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दुनिया मेरे आगेः नदी की तरह

बड़े जटिल अर्थों वाले दर्शन के समांतर जीवन दरअसल मस्ती है, बेफिक्री है। उसे उसी की ताल में... उसी के सुर से... उसी की आवाज में गाना है। कोई भी जबर्दस्ती उसके साथ नहीं करना चाहिए।

सबसे आगे निकलने की होड़ में कृत्रिम नहीं हो जाना चाहिए।

मोनिका भाम्भू कलाना

अमूमन ऐसा क्यों होता है कि किसी व्यक्ति से बात करते हुए दूर से जितना अपनापन लगता है, करीब जाने पर उसमें कोई न कोई गैरियत झलक जाती है। कहीं से अजनबीपन उभर आता है और प्रकट हो जाती है किसी छोर से उदासी। कितना मुश्किल होता है किसी अपने में पराएपन को देखना, जिन्हें हम अपने सबसे पास समझने लगते हैं, उनमें एक अनजान को महसूस करना, एक अनदेखी-सी दूरी का अहसास होना, जो कभी दिखा नहीं, जिसे कभी जाना नहीं और जो कभी समझ में नहीं आया। दिलचस्प यह है कि इस तरह की प्रक्रिया से गुजरते हुए यह हर रोज करने से अभ्यास में आ जाता है और बहुत शातिराना अंदाज में हम इसे निभाना भी सीख जाते हैं। हमारी पूरी दिनचर्या इसे अनुसरण करने के अनुकूल है। हम जीत जाते हैं हर भावना से और ढूंढ़ते हैं केवल गैर, जो अपना कोई नहीं। क्या हम सचमुच गैर को ढूंढ़ने अपने दायरे से निकले होते हैं? लेकिन हालात कई बार हमारे अनचाहे खड़े होते हैं। हम बन भी जाते है भावहीन, प्रतिक्रियाविहीन, अलग-थलग छिटके हुए से और इस बेढंगी, बेढब, बेमुकाम-सी यात्रा में खोकर मनुष्यत्व से कितने दूर हो जाते है हम! इसका पता हमें वक्त गुजरने पर ही चलता है।

दरअसल, सफल होने के पीछे हमने काफी धारणाएं बना ली हैं। उनमें से एक यह भी है कि जब तक हम सहज रहें, अच्छे से कुछ नहीं कर पाएंगे। जब तक मस्ती में हैं, उन लोगों से मुकाबला कैसे कर सकेंगे जो गंभीरता ओढ़ कर चेहरे को ही किताब में तब्दील कर देते हैं। जब तक पन्ना पलटा नहीं जाए, तब तक उस किताब के असली शब्दों के अर्थ कैसे समझ में आएंगे! लेकिन गंभीरता का पर्दा कई बार दीवार की तरह ठोस दिखता है। जब तक कोई प्रफुल्लित है, हंसता दिख रहा है, कुछ भी पा लेने के बारे में कैसे सोचा जा सकता है? शायद यह हमारे जीन में है। हमें लगता है कि हम मर कर ही कुछ पा सकते हैं, बिना यह सोचे कि उस पाने से ज्यादा व्यर्थ क्या होगा और दुर्भाग्य कि हम आज भी यही सीख रहे हैं और जो हमारे दायरे में होते हैं, उन्हें सिखा रहे हैं। क्या हमने अपने सीखे के अनुभव को सचमुच परख लिया होता है? अगर हम वक्त पर यह कर लें तो कुछ वैसा किसी दूसरे को नहीं सिखाएंगे, जिसे सीखने के बाद हमने खुद को अच्छा महसूस नहीं किया।

मुश्किल यह है कि इस स्थिति में किसी बदलाव की जरूरत हमें महसूस नहीं होती है, क्योंकि सिखाई गई चीजों को ही प्राकृतिक मान कर ढोते रहने के हम इतने आदी हो चुके हैं कि हमें लगता है सहजता से किया हुआ काम कोई परिणाम नहीं देता। हमारे शिक्षक कक्षा में हमेशा कहते हैं कि हम भारतीय लोग दबाव में बहुत जल्दी आ जाते हैं। कोई भी अपने गुजरे और वर्तमान पर गौर करे तो इस सच को महसूस कर सकता है। लेकिन अक्सर सोचती हूं कि ऐसा क्यों होता है? क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए? इसका सीधा-सा कारण है हमारी परवरिश, हमारा माहौल, असफलता को मृत्यु से भी भयंकर मानने वाली हमारी मनोवैज्ञानिक आदत, हर चीज को जटिल करने वाली हमारी बुद्धि और सामान्यीकरण को नजरअंदाज करने वाली हमारी प्राथमिकता। हम हार जाते हैं। हम दबाव में आ जाते हैं, क्योंकि किसी एक रास्ते को ही हम जिंदगी समझ लेने की भूल कर बैठते हैं… किसी खास मामले में अनुत्तीर्ण होने भर से हम खुद को बेकार समझ लेते हैं..!

क्या ऐसा इसलिए है कि हम विशिष्टता के प्रति पूर्वाग्रह से भरे हुए हैं? मुझे लगता है कि हमें यही छोड़ना है। जो हमारे सामने उपस्थित है, जिसका सामना है, हमें उसे जीते जाना है। किसी बड़े की आकांक्षा में छोटी-छोटी खुशियों को दांव पर नहीं लगाना है। बड़ी खुशी के इंतजार में अक्सर हम छोटी-छोटी वैसी खुशियों को अपने बिल्कुल पास से गुजरने देते हैं, जो हमारे लिए बड़ी खुशी का जरिया बन सकती हैं। यानी छोटी खुशियों को थाम लेना हमारे लिए बड़ी खुशी का इंतजाम साबित हो सकता है।

बड़े जटिल अर्थों वाले दर्शन के समांतर जीवन दरअसल मस्ती है, बेफिक्री है। उसे उसी की ताल में… उसी के सुर से… उसी की आवाज में गाना है। कोई भी जबर्दस्ती उसके साथ नहीं करना चाहिए। एक बहाव बना देना है उसे और उसमें तैरना है। बेकार और बेमानी गंभीरता को ढोने की जरूरत नहीं है। सहजता ही आनंद है… वही जीवन है। सब कुछ सोच कर ही क्यों हो! सब कीमत वाला ही क्यों हो! अजनबीपन से मुक्त होने का उपाय यही है। जिंदगी का रास्ता उसी के उसूलों से हो, मानवीय संवेदनाओं को बरकरार रखते हुए। सबसे आगे निकलने की होड़ में कृत्रिम नहीं हो जाना चाहिए। जीवन के भाव उसकी भाषा को नहीं भूल जाना चाहिए। अगर इतना ही हम कर पाएं तो बहुत कुछ बचा लेंगे अपने लिए, अगली पीढ़ियों के लिए।

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