दुनिया मेरे आगे: तितली उड़ी

तितलियां आज भी मन को मोहती हैं। आज भी जब अचानक दिख जाती हैं तो हृदय प्रफुल्लित हो उठता है। मगर अब यह बात तल्खी के साथ महसूस होती है कि कभी मैं तितलियों के संसार के निकट था... कितना पास! आज कितना दूर हूं। मैं हरी घास पर बैठ गया।

खेतों में उड़तीं तितलियां मन को खूब भाती हैं।

सुरेशचंद्र रोहरा
तितली… रंग-बिरंगी तितलियां ही कभी मेरा संसार थीं। नन्ही-सी तितली, उड़ती जाती। मैं उसे पकड़ने की प्रत्याशा में पीछे दौड़ता चला जाता। न घर की सुध, न मां की। आंखों के आगे पीली तितली है, मैं मुग्ध भाव से तकता हूं। तब तितली जीवन का सर्वस्व थी और भागते-भागते जब हाथ आते-आते फिर उड़ जाती, तो निराशा का घटाटोप अंधेरा छा जाता। उस उम्र में सिर्फ इतना ही समझ आ पाता कि तितली को पकड़ना था… तितली उड़ गई। कुछ पलों की मायूसी, फिर किसी और तितली पर नजर गई तो उसके पीछे दौड़ पड़ा… और नहीं तो किसी और खेल में मग्न हो गया।

नन्ही-सी तितली… नन्हा-सा मैं। तब कितनी पास थी तितलियां। आंखों के आगे प्यारी, सलोनी, आकर्षक चित्र बिखेरतीं तितलियां कई-कई स्वरूप में। तब मैं तितलियों के बिल्कुल पास था, आंखों, हृदय के पास। याद है कि घर के पास खाली मैदान था। हरी-हरी घास और मैं तितलियां ढूंढ़ रहा था। नन्हे-नन्हे हाथों से पकड़ कर, नन्ही हथेली पर रखने की इच्छा लेकर दौड़ता था। इस बात का भी खयाल नहीं कि अगर किसी तितली को पकड़ते हुए अंगुलियां जरा-सी लापरवाह हो गईं तो तितली की जान चली जाएगी!

बस ये था कि कैसे तितली को साथ ले लूं… तितली के साथ हो जाऊं! कैसा निश्छल भाव था। तितलियों का संसार था और उस संसार में मैं था। सोचता था कि काश मेरे भी पंख होते और मैं भी तितली रानी के साथ उड़-उड़ जाता। यह दृश्य मनो-मस्तिष्क में छप गया है, अंकित हो गया है, जो अब कभी मिट नहीं सकता।

नन्हे हाथ-पैर लिए प्रकृति की गोद में तितलियों का मोहक संसार अद्भुत था। इसका शब्दों में भला कैसे वर्णन किया जा सकता है! अनिर्वचनीय! ऐसी अनुभूति होती थी मानो बस यही मेरा संसार है। कई बार तो कोई और खेल खेल रहा होता और इस बीच आसपास किसी खूबसूरत तितली पर नजर पड़ जाती तो सब छोड़ कर तितली की ओर दौड़ पड़ता। लेकिन तितली की अपनी गति थी। जरा-सी आहट महसूस हुई नहीं कि उड़ कर लहराती हुई कहीं और निकल चली! कई बार लहराती हुई मंडराने लगती थीं। इसके बगैर कोई कल्पना अधूरी थी। नीली, पीली, काली, सफेद तितलियां, जब दिखतीं तो हृदय प्रफुल्लित हो उठता।

कोई साथी जब किसी तितली को नन्हे-नन्हे हाथों, उंगलियों से पकड़ लेता तो लगता कि ओह! और मैं भी आशा से भरा तितली पकड़ने दौड़ पड़ता। चाहत थी कि तितली मेरे हाथ में हो, मेरी जेब में या बस्ते में! कैसा अद्भुत समां और दृश्य था। तितली मनमोहक थी, नन्हे मन और विचारों में अपनी अद्भुत छटा से आकर्षण का अनोखा वितान रचती हुई, जिससे बाहर निकल सकना असंभव था।

सुबह-सवेरे तितलियां हरी घास में उड़ती हुई दिखतीं, मैं पहुंच जाता, एक बड़ी प्रत्याशा लिए कि आज तो जरूर एक तितली मेरे हाथों में होगी, मगर अक्सर निराशा ही हाथ आती। नन्ही-सी परी, नन्हा-सा मैं, टुकुर-टुकुर तितली को ढूंढ़ता और जब दिख जाती तो चेहरा अनोखी आभा से खिल उठता। मैं पीछे-पीछे दौड़ता…! तितली तो तितली है, उसके पास पंख है। वह अभी यहां, अभी वहां। मैं पास जाता, वह शायद समझ जाती और उड़-उड़ दूर चली जाती। झपट्टा मारता, मगर हाथ में नहीं आती..! यह आशा और निराशा का खेल चलता रहता।

सोचता, मेरे साथी कैसे तितली को पकड़ लेते हैं! मैं क्यों नहीं पकड़ पाता? निराशा होती, मगर मैं फिर दौड़ता-फिरता कि कभी तो मेरे हाथ भी आ जाएगी। मन में यही कल्पना होती- काश! मेरे भी पंख होते तो तुरंत पास पहुंच जाता… साथ उड़ता और अठखेलियां करता। तितली बहुत-बहुत पास थी। हरित घास के मैदान में उड़ती रहती और मैं उन्हें ढूंढ़ता रहता। यह संसार कितना अद्भुत और हृदयग्राही था। प्रेम और निश्चल से आपूरित यह अनुभूति होती। यही हमारा जीवन है… यही जीवन का सार है।

तितलियां आज भी मन को मोहती हैं। आज भी जब अचानक दिख जाती हैं तो हृदय प्रफुल्लित हो उठता है। मगर अब यह बात तल्खी के साथ महसूस होती है कि कभी मैं तितलियों के संसार के निकट था… कितना पास! आज कितना दूर हूं। मैं हरी घास पर बैठ गया। तितलियां पास थीं, हृदय प्रफुल्लित हो उठा। मैं तितलियों की उड़ान देख रहा था। यह तितली… वह तितली। अब हाथ बढ़ा कर पकड़ने की भूल और कोशिश नहीं करता। स्मरण हो आते हैं वे बचपन के दिन, जब एक अदद तितली के लिए मैदान में जाने कितने चक्कर लगा लेता था। यह अनुभूति बेहद सुखकारक है।

वे दिन जो बीत गए, जिनकी स्मृति शेष है, आंखों के आगे वह भला आजीवन कैसे मिटाई जा सकती है। तितली से मुलाकात, मानो प्रकृति से मुलाकात। आज जब मैं खड़ा-खड़ा तितलियों को ढूंढ़ और निहार रहा था, प्रतीत हो रहा था कि मैं कितनी दूर चला गया हूं। काश, मैं नन्हा बालक हो जाऊं और फिर उनके पीछे दौड़ूं और प्रकृति के एकाकार हो जाऊं। यही चाहत लेकर मैं घास पर आराम से पसर गया। सुबह-सवेरे का वक्त है… घास के विस्तारित वितान पर तितलियां हैं और सिर्फ मैं हूं।

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