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शहर की शक्ल

पुरातन जीवन मूल्यों, पौराणिक-धार्मिक विश्वासों और इतिहास की गति को वापस ले जाने की कोशिश में लगी एक पार्टी के नेता के तौर पर नरेंद्र मोदी क्या दिल्ली को ‘वर्ल्ड क्लास सिटी’ बना सकेंगे? हम जैसे लोगों की यह कामना भी नहीं कि दिल्ली ‘वर्ल्ड क्लास’ बने! जीर्ण-शीर्ण कमीज में अगर मखमल का पैबंद लगा […]

पुरातन जीवन मूल्यों, पौराणिक-धार्मिक विश्वासों और इतिहास की गति को वापस ले जाने की कोशिश में लगी एक पार्टी के नेता के तौर पर नरेंद्र मोदी क्या दिल्ली को ‘वर्ल्ड क्लास सिटी’ बना सकेंगे? हम जैसे लोगों की यह कामना भी नहीं कि दिल्ली ‘वर्ल्ड क्लास’ बने! जीर्ण-शीर्ण कमीज में अगर मखमल का पैबंद लगा दिया जाए तो वह भद्दा ही लगेगा। लेकिन सवाल मौजूं इसलिए है कि क्या वे ऐसा कर सकते हैं?

एक ऐसा समूह, जिससे जुड़े लोग आधुनिक युग में भी देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की कवायद में लगे हों, जो अल्पसंख्यक धर्मावलंबियों की बढ़ती आबादी का खौफ दिखा कर बहुसंख्यक समुदाय को ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह दे रहे हों, जो सत्ता की राजनीति के लिए धार्मिक विद्वेष फैलाने में लगे हों, जो हिंदू कहलाने में ही राष्ट्रवाद की पूर्णता देख रहे हों, उसके नेता से क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि वह दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बना सकता है?

दिल्ली इस देश की राजधानी भी है। इसे विश्वस्तरीय शहर वही व्यक्ति या समूह बना सकता है, जो धार्मिक रूप से सहिष्णु हो और सही अर्थों में लोकतंत्र का हिमायती हो, नस्ली भेदभाव का विरोधी हो और मानवीय श्रम की गरिमा को बहाल करने में विश्वास करता हो। एक ऐसा इंसान जो अपने नसीब से देश के नसीब को जोड़ने के अवैज्ञानिक सोच का सार्वजनिक रूप से बखान करता हो, उससे हम कैसे आधुनिक भावबोध वाले विश्वस्तरीय शहर के निर्माण की कल्पना कर सकते हैं?

दिल्ली अभी ही जैसी है, खौफ पैदा करती है और अपने ऐश्वर्य या विलासिता से सामान्य जन को हीनता की भावना से भर देती है। ऐसा हर महानगर नहीं करता। कोलकता, सुदूर केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम और यहां तक कि मुंबई चले जाइए, आपको हीनता का वैसा बोध नहीं होगा जो कनाटप्लेस के सामने खड़े होने पर गांवों-कस्बों से गए आम भारतीय को होता है। अगर वह उसी लिहाज से ‘वर्ल्ड क्लास’ में तब्दील हो गया तो सामान्य लोगों के लिए और ‘दूर’ हो जाएगा।

लेकिन यहां हम इससे आशय एक ऐसे आधुनिक शहर का लगाते हैं जो तमाम बुनियादी सुविधाओं के साथ सही अर्थों में आधुनिक भावबोध वाला शहर होगा। जहां विजातीय प्रेमी युगल की हत्या नहीं होगी, वीआइपी और सामान्य लोगों की सुरक्षा में मामूली फर्क होगा। सभी को सुरक्षा मिलेगी, कला-संस्कृति को संरक्षण मिलेगा। जहां देर रात तक महिलाएं शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक सफर कर सकेंगी। जो तसलीमा नसरीन और हुसेन जैसों को आश्वस्त करेगा कि यहां आपको कोई बजरंगी तंग नहीं कर सकेगा। जहां झोपड़पट्टी नहीं होगी, लेकिन आम आदमी का भी गुजर-बसर हो सकेगा। सबसे बड़ी बात, जो हर भारतीय को यह अहसास कराएगी कि वह अपने देश की ही राजधानी में है, किसी गैर-मुल्क में नहीं। हमारे लिए तो यही होगा ‘वर्ल्ड क्लास’ शहर!

दुनिया के आधुनिक शहरों में अब आमतौर पर व्यक्तिगत सेवक रखने का रिवाज कम ही है। लोग अपने रसोईघर में खुद काम करते हैं, बर्तन-बासन से लेकर कपड़े आदि धोना। भारतीय लोग भी विदेश जाते हैं तो वहां नौकर नहीं रख पाते और अपना काम खुद करते हैं। घर की सफाई करनी हो तो खुद करो या फिर किसी एजेंसी से बात करो कि आकर घर की सफाई कर दे। सफाईकर्मी मोटी फीस लेगा, आधुनिक मशीनें लेकर आपके पीछे भी आएगा और घर की सफाई कर चला जाएगा। ऐसा इसलिए कि वहां अब मानवीय श्रम की कीमत बहुत ज्यादा है।

बौद्धिक श्रम और मानसिक श्रम की कीमत में बहुत थोड़ा फर्क। लेकिन हमारे यहां आर्थिक विषमता इतनी ज्यादा है कि अमीरजादों की बात छोड़ दीजिए, सामान्य मध्यमवर्गीय परिवारों का काम सेवकों के बिना नहीं चलता। सुबह इस चिंता से शुरू होती है कि आज महरी आएगी या नहीं। नहीं आई तो दिन का कबाड़ा! जो अमेरिका में संभव नहीं, वह भारत में संभव इसलिए है कि यहां आज भी मानवीय श्रम की बेहद कम कीमत है। हजार-बारह सौ रुपए में ऐसी महिलाएं मिल जाती हैं जो आपके घर में आकर झाड़ू-बुहारू से लेकर बर्तन-बासन, पोंछा सब कर दें। इसीलिए शहर शानदार भले बन जाए, उसके करीब ही झोपड़पट््टी भी बनेगी, जहां शहर की सेवा करने वाले- महरी, खानसामा, खोमचे लगाने वाला, दरबान, टेंपो चालक आदि- रहेंगे। बजबजाती झोपड़पट््टी तो आभिजात्य और सौंदर्याभिरुचि को ठेस लगाने के लिए रहेगी ही।

उपाय यही है कि हम न्यायपूर्ण व्यवस्था कायम करें। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री तो दुनिया भर में सस्ते भारतीय श्रम का ढिंढोरा पीटते घूम रहे हैं। उनकी नीतियों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और जल्दी ढह जाने की दिशा दे दी है। गरीबों की फौज रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की तरफ बढ़ती चली जा रही है और यह फौज हर शहर की धज्जियां उड़ा देगी!

 

विनोद कुमार

 

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