ताज़ा खबर
 

भाषा का वर्ग चरित्र

भित्ति-चित्रों और संकेताक्षरों के माध्यम से अभिव्यक्ति से प्रारंभ कर मानव समाज ने आज भिन्न स्तरों पर न केवल जटिल भाषाओं की सामाजिक निर्मिति की, बल्कि मशीनों और कंप्यूटरों की भाषा भी रच डाली।

सांकेतिक फोटो।

नवनीत शर्मा

भित्ति-चित्रों और संकेताक्षरों के माध्यम से अभिव्यक्ति से प्रारंभ कर मानव समाज ने आज भिन्न स्तरों पर न केवल जटिल भाषाओं की सामाजिक निर्मिति की, बल्कि मशीनों और कंप्यूटरों की भाषा भी रच डाली। इसी संप्रेषण के आधार पर सत्ता रची-बुनी गई। किसकी सत्ता हो और कौन सत्तावान, यह सुनिश्चित करने में भाषाई अभिव्यक्ति एक प्रमुख घटक है। राजा और राज्य की भाषा का वर्चस्व हमें सहज ही स्वीकृत है। शायद इसीलिए औपनिवेशिक युग में भारत के एक राष्ट्र होने की परिकल्पना अंग्रेजी में रची गई और यह आज तक हम पर हावी है। एक लंबे समय तक अदालती और प्राशासनिक कार्यवाही उर्दू में होने के कारण अभी भी कुछ न्यायिक सेवा परीक्षाओं में उर्दू की उत्तीर्णात्मक परीक्षा होती है। इसी सत्ता सामीप्य का परिचायक होने के नाते संस्कृत को देववाणी या देवभाषा का विशेषण प्राप्त हुआ। सत्ता और भाषा का यह सहवर्तन ही भाषायी शुचिता, नैतिकता, मर्यादा और मानक भी तय करते हैं।

भाषा की शुचिता का सवाल भी शायद भाषा जितना ही पुराना होगा या यह सवाल क्या, कैसे और कितना अभिव्यक्त किया जाए, की संभावना और सीमाएं चिह्नित करने की ही प्रक्रिया में प्रारंभ हुआ होगा। विश्व की तमाम भाषाओं में सत्ता की होड़ के बीच लगभग सभी भाषाओं में आंतरिक वर्ग-संघर्ष रहा है। हिंदी भाषा में भी यह पर्याप्त मात्रा में है। हिंदी, हिंदवी, हिंदुस्तानी और वे तमाम बोलियां जो हिंदी क्षेत्र में बोली जाती हैं, वर्चस्व और आधिपत्य के लिए संघर्षरत रहती हैं। इन सबके बीच खड़ी हिंदी या मानक हिंदी अपना एक भिन्न वर्ग बना कर पाठ्य पुस्तकीय या स्कूल की हिंदी और घर की हिंदी का अंतर बनाए रखती है। विशुद्ध हिंदी का प्रयोग अक्सर श्रद्धा और उपहासजन्य संदर्भ के मध्य तैरता रहता है। इसी तरह तमाम साहित्यिक विधाओं में आपसी प्रतियोगिता से इतर उनके कितना और कैसे कहे जाने की संभावनाओं के बीच अनुक्रम बनाने को रहता है।

यहां भाषा का वर्ग-चरित्र कैसे निर्मित होता है, इस पर अभी भी कोई सुनिश्चित विमर्श नहीं उभर पाया है। हम कैसे अंतर करें ‘फुटपाथ’ या ‘लुगदी’ साहित्य या फिर साहित्य में वेद प्रकाश वर्मा और विमल मित्र की रचना में। सआदत हसन मंटो, राही मासूम रजा से लेकर नामदेव ढसाल और ओमप्रकाश वाल्मिकि की रचनाओं को भाषा-शुचिता और भाषायी वर्ग चरित्र के दंश का सामना करना पड़ा है, जबकि हजारी प्रसाद द्विवेदी और महादेवी वर्मा सरीखे लेखक भाषा की जीवंतता के लिए इसके ‘गंदला’ होने की हिमायत करते हैं। एक ठहरी हुई और एकाकी भाषा तालाब के पानी की तरह सड़ांध देते हुए सामाजिक निर्मिति और नूतन ज्ञान मीमांसा का अवरोध बनती है।

