सृजन का पाठ

बच्चों की शिक्षा के प्रश्न को बस शिक्षाविदों, नीति-निर्धारकों और समाजशास्त्रियों पर नहीं छोड़ देना चाहिए।

सांकेतिक फोटो।

बच्चों की शिक्षा के प्रश्न को बस शिक्षाविदों, नीति-निर्धारकों और समाजशास्त्रियों पर नहीं छोड़ देना चाहिए। विशेषज्ञता के अपने फायदे हैं, पर इसने हर चीज को हवाबंद संदूकों में बंद भी कर दिया है। परिणाम यह हुआ कि हमारे अपने जीवन के साथ जो चीजें गहराई से जुडी हैं, उनके बारे में जानने के लिए भी हम विशेषज्ञों के पास जाते हैं। क्या शिक्षा मूल रूप से ऐसी विधा नहीं जो जीवन को उसकी समग्रता में समझना सिखाए और सुख, दुख, पीड़ा, हास्य, प्रेम, करुणा, नफरत, युद्ध, कुदरत के साथ हमारे रिश्ते, जिंदगी के सभी रंगों के एक साथ हमारी मेज पर रख दे? शिक्षा के क्षेत्र में इसकी संभावना सबसे अधिक रही है, पर इसे हमने गंवा दिया है, अपनी संकीर्ण समझ के कारण। स्कूलों में विषय तो पढ़ा दिए जाते हैं, पर जीवन का विराट क्षेत्र अछूता रह जाता है। शिक्षा बुद्धि को केंद्र ्रमें रख कर हृदय को अनदेखा कर देती है। जिन्हें हम शिक्षक कहते हैं, वास्तव में वे बस प्रशिक्षक भर बन कर रह जाते हैं- जीविका से संबंधित सूचनाएं देने वाले, एक संकीर्ण कोने में सिमटे हुए और जीवन के असीमित क्षेत्र से अनभिज्ञ और बेपरवाह।
हमारी शिक्षा का आधार है- इनाम, सजा और तुलना।

घर में मां-बाप और स्कूल में शिक्षक यही तरीका अपनाते हैं, बच्चों को पढ़ाने के लिए। कैसा लगता है जब अखबारों में पढ़ते हैं कि किसी बारह या पंद्रह वर्ष के बच्चे ने कम अंक पाने की वजह से डर कर खुदकुशी कर ली? हम यही सोच कर संतुष्ट हो लेते हैं कि कम से कम हमारे घर में ऐसा नहीं हुआ। पर ऐसा नहीं। एक भी बच्चा ऐसा करता है, तो उसका कलंक हम सबके हिस्से में आता है। हमने मिल कर एक ऐसा माहौल बनाया है जिसमें सफलता की पूजा की जाती है। बच्चा हर समय दबाव में रहता है। यह मानने के लिए अभी हम तैयार नहीं हुए कि बच्चे की स्वाभाविक रुचि नहीं भी हो सकती पढ़ने में। शिक्षक पर सवाल नहीं उठाए जा सकते, क्योंकि सही वह है, जो शिक्षक कहे। अफसोस कि भय का प्रतीक बन जाते हैं अधिकतर शिक्षक। चिंता, परेशानी, भय और झूठ से बच्चे का पहला परिचय अक्सर स्कूल में ही होता है। उसकी सृजनात्मकता, उसके बचपन पर पहला नश्तर हमारी तथाकथित शिक्षा और उसके वाहक शिक्षक ही लगाते हैं। बचा खुचा ‘काम’ मां-पिता और समाज कर देते हैं।

पूरा दृष्टिकोण ही तुलनात्मक है। कोई बच्चा हो सकता है अंग्रेजी में कमजोर हो, तो शिक्षक या मां-बाप उसे कहेंगे कि देखो तुम्हारा दोस्त या तुम्हारा भाई कितना अच्छा है अंग्रेजी में। सबसे पहले तो बच्चा इस तुलना से आहत होगा। आपका बच्चा मां से कहे कि मौसी तुमसे ज्यादा अच्छा खाना बनाती है, तो मां कैसा महसूस करेंगी? या फिर कहे कि पापा, अंकल के पास आपसे अच्छा घर है, तो यकीन मानिए आप जितना पीड़ित होंगे, बच्चा आपसे कई गुना ज्यादा दुखी होता है। तुलना से उसकी अंग्रेजी तो अच्छी होने से रही। हां, उसके मन पर एक जख्म और लग जाता है। हो सकता है कि बच्चा अंग्रेजी में कमजोर हो, लेकिन संगीत में बहुत अच्छा हो। हो सकता है, उसकी भौतिकी असाधारण तौर पर अच्छी हो। लेकिन हमारे रवैये ने उसकी अंग्रेजी तो बिगाड़ ही दी, उसकी किसी दूसरे विषय में अच्छा कर दिखाने की जो संभावना थी, उसे भी नष्ट कर दिया।

अक्सर शिक्षक बच्चों की कॉपी पर लिख देते हैं- ‘गुड, वेरी बैड, वेरी पुअर’। ये शब्द बच्चे को बहुत दुख देते हैं। बेहतर है कि शिक्षक सिर्फ ‘सही’ या ‘गलत’ लिखें। कोई भी संवेदनशील शिक्षक उस बच्चे को जरूर महत्व देगा, जिसने अपने हाथों से एक ‘बेढंगी’ कलाकृति या पेंटिंग बनाई हो। पर अगर कोई बच्चा वास्तव में अपनी सृजनात्मकता दिखाए, तो उसे नंबर कम मिलते हैं। सृजनात्मकता को शिक्षक परिभाषित करता है। उससे अलग होकर कोई सृजनशील नहीं हो सकता।

सबसे पहले तो शिक्षक को एक दोस्त होना चाहिए। दोस्त का मतलब है, आप जैसे हैं आपको वैसे ही स्वीकार करने वाला। किसी बच्चे का दोस्त होना, उससे जुड़ना मुश्किल होता है। और इसलिए हम उसे ‘मैनेज’ या उसका प्रबंधन करना चाहते हैं। विशेषज्ञों की राय लेकर। शायद न हमारे पास इतना वक्त है, न धैर्य। उसकी और हमारी ऊर्जा में बड़ा फर्क होता है। दुख और परेशानी से दूर रहता है वह। वर्तमान क्षण में रहता है, अतीत का बोझ और भविष्य की चिंता से दूर होता है। हम, बड़े-बूढ़े लोग समाज में रहते हुए, उसके मूल्यों का बोझ ढोते हुए, उसके हिसाब से बच्चे को ढालने के लिए परेशान रहते हैं।

इन सभी पुराने तौर-तरीकों का परिणाम यह है कि छोटी होती जा रही है बचपन की उम्र। खेलने-कूदने के दिन भय में और चिंता में निकल जा रहे हैं। बच्चे दर्द में हैं, और समाज अपने तमाम साजो-सामान के साथ उनको ‘खत्म’ करने के इंतजार में है। सफलता के उपासक इस समाज में उन्हें ढालने की, उन्हें ‘सामान्य’ बनाने की कोशिशें पूरी गंभीरता से की जा रही है। और इस ‘सामान्य’ समाज की हरकतें, इसकी ‘कामयाबी’ को जानने के लिए बस रोज अखबार के दो-चार पन्ने पलटने की जरूरत है। कई तरह के दबावों के बीच सांस रुकी जा रही है बचपन की, उसके साथ जुड़े भोलेपन और मासूम बेफिक्री की। बच्चा डर रहा है बड़ा होने से। और जिम्मेदारी है हम बड़ों की।

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