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शिक्षा की सूरत

एक शिक्षक ने बड़े तीखे स्वर में कहा कि विज्ञान में प्रयोग के बजाय शिक्षा में प्रयोग करते रहते हैं। कक्षाओं की पढ़ाई-लिखाई का खयाल किए बिना शिक्षकों को दूसरे कागजी कामों में इतना बेवजह उलझाए रखना कि उसका असर पढ़ाई पर पड़ने लगे।

Author Published on: April 9, 2019 3:00 AM
पिछले साल भोपाल जिले के अधिकतर शिक्षक बीएलओ (चुनाव) के काम में लगे रहे। (प्रतीकात्मक तस्वीर- एक्स्प्रेस)

प्रेरणा मालवीय

कुछ दिन पहले एक स्कूल में शिक्षकों के बीच चर्चा चल रही थी कि कुछ भी हो, बच्चे कम से कम पढ़ना-लिखना तो सीख ही जाएं। मगर हर साल नित नई-नई चीजें आती रहती हैं और इन सबका नतीजा क्या होता है, हम सभी जानते हैं। एक शिक्षक ने बड़े तीखे स्वर में कहा कि विज्ञान में प्रयोग के बजाय शिक्षा में प्रयोग करते रहते हैं। कक्षाओं की पढ़ाई-लिखाई का खयाल किए बिना शिक्षकों को दूसरे कागजी कामों में इतना बेवजह उलझाए रखना कि उसका असर पढ़ाई पर पड़ने लगे। इस तरह के कामों से एक खीझ भी होती है और जो शिक्षक अपने स्तर से बेहतर प्रयास कर रहे हैं, वे भी हतोत्साहित होते हैं।

कुछ अन्य शिक्षकों ने भी कहा कि हमारा ज्यादातर समय तो दफ्तरी औपचारिकताओं को पूरा करने में चला जाता है। सरकारी विभाग ने हमें क्लर्क बना कर रख दिया है। बच्चों को पढ़ाने के बजाय बाकी सभी काम कर रहे हैं। अगर हमसे कोई पूछे तो हम यही कहेंगे कि इन सारे कामों को करने वालों का विकल्प तलाशा जाए और शिक्षकों के जिम्मे से ये चीजें बंद कर दी जाएं। शिक्षकों को बस बच्चों को पढ़ाने दिया जाए, फिर उनसे साल के अंत में रिजल्ट पूछा जाए! मगर शिक्षकों से तो कोई पूछता ही नहीं है, जिन्हें कई शिक्षकेतर काम करने होते हैं। कोई कमी होने पर डांट भी शिक्षकों को ही खानी पड़ती है। जब तक इस तरह की नीति रहेगी, शिक्षा का स्तर दिन-प्रतिदिन और खराब होगा। एक शिक्षक की इस बात ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि विज्ञान के बजाय शिक्षा में नाहक ही प्रयोग करते रहते हैं, जिसका कोई खास हासिल नहीं होता है। हालांकि यह बात शिक्षण के पेशे से जुड़े लोग और अन्य शिक्षाविद समय-समय पर कहते रहे हैं। सच बात तो यही है कि अधिकतर शिक्षकों को पता होता है कि उनकी क्लास में बच्चों की क्या स्थिति है। मसलन, यह कि तीन बच्चे अटक-अटक कर पढ़ते हैं या फलां चार बच्चे अभी सिर्फ वर्ण की पहचान कर पाते हैं या ये बच्चे तो जोड़-जोड़ कर पढ़ लेते हैं। यहां कहने का आशय यह है कि ज्यादातर शिक्षक अपनी-अपनी कक्षाओं की स्थिति से अच्छे तरीके से वाकिफ होते हैं।

हम सभी यह चाहते हैं कि बच्चों में कम से कम पढ़ने-लिखने का बुनियादी कौशल तो विकसित हो जाए और यह आज के समय में एक चिंता का विषय भी है। अगर बच्चे इन्हीं से जूझते रहेंगे, अटके रहंगे तो फिर अन्य विषयों को पढ़ने में और भी मुश्किल आएगी, क्योंकि भाषा ही अन्य विषयों को सीखने का आधार है। क्या कुछ सालों के लिए हम शिक्षकों से शिक्षकेतर काम लेने की सारी कवायद बंद करके शिक्षक को सिर्फ पढ़ाने का काम नहीं करने दे सकते? इतनी योजनाओं, घोषणाओं और प्रयासों के बाद भी अगर सफलता नहीं मिल रही हो तो हमें एक बार ठहर कर सोचना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि सभी योजनाएं या कार्यक्रम बहुत सोच-विचार के बाद तैयार होते हैं। तभी वे जमीनी स्तर पर लागू किए जाते हैं। इसके लिए सरकार प्रशिक्षण आदि की भी अलग से व्यवस्था करती है। यानी यह समय और पैसा दोनों की मांग करती है। मगर उसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में शिक्षक अगर स्कूलों में नहीं पढ़ाएंगे तो फिर कैसे यह विचार आगे जा पाएगा और बच्चों के सीखने के स्तर में इससे कुछ सुधार कैसे आएगा! यहां हम कोई योजना बनाते हैं तो उसकी आवश्यक शर्तें भी पूरी करनी पड़ती हैं। अगर यह नहीं हो पाता है तो उससे बहुत ज्यादा परिणाम की अपेक्षा नहीं रखना चाहिए। बाद में कहा जाता है कि योजना ही ठीक नहीं थी तो यह शायद सही नहीं है। उसके बाद फिर कोई नई योजना लागू हो जाती है। किसी भी योजना को जमीन पर उतारने के लिए अगर ठोस कदम नहीं उठाए जाते हैं तो धन की बर्बादी के सिवा आखिर उसका क्या फायदा है!

यह दुख की बात है कि यही हो रहा है। शिक्षा की सूरत में सुधार की योजना कोई भी और कितनी ही अच्छी क्यों न हो, अगर उसके कर्ताधर्ता शिक्षक को ही स्कूल में उसकी मूल ड्यूटी से इतर व्यस्त रखा जाएगा तो क्या होगा! पिछले साल भोपाल जिले के अधिकतर शिक्षक बीएलओ (चुनाव) के काम में लगे रहे। इस दौरान स्कूल में पढ़ाई-लिखाई का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ। यह सिलसिला कई बार लंबे वक्त तक चलता रहता है और विद्यार्थियों को केवल परीक्षा के वक्त शिक्षकों का साथ मिल पाता है। ऐसे में शिक्षकों का यह कहना नाजायज नहीं है कि जब साल भर पढ़ाया ही नहीं जाता है तो परीक्षा लेने से क्या फायदा! ऐसी स्थिति लगातार बने रहने से स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का कितना नुकसान होता है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

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