हिंदी का अन्य बोलियों या उर्दू- फारसी-अंग्रेजी से आयात-निर्यात उसे कमतर करता है या मजबूत, यह अभी भी एक विवादित विमर्श है। इस तरह गालियों-अपशब्द का प्रयोग साहित्य के लोकधर्मी चरित्र को चिह्नित करता है या परिमार्जित भाषा पर एक लांछन है, यह विवाद भी नया नहीं है। मुश्किल यह है कि इस विवाद में इस बिंदु पर विचार करने की जरूरत कम समझी जाती है कि भाषा को लेकर धारणाएं बनती कैसे हैं और उसमें सत्ता-केंद्रों की भूमिका क्या होती है! उत्तर-आधुनिकता ने सर्वाधिक चुनौती भाषा और उसके सहारे गढ़े जाने वाले महाकथ्यों को दी है, इसके अनुसार ‘लेखक’ मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और पाठक ही भाषा में व्यक्त-अव्यक्त को अपने संदर्भ अनुसार उसमें व्यंजना और लक्षणा को आरोपित करता है।

साहित्य रचना की तमाम विधाओं में ‘कविता’ सर्वाधिक विवादित रहती है। कम शब्दों में और सांकेतिक शब्दों के माध्यम से भाव अभिव्यक्ति कवि के रचना कर्म को परिसीमित करती है और उसमें निहित अर्थों और मर्म को समझने का भार पाठक पर छोड़ देती है। पाठ्य पुस्तकों में किन कविताओं और कवियों को चयनित किया जाता है, इसे लेकर ज्ञान-सत्ता की राजनीति के साथ बाल मनोविज्ञान और भाषा विज्ञान के सिद्धांत भी हस्तक्षेप करते हैं। इसकी तुलना में लोक समाज में कौन- सी कविता प्रचलित होती है, यह भर्तृहरि के कालजयी भाषा दर्शन ‘स्फोटवाद’ से समझा जा सकता है। कविता उग्र, प्रगतिशील, दक्षिणपंथी, सत्ता-पक्ष या सत्ता विरोधी होने से इतर एक सृजन-कर्म है और उसका मूल्यांकन (रसास्वादन के उपरांत) उससे जनित ‘रस’ के आधार पर किया जाना चाहिए।

इसी प्रकार बाल साहित्य या कविता का मूल्यांकन उसके आकर्षक शब्द-नियोजन, पठनीयता और सरलता के आधार पर किया जाना चाहिए। अर्थ निर्माण और द्वि-अर्थी होने की संभावना से तो शायद ही कोई पद या वाक्य मुक्त हो। इससे परे जाकर ही साहित्यिक रचना संसार हमें नए ज्ञान और सृजनात्मकता की ओर ले जाएगा। अन्यथा भाषा मात्र उसमें वर्णित स्वरों और व्यंजनों क क्रमचय और समचय बन कर रह जाएगी। काव्य संसार में भी हमें तुलसी और सूर के साथ-साथ दुष्यंत कुमार और धूमिल को पढ़ने की आदत और दर्शन को पोसने की आवश्यकता है, वरना हम किसी एक पक्ष में खड़े होकर दूसरे पक्ष के साहित्य पर प्रतिबंध करने की पैरोकारी के मकड़जाल में भाषा को जकड़ देंगे।

Next Stories
1 वक्त रुकता नहीं
2 आत्मविकास की ओर
3 समर्थ बनाम शक्तिमान
ये पढ़ा क्या?
X