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दुनिया मेरे आगे: खुदकुशी की कड़ियां

हमारे यहां संयुक्त परिवार थे। एक-दूसरे से गुंथे-उलझे घर के सदस्य! सुख-दुख में एक साथ! गमी-कमी में एक साथ! सुख-सुविधाओं के अभाव में भी वे भीतरी संपन्नता का जीवन जीते थे! घर में पांच-छह भाई-बहन आपस में खेलते, लड़ते-झगड़ते एक साथ बड़े होते थे! आज वैश्वीकरण की संस्कृति में हमारे यहां भी एकल परिवार हो गए है!

वैश्वीकरण के दौर में हर कोई व्यस्त और अकेला है। मशीनी जिंदगी में भावनाएं भी मर रही हैं और बढ़ रही आत्महत्या की प्रवृत्ति।

पिछले कुछ समय से आने वाली खबरों पर नजर जाती है तो एकबारगी दहशत होती है। कहीं किसी युवक ने फांसी का फंदा डाल कर आत्महत्या कर ली, कहीं कोई महिला घर की तीसरी मंजिल से कूद कर मर गई। एक परिवार में मां अपने दोनों छोटे बच्चों के साथ रेल की पटरी पर कट कर मर गई! आखिर क्यों? मनुष्य सबसे अधिक मोह खुद से करता है। वह हर हाल में जीना चाहता है। फिर इस तरह आत्महत्याएं क्यों? वास्तव में ये आत्महत्याएं नहीं, प्रकारांतर से हत्याएं हैं! मनुष्य के अपने करीबी, समाज और स्थितियां मिल कर इसकी पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। आम आकलन यह है कि संवादहीनता, अकेले होने की निस्सहायता से उपजी भीतर की वीरानगी से व्यक्ति ऐसा कदम उठाता है।

एक उपन्यास है- ‘अपार्थ’! अपार्थ, यानी जो पार्थ नहीं है। जो अर्जुन नहीं है, यानी जो लड़ने के विरुद्ध है। गीता में कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद इसी पर आधारित है। ‘अपार्थ’ में मुख्य पात्र फांसी के फंदे में लटका है, पर वह मरना नहीं चाहता। अपनी गलती पर पछता रहा है। वह सोचता है कि जीने के तो कोई दूसरे तरीके भी हैं! फिर उसने ऐसा क्यों किया? वह जी सकता था। उसे मरना नहीं था। पर अब क्या?

सबसे ज्यादा आत्महत्याएं सबसे अधिक विकसित और समृद्ध देशों में होती है। अपने अनुभव से कहूं तो ब्रिटेन में वर्ष में पांच महीने शाम चार बजे से अंधेरा हो जाता है। जलवायु अत्यधिक ठंडा और निर्मम है। चारों तरफ अंधेरा और अकेलापन। परिवार सीमित। देर रात तक रेस्तरां के बाहर बरामदों में बैठते हैं! मद्यपान करते हैं! दोस्त हों तो आपस में बतियाते हैं। नहीं तो अकेले ही बैठते हैं! रात को दस-ग्यारह बजे अकेले घर में लौट आते हैं? उनके भीतर की दुनिया में एक उजाड़ पसर जाता है। अंधेरा घेर लेता है। कोई अनहोनी, अनचाही घटना बर्दाश्त के बाहर होती है। बर्दाश्त कर सके, यह आश्वासन कहीं से नहीं मिलता। अंत में जीवन निष्फल लगने लगता है! असहनीय होता है तो आत्महत्या!

हमारे यहां संयुक्त परिवार थे। एक-दूसरे से गुंथे-उलझे घर के सदस्य! सुख-दुख में एक साथ! गमी-कमी में एक साथ! सुख-सुविधाओं के अभाव में भी वे भीतरी संपन्नता का जीवन जीते थे! घर में पांच-छह भाई-बहन आपस में खेलते, लड़ते-झगड़ते एक साथ बड़े होते थे! निचले और मध्यवर्ग में सर्वाधिक इंजीनियर, डॉक्टर, प्रबंधन, बैंक और अन्य महत्त्वपूर्ण स्थानों पर होते थे। आज वैश्वीकरण की संस्कृति में हमारे यहां भी एकल परिवार हो गए है!

नाबालिग बच्चे घरों में डिजिटल दुनिया से जुड़े हैं! माता-पिता उनमें सफलता और प्रथम होने की ‘स्पर्धा’ करते हैं! हर बच्चा अलग व्यक्तित्व होता है। इसे जाने बिना बच्चों पर दबाव रहता है। उनके भीतर क्या घट रहा है, वह बाहर नहीं आता। वे अपने भीतर का किसी से कह सकें, कोई सुन सके उन्हें, आश्वासन दे सकें! ऐसा कोई आसपास नहीं होता। चौदह-सोलह साल के बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं।

यही स्थिति बुजुर्गों की भी है। वे अकेले और असहाय हैं। कहते हैं, रोने के लिए एक कंधा तो चाहिए होता है। अपने भीतर की अनकही सुनाने के लिए कोई न कोई जरूर होना चाहिए। पर नहीं होता? आपसी संवाद होना ही चाहिए। पर सभी अपने में व्यस्त या डिजिटल दुनिया में खोए। आत्महत्या और महामारी में आपसी संवाद, संवेदनशीलता और संबंध ही बचाव का रास्ता है। जब व्यक्ति निरुपाय, निसहाय, अकेला होकर व्यर्थता बोध से घिर जाता है तो आत्महंता हो जाता है।

दरअसल, वह आत्महत्या नहीं है। उसके अपने, सगे संबंधी, मित्र, समाज और समय से उपजी विंसगतियां ही उसकी हत्या की जिम्मेवार है। क्या यहां से वापसी संभव है? बढ़ती भौतिकता, सुख-सुविधाओं और महत्त्वाकांक्षाओं के साथ शून्य होते संवाद और संबंधों पर लौटना कब होगा? क्या संभव है कि पारिवारिक सामाजिक संबंधों और संवाद की वापसी हो? ससुराल में प्रताड़ित, शोषित और पीड़ित और विकल्पहीन युवतियां आत्महत्या कर लेती हैं।

पितृसत्तामक समाज उन्हें कोई विकल्प नहीं देता। मूल कारण आत्महत्या का विकल्पहीनता की निरीह सोच है। जबकि समय और स्थितियां हमेशा विकल्प देती हैं। जो किसी तरह आत्महत्या करने से बच गए, बाद में वे अपने बनाए शिखर पर पहुंचे। उनमें अशिक्षित ग्रामीण औरतें भी हैं, जिन्हें सिर्फ सीना-पिरोना आता था। चारों ओर से निराश्रित होकर पहले अपना पेट पाला। फिर दूसरों को साथ जोड़ा, करते-करते बड़ी संस्था और संगठन के रूप में उभरी।

फिर भी, आत्महत्या का निर्णय अकस्मात नहीं लिया जाता। उसके पीछे लंबे समय तक चलती हताशा, निरीहता और अकेला हो जाना होता है। ऐसे में अगर कोई उसे संवेदना, सहज अपनेपन का और ‘मैं हूं’ का आश्वासन दे सके, तो घटना टल सकती है। पर इसकी पहचान भी जरूरी है। अपने में खोए हम अपने बच्चों, मित्रों, सगे संबंधियों में किसी कारणवश आए इस परिवर्तन को देखते हैं। पूछते भी है, फिर नजरअंदाज कर जाते हैं। जरूरी है रिश्तों में बढ़ते उजाड़ में अपनेपन और आत्मीयता की हरियाली लाई जाए।

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