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संवादहीनता के खतरे

अपने देश में विपरीत लिंग के व्यक्ति से बात करने का नजरिया सहज नहीं है। परिवार से लेकर विद्यालयों तक में इसका प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। लड़कियों के मामले में बात बहुत ही अलग तरह से काम करती है।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

आलोक रंजन

हमारे विद्यालय में सौर ऊर्जा से बिजली प्राप्त करने वाले उपकरण लगाए जा रहे थे। इस कारण पूरे परिसर में जगह जगह से काटने, ठोकने-पीटने की आवाजें आ रही थी। वे वही दिन थे जब बोर्ड की परीक्षाएं चल रही थी। वह समय विद्यार्थियों के गहन अध्ययन का होता है। ऐसे में इस तरह की आवाजें उनका ध्यान भटका रही थीं। उनमें से एक छात्रा मेरे पास आई। उसे उन आवाजों से परेशानी हो रही थी। एक को शिकायत करते देख बाकी विद्यार्थियों ने भी बोलना शुरू कर दिया। मैं इसे उनसे ही हल करवाना चाह रहा था। मैंने खिड़की की पास बैठी एक छात्रा से कहा कि वहां खड़े नजदीकी व्यक्ति को बोलो कि तुमलोगों को पढ़ने में दिक्कत हो रही है, इसलिए वे इस काम को अभी बंद कर दें और बाद में करें जब विद्यार्थी न हों। उस छात्रा के मुंह से एक शब्द नहीं निकल पाया। मैंने दूसरी छात्रा से कहा, तो उसका भी वही हाल। पूछने पर पता चला कि वे समझ नहीं पा रही हैं कि काम करने वाले लोगों को क्या कह कर संबोधित करें! मेरे लिए यह नई बात थी। यह संबोधन के शब्द के न होने का मामला भर नहीं था, बल्कि बात अनजान पुरुषों को कैसे संबोधित किया जाए, उसकी थी।

पिछले दिनों दिल्ली के एक कैफे में भी यही बात देखने को मिली। वहां ज्यादातर कर्मचारी लड़कियां थी। उन सबके दोपहर के भोजन का समय था, सो दो लड़कियां हमारे पीछे की खाली टेबल पर आकर बैठ गर्इं और खाने लगी। थोड़ी देर बाद काउंटर पर काम कर रही एक लड़की ने उनकी ओर किसी बात के लिए इशारा किया। वे दोनों खाने में मशगूल थीं। मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने पीछे मुड़ कर उन्हें बता दिया कि काउंटर से आप लोगों के लिए कोई संदेश है। मैं उन्हें बोल कर मुड़ा ही था कि मेरे दोस्तों ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। उनकी बातों का मतलब यह था कि लड़कियों से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए। मुझे अपनी छात्राएं याद आ गर्इं। उनके लिए सवाल अनजान पुरुषों से बात करने का था और यहां अनजान लड़कियों से। वे तय नहीं कर पा रही थीं कि वे कैसे बात करें और यहां मैंने कर ली तो यह ठीक नहीं माना गया।

असल में यह समस्या बहुत गहरी है। अपने देश में विपरीत लिंग के व्यक्ति से बात करने का नजरिया सहज नहीं है। परिवार से लेकर विद्यालयों तक में इसका प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। लड़कियों के मामले में बात बहुत ही अलग तरह से काम करती है। उन्हें अनजान लड़कों या पुरुषों से बात न करना सिखाया जाता है। इसकी अपनी वाजिब वजहें हैं। इससे उनके मन में अनजान पुरुषों के प्रति भय-मिश्रित संकोच सामान्य रूप से पाया जाता है। आगे यही और अलग-अलग तरीकों से काम करता है। पुरुषों से सीधे-सीधे बात करने वाली स्त्री को समाज स्वस्थ दृष्टि से नहीं स्वीकार करता है। लोग उन्हें कई निकृष्ट विशेषण से संबोधित करने से नहीं चूकते। वहीं पुरुषों से बात न करने वाली और शरमाते-सकुचाते हुए बात करने वाली स्त्री को ‘सुशील’ स्त्री माना जाता है।

समाज की इस मानसिकता को समझने के लिए हमें कहीं और जाने की जरूरत नहीं है। अपने आसपास नजरें फिराते ही यह दिख जाता है। लड़कों की बात करें तो हमारा समाज इस मामले में काफी स्पष्ट है कि सभी बातों में लड़कों को वरीयता मिलनी ही चाहिए। इस कारण ऐसा मान लिया जाता है कि उन्हें इसके लिए प्रशिक्षण की जरूरत नहीं है कि लड़कियों से कैसे बात करें। बल्कि लड़कियों को किसी भी तरह की बात के लिए तैयार रहना चाहिए। इन बातों पर थोड़ा और सोचने से यह पता चलता है कि लड़कों के लिए हर लड़की संभावित ‘यौन साथी’ है और इसी से लड़के और लड़कियां, दोनों का प्रशिक्षण संचालित होता है। अपने देश में यह एक और स्तर प्राप्त कर लेता है। हर बातचीत की शुरुआत किसी ने किसी रिश्ते के दायरे में ही की जाती है। रिश्ता नहीं तो बातचीत भी नहीं। जबकि यौन और यौनेतर रिश्तों के दायरे में आने वाले लोगों की तुलना में उन रिश्तों से बाहर के लोग कई गुना ज्यादा है, जिनसे हमारा रोज-रोज संपर्क होता है। लेकिन रिश्तों और दायरों में बांधने वाले समाज ने उनसे जुड़ने और बात करने का कोई विकल्प नहीं रखा। इन दायरों से बाहर के लोगों के बारे में यह धारणा बैठा दी गई है कि वह अवैध है। अवैध की यही समझ हमें विपरीत लिंगियों से सहज संवाद करते हुए रोकती है। और यही बात मेरे विद्यार्थियों और उनसे कुछ हजार किलोमीटर दूर बैठे मित्रों पर लागू होती है।

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