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नाम बनाम पहचान

मुझे वह कहावत याद आती रही कि ‘नाम में क्या रखा है’। अपने भारत में दीपक अपने घर में ‘चुन्नू’ हो सकता है या अरविंद अपने मां-पिता के लिए पचास साल की उम्र में भी ‘छोटू’ हो सकता है, लेकिन ताइवान से चीन तक में नामों की जिस परंपरा से वास्ता पड़ा, वह अद्भुत थी।
Author March 2, 2017 05:55 am
मुझे वह कहावत याद आती रही कि ‘नाम में क्या रखा है’। अपने भारत में दीपक अपने घर में ‘चुन्नू’ हो सकता है या अरविंद अपने मां-पिता के लिए पचास साल की उम्र में भी ‘छोटू’ हो सकता है, लेकिन ताइवान से चीन तक में नामों की जिस परंपरा से वास्ता पड़ा, वह अद्भुत थी।

अलका कौशिक 

चीनी मूल के अभिनेता जैकी चॅन का असल नाम जानते हैं आप? मार्शल आर्ट के मसीहा बन चुके ब्रूस ली का? जिन नामों से पूरी दुनिया इन सितारों से वाकिफ है, वे दरअसल उनके पश्चिमी नाम हैं। मूल नाम क्रमश: चेंग लॉन्ग और ली शियाओलॉन्ग हैं। हांगकांग से दिल्ली तक की उड़ान में किटी जब रात का खाना परोसने मेरी सीट पर पहुंची तो मेरा ध्यान उसके कोट पर टंकी नाम की पट्टी पर अटका रहा था। वहां दो नाम चस्पां थे, एक अंग्रेजी में किटी और दूसरा कैंटोनीज में था जो मेरी समझ से परे था। ताइवान से हांगकांग तक लोगों के इन दो नामों ने अच्छा खासा भरमाया था। ताइवान पर्यटन की आइरिसा चॅन असल में आइरिसा नहीं थी। वह चॅन शाओ युन थी। हमारी गाइड एस्थर ल्यू भी एस्थर नहीं थी। एयरपोर्ट पर हमें लेने आया फ्रैंक भी वह नहीं था जिस नाम से मेरी वाकफियत थी उसके साथ। उसके विजिटिंग कार्ड से पता चला कि वह को-हाओ-जुन था! नामों की इस गुत्थी में मैं उलझती जा रही थी। ताइपे से तेजरफ्तार रेल लेकर ताइचुंग के लीपाओ-लैंड एम्यूजमेंट पार्क पहुंचे और वहां मैनेजर जिलेन चॅन ने हमारा स्वागत किया तो मैंने उससे पूछा कि उसका असली वाला नाम क्या है! वह मुस्कराई और कहने लगी कि मैं लाख चाह कर भी उसके नाम का उच्चारण नहीं कर सकती। वह कितनी सही थी! उसके मंदारिन नाम को न मैं पढ़ पाई, न बोल पाई।

मुझे वह कहावत याद आती रही कि ‘नाम में क्या रखा है’। अपने भारत में दीपक अपने घर में ‘चुन्नू’ हो सकता है या अरविंद अपने मां-पिता के लिए पचास साल की उम्र में भी ‘छोटू’ हो सकता है, लेकिन ताइवान से चीन तक में नामों की जिस परंपरा से वास्ता पड़ा, वह अद्भुत थी। फ्रैंक ने अपना अंग्रेजी नाम खुद नहीं चुना था, बल्कि एलीमेंट्री स्कूल में उसके अंग्रेजी के टीचर ने यह नाम दिया था। एस्थर ने स्कूल में खुद अपना यह नामकरण किया था। आइरिसा के दोस्तों ने उसका पश्चिमी नाम रखा था। दरअसल, इन समाजों में पश्चिम से संपर्क की अच्छी-खासी परंपरा है। फ्रैंक पांच साल अमेरिका में पढ़ाई कर चुके हैं और विदेश प्रवास के दौरान अपना यह पश्चिमी नाम उन्हें काफी सहूलियत भरा लगा था। कितना खुशनुमा अहसास है यह कि दूसरों को आपका नाम पुकारने में ज्यादा जीभ न घुमानी पड़े, वे गलत उच्चारण न करें, नाम याद रखने के लिए उन्हें अपने दिमाग पर ज्यादा जोर न देना पड़े। फिर मूल मंदारिन / कैंटोनीज की ध्वनि के अभाव में उन्हें अपनी जुबान में ठीक से लिख-बोल न सके, इसलिए क्यों न ऐसा नया नाम भी अपनी हस्ती के साथ जोड़ लिया जाए जो बाकी लोगों के लिए आसान हो!

ताइवान में हरेक के पश्चिमी नाम को देख कर कोई भी सहज अंदाजा लगा सकता है कि वे यों ही मनगढ़ंत नाम नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे अच्छी-खासी सोच है, रचनात्मकता, स्टाइल और आडंबर भी है। अगर कोई जिल है तो उसके मंदारिन नाम में जरूर इसका कोई अंश मौजूद है। यानी अपने मूल नाम से मिलता-जुलता नाम चुनने की सोच हावी रहती है। दरअसल, सारा माजरा है अपनी पहचान को मिटने नहीं देने का। मंदारिन, कैंटोनीज जैसी भाषाओं में रखे नाम कठिन होते हैं और उन्हें यूरोप-अमेरिका में समझना और उच्चारित करना कठिन होता है। लिहाजा, जिसे भी पश्चिमी देशों से संपर्क रखना होता है, वह अपना दूसरा नाम चुनने में देरी नहीं करता। और चूंकि यह नाम आधिकारिक नहीं होता, इसलिए जब मन में आता है तो इसे बदल भी लेते हैं। अलबत्ता, पासपोर्ट या प्रमाणपत्रों पर या अन्य किसी भी दस्तावेज पर वही असल वाला नाम चलता है। असल कागजी पहचान के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होती, लेकिन दुनियावी व्यवहार में नाम को अपने व्यक्तित्व के हिसाब से मुलम्मा चढ़ा कर चुनने-बदलने की परंपरा पूर्व के कुछ देशों की खासियत है।

ताइवान अपने अतीत में डच, जापानी संस्कृतियों के प्रभाव में जी चुका है। आज भी उस पर अमेरिकी सांस्कृतिक प्रभाव है। उधर हांगकांग तो नब्बे के दशक तक ब्रिटिश उपनिवेश रह चुका है, लिहाजा विदेशी संस्कृति की छाया वहां भी है। कभी टीचर तो कभी अभिभावक ही बच्चों को आधुनिक दौर के मुताबिक एक नया नाम भी देते रहे हैं और कभी खुद ही स्टाइलिश नाम धारण करना बुरा नहीं माना जाता।‘सोशल मीडिया के दौर में मुझे जुलियन चॅन बन जाना ज्यादा आसान लगता है’ या फिर ‘इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान मेरे लिए खुद को एक नई पहचान देकर अपने शिक्षकों या दूसरे विद्यार्थियों को मेरे नाम के साथ जूझने से मुक्त कर देने में भलाई समझी मैंने’ जैसे बयान इन दोहरे नामों के पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक पहलू को जाहिर करते हैं। चीन में एक कहावत है कि ‘किस्मत भले फूट जाए, लेकिन नाम कतई बिगड़ना नहीं चाहिए’! तो कहीं मुख्य भूमि चीन से हांगकांग और ताइवान के टापू देशों तक में दोहरे नामों की परंपरा के पीछे इसका असर तो नहीं!

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