ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः अपना-अपना शौक

किसी ने कहा है कि भ्रम मन को भटका देता है और मनुष्य फिर उसी भ्रम को जीने लगता है। आधे से ज्यादा तो अपने शौक के बोझ तले दबे हुए से लगे। कुछ देर बाद एक-दो विद्यार्थी, जो अब तक खामोश बैठे थे, वे आगे आ गए।

एक महिला याद आ गई, जो राजधानी दिल्ली में अपने फ्लैट में प्लास्टिक के डिब्बों में फूल उगाया करती थीं।

पूनम पांडे

हमारे शौक अपनी भाषा को खुद ही गढ़ लेते हैं। जिस तरह संगीत में सात सुर अपने आपसी संवाद से मधुर संगीत बना देते हैं। फूल मिल कर हंसें तो गुलदस्ता बन जाता है। इसी तरह हमारी चाहत, सामाजिक परिवेश, रुझान और मन की उमंग भी कुछ रच देना चाहती है। इसी को शौक कहते हैं। हम सब अपने जीवन को कहीं न कहीं अपने मन के अनुसार ही संचालित करते हैं और इसी सिलसिले में किसी चीज का शौक हमको लग ही जाता है। आजकल की आडंबरी सोच वाले अपने शौक अपने आप से कभी नहीं पूछते। वे गूगल की शरण में जाते हैं और दुनिया के महंगे शौक अपनाने की भेड़चाल में लग जाते हैं।

पिछले दिनों एक जाने-माने कॉलेज के विद्यार्थियों से मिलना हुआ। मेल-मुलाकात जब औपचारिकता से सहजता पर आ गई तो सब मुखर हो उठे और तकरीबन सबने ही अपने अपने शौक खुल कर बताए। कुछ तो इतने उत्साही निकले कि अपने शौक की लागत का पूरा-पूरा ब्योरा भी देते जा रहे थे। महंगा सितार और गिटार बजाने का शौक रखने वाले बिल्कुल बेसुरे होकर अपने शौक की मुनादी कर रहे थे। फिर गोल्फ और टेनिस वालों ने ओढ़ी हुई गंभीरता से अपना शौक बयां किया। कई ने डाक टिकट, यानी ‘फिलैटली’ का शौक अपना रखा था तो कुछ बहुत सारे पुराने सिक्कों को जमा कर रहे थे। नगीना पत्थरों का बेशकीमती शौक पालने वाले भी वहां मिल गए।

किसी ने कहा है कि भ्रम मन को भटका देता है और मनुष्य फिर उसी भ्रम को जीने लगता है। आधे से ज्यादा तो अपने शौक के बोझ तले दबे हुए से लगे। कुछ देर बाद एक-दो विद्यार्थी, जो अब तक खामोश बैठे थे, वे आगे आ गए। उन्होंने एक से बढ़ कर एक गीत, गजल, ठुमरी, टप्पे सुना कर माहौल को तरंगित कर दिया और सबका दिल जीत लिया। ये वही दो-तीन विद्यार्थी थे, जो अब तक शौक के महिमामंडन के भव्य शोर-शराबे मे एकदम मौन साधे बैठे हुए थे। उनका यह शौक औरों की तुलना में लगभग बिल्कुल ही निशुल्क था, मगर बहुत उपयोगी और परोपकारी भी।

इसी सिलसिले में एक महिला याद आ गई, जो राजधानी दिल्ली में अपने फ्लैट में प्लास्टिक के डिब्बों में फूल उगाया करती थीं। उनकी मेहनत का परिणाम निकल भी कमाल ही रहा था। माटी मानो पानी का संग पाकर मधुबन बन जाना चाहती। गीली मिट्टी पर बीज सौ फीसदी अंकुरित होते थे और उस रिहायशी इलाके में हर कोई उनके पास फूलों की तस्वीरें खींचने आता और अपनी एलबम बनाता।

हर दिन दर्जनों लोग पूजा आदि के फूल उनसे ही ले जाते थे उनके घर में हर समय रौनक रहती थी। एक बार उनके एक रिश्तेदार उनसे मिलने आए तो वे भौंचक्के रह गए जब पूरी पड़ोस मंडली ने उनको अपना मेहमान मान कर उनका खुलकर स्वागत-सत्कार किया। यानी फूलों के शौक ने उनको सबका चहेता बना रखा था। इसी संदर्भ में याद आया कि तकरीबन दस-बारह साल पहले एक बार रेलगाड़ी में एक सज्जन मिले थे। वे मुश्किल से पचास साल के होंगे मगर काठगोदाम से लखनऊ के नौ घंटे के सफर में उन्होंने बातों बातों में पकवान और व्यंजन बनाने की इतनी बढ़िया और सरल विधियां बताईं कि उसी डिब्बे में एक महिला उद्यमी ने उनकी सुंदर सरस भाषा और पाक कला विशेषता देख कर उन्हें अपने रेस्तरां मे हर शनिवार को भोजन पर सरस व्याख्यान के लिए पांच साल के लिए अनुबंधित कर लिया। जबकि भोजन बनाना उनका शौक हुआ करता था। यह शौक पहले ही उनके परिवार का रेस्तरां का हजारों का खर्च बचा रहा था। अब उनको अपने शौक से आमदनी भी मिलने लगी।

बचपन में हमारे पड़ोस में एक काका जी रहते थे। वे पंक्चर बनाने का काम करते और अपने काम के बाद मुहल्ले भर के बच्चों को अक्ल सिखाने का काम करते थे। कहीं कुछ गलत होता तो किसी को बदनाम करने के बजाय सुधार करते। बच्चों को किसी न किसी अच्छी बात में उलझाए रखते। तब दूरदर्शन नया-नया आया था, कोई अन्य चैनल नहीं था। काका लोगों के शुभ काम में सब्जियां लाना, घर सजाना, सब काम बड़े ही शौक से पूरे करते। उनकी ईमानदारी ने सबका मन मोह लिया था जब काका साठ साल के हो गए तो लोग उनको अपने खर्च पर दूसरे गांव ले जाने लगे। हर विवाह समारोह में वर-वधू के माता-पिता के बाद काका का ही सम्मान होता। सब बूढ़े-बच्चे, जवान, उनको नकदी, जेवर, कीमती सामान सौंप देते। अपने इसी अच्छे शौक के चलते वे विदेश यात्रा तक कर आए। अस्सी साल की उम्र आने तक काका को इस बात पर विश्वास ही नहीं होता था कि वे दो दशक पहले साइकिल पर चल कर जाते और पंक्चर बनाते थे। काका अपने परोपकारी शौक से सबके मन मे आज तक बसे हुए हैं।

शौक में सेहत और खुशियां देने की अनूठी ताकत होती है। यह जवानी को अभंग बना सकता है। इसलिए शौक ऐसा हो, जो आनंद और उल्लास की अविरल धारा बहाता रहे। शौक हमारे भीतर की खूबसूरती को निखार दे।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगेः जमाने के लिए
2 दुनिया मेरे आगेः जादुई दुनिया का दरवाजा
3 दुनिया मेरे आगे: गुम होती बतकही
ये पढ़ा क्या?
X