैं कि उनके बच्चों का भविष्य स्वर्णिम हो और उनके बच्चे ऐसा मुकाम हासिल करें जो उनके भविष्य को सुखद बनाने के साथ साथ समाज में एक दृष्टांत बने।

Depression, worriness, tensionअवसाद एक मानसिक दशा है, जिसका निदान बातचीत और सकारात्मक सोच से हो सकता है।

कुंदन कुमार

आमतौर पर अपनी पसंद के किसी काम में हमें लगाया जाता है तो हम उसे पूरे मनोयोग से करते हैं और फिर उस कार्य का परिणाम भी हमारे पक्ष में बेहतर होता है, जो आखिर सफलता में परिणत हो जाता है। मेरे पड़ोस में एक लड़के का रुझान गीत संगीत की ओर था। जब भी वह गाना शुरू करता था तो पूरी तरह गीत के भाव में गोता लगाने लगता था। गीत-संगीत के अलावा उसे जीव विज्ञान में गहरी अभिरुचि थी। वह जीव विज्ञान का एक बेहतर अध्येता बन सकता था। अगर उसे जीव विज्ञान पढ़ने के लिए छोड़ दिया जाता।

अगर इन दोनों विषयों से संबंधित क्षेत्र में वह अपना भविष्य तलाशता तो उसके सफल होने उम्मीद ज्यादा होती। दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह या तो संगीत के क्षेत्र में अपना कॅरियर बनाना चाहता था या फिर जीव विज्ञान में दिलचस्पी के चलते वह चिकित्सा के क्षेत्र में अपना उज्ज्वल भविष्य देख रहा था, लेकिन उसके पिता पड़ोसी परिवार की देखा-देखी अपने बेटे को इंजीनियर बनाना चाहते थे। इसलिए दसवीं के बाद बारहवीं में उसका नामांकन गणित विषय में करवा दिया गया और उसे इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए कोटा भेज दिया गया। लेकिन चूंकि गणित उस बच्चे के रुचि का विषय नहीं था, इसलिए वह पूरी तन्मयता के साथ अपनी पढ़ाई नहीं कर पा रहा था। इस वजह से वह तनाव में रहने लगा। थोड़े ही दिनों में अवसाद ने उसे अपने गिरफ्त में ले लिया। उसके अभिभावकों को आखिर उसे वापस लाना पड़ा।

हमेशा गीतों की सुरों में गोता लगाने वाला उस खुशमिजाज इंसान को कोटा में आखिर क्या हुआ, जिसकी वजह से वह अपनी अनमोल मुस्कान तक भूल गया! आज भी उसके आसपड़ोस में यह चर्चा का विषय है। बेशक अगर उसे खुद अपनी मंजिल तय करने का अधिकार होता तो उसकी सफलता से उसका परिवार और समाज लाभान्वित होता!

दरअसल, अक्सर अनजाने ही अभिभावक ऐसी गलती कर बैठते हैं जिसका खमियाजा ताउम्र उनके बच्चों को भुगतना पड़ता है। हमने ऐसा देखा है कि बच्चे क्या पढ़ेंगे, क्या नहीं, इसका चयन बच्चे नहीं, बल्कि उनके माता-पिता या संरक्षक करते हैं। पड़ोसियों की देखादेखी अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों की रुचि जाने बगैर अपने बच्चों को ऐसे क्षेत्र में धकेल देते हैं, जिसका अंतिम परिणाम विफलता और अवसाद होता है। विचित्र है कि खाना खाते वक्त बच्चों की पसंद पूछा जाता है, कपड़े बच्चों की पसंद के खरीदे जाते हैं, लेकिन बच्चों के जीवन से सरोकार रखने वाले महत्त्वपूर्ण फैसलों से उन्हें अलग रखा जाता है!

सही है कि हरेक माता-पिता यह चाहते हैं कि उनके बच्चों का भविष्य स्वर्णिम हो और उनके बच्चे ऐसा मुकाम हासिल करें जो उनके भविष्य को सुखद बनाने के साथ साथ समाज में एक दृष्टांत बने। लेकिन इस चाहत में वे अपने बच्चे को उसकी रुचि के विपरीत क्षेत्र में धकेल देते हैं, जहां वे तनाव को गले लगा लेते हैं। तनाव की अधिकता की वजह से हृदय में रक्त का थक्का जमने लगता है, जिससे कम आयु में ही ऐसे बच्चे हृदय संबंधी बीमारियों की गिरफ्त में आ जाते हैं।

मान लिया जाए कि कोई व्यक्ति मोटरसाइकिल अच्छा चला लेता है। अगर उसे कार चलाने के लिए दे दिया जाए तो यह निश्चित है कि वह हादसे का शिकार हो जाएगा और दूसरों सहित अपनी जान भी ले सकता है। क्रिकेट के खेल में बल्लेबाज, विकेटकीपर और गेंदबाज का अलग-अलग विभाग होता है। कम ही खिलाड़ियों को हरफनमौला कहा जाता है। सभी विषयों का अपना क्षेत्र और खास महत्त्व है। हरेक बच्चा सभी विषयों का ज्ञानी नहीं हो सकता। बहुत कम बच्चे ही सभी विषयों पर समान पकड़ रखते हैं।

अधिकत्तर शहरों के निजी प्राथमिक विद्यालयों में कॅरियर परामर्शदाता होते हैं जो बच्चों की रुचि को देखते हुए अभिभावक को सलाह देते हैं कि उनके बच्चों के लिए क्या करना उचित रहेगा, किस क्षेत्र में उसके सफल होने की संभावना ज्यादा है और कौन-सा क्षेत्र उसके लिए ज्यादा उपयोगी नहीं होगा। ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी विद्यालयों में कॅरियर संबंधी परामर्श देने वाला कोई नहीं होता है। अगर कोई बच्चा तेज दौड़ता है या अच्छा क्रिकेट खेलता है तो उसके अभिभावक को इसमें समय की बर्बादी दिखती है। अगर कोई विशेषज्ञ उन्हें यह बताए कि क्रिकेट या अन्य खेल में भी कॅरियर है तो शायद उनकी मानसिकता बदले! अगर सरकारी विद्यालयों में भी एक कुशल परामर्शदाता की व्यवस्था हो तो कई बच्चों की जिंदगी को सकारात्मक दिशा दी जा सकती है।

हालांकि तकनीकी विकास के दौर में अभिभावक जागरूक हुए हैं, फिर भी बहुतायत ऐसे अभिभावकों की हैं, जिनकी पहुंच से तकनीक अभी भी बहुत दूर है। जरूरत इस बात कि है कि बच्चों को अपनी रुचि के मुताबिक भविष्य की राह चुनने में शामिल किया जाए। अगर बच्चों को उनके मन मुताबिक क्षेत्र से हट कर दूसरे क्षेत्र में जाने को विवश किया जाएगा तो वे उसमें वे अपनी क्षमता पूरी तरह नहीं दे पाएंगे। इसका खमियाजा उनकी निजी जिंदगी पर तो पड़ेगा ही, साथ ही परिवार और समाज भी उनके अभिभावक के अनुचित फैसलों की वजह से प्रभावित होगा!

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