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दुनिया मेरे आगे: आंकड़ों में जिंदगी

जिंदगी जब आंकड़ा हो जाती है तो उसे प्रतिशत में शीर्षक दे देना कितना दिलासा भरा लगता है। लेकिन भूख तो भूख है, मौत तो मौत है। उसे आंकड़ों और प्रतिशत में कब तक बांधेंगे!

हर चीज को आंकड़ों से मापने पर हकीकत और परिणाम भ्रमित करते हैं।

सुरेश सेठ

भारत का हर नागरिक दुनिया का सातवां आदमी है। इजरायल के बाद भारत दुनिया का दूसरा देश है, जिसने जनसंख्या नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन की नीति घोषित की थी। अपनी इस प्रगतिशीलता की हम प्रशंसा कर सकते हैं, लेकिन तनिक परिणाम भी देख लीजिए। इस प्रयास के बावजूद आज हालत यह है कि हम दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश चीन को पछाड़ने जा रहे हैं। एक अरब पैंतीस करोड़ का आंकड़ा तो हम पार कर गए।

खैर, अधिक आबादी की भीड़ का लाभ यह होता है कि जब देश की नाकामी की गणना करनी हो तो सीधा आंकड़ा गिनने के बजाय प्रतिशत दर से कर लें। पराजय की तस्वीर इतनी भयावह नहीं लगेगी। अब देखिए न, कोरोना महामारी के नियंत्रण में हम चारों खाने चित्त गिरे हैं। पहले प्रचार किया जा रहा था कि इस वायरस का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार ने ठीक समय पर कदम उठा लिए। इतना बड़ा देश है, इतनी आबादी, लेकिन सरकार ने सटीक समय पर पूरा देश बंद करने में लेटलतीफी नहीं की। टालमटोल नहीं की। पूरा देश एकदम बंद कर दिया गया, और वह भी चार चरणों तक।

इसी से कोरोना प्रकोप फैलने में देर लगी। प्रतिशत में देखें तो दुनिया भर के देशों में दर्जन भर देशों से हम पीछे चल रहे हैं। मगर असल संख्या और संक्रमण बढ़ने की तेजी देखें, तो यह दुनिया का तीसरा देश बन जाता है। पाकिस्तान जैसे देश हमसे अच्छी हालत में हैं। भारत में इस रोग से मरने वालों की दर निरतंर कम हो रही है। घटते-घटते सवा दो प्रतिशत पर आ गई। लेकिन लीजिए, फिर वही प्रतिशत का दिलासा। माशा अल्लाह! केवल आंकड़े देखें तो हमारी मौतें यूरोप के देशों से कम नहीं। लो कर लो घी को बर्तन।

एक ही तस्वीर को रुख बदल कर देखने का यह प्रयास महामारी की भयावहता मापने के लिए ही क्यों करते हैं? पंचवर्षीय योजनाओं की इस असफलता, भ्रष्टाचार में वृद्धि भुखमरी में तरक्की या आत्महत्याओं में वृद्धि। यहां देखें, तो आंकड़े चौंका देते हैं। इसलिए बेहतर यही है कि अपना निकम्मापन छिपाना हो तो प्रतिशत में छिपाएं और अपनी सफलता का बखान करना हो तो असली आंकड़ों में बखानें।

पतिदेव दारू पीकर सामान्य समय से चार घंटे बाद यानी रात दो बजे वापस लौटे तो अपनी श्रीमती जी की अदालत में स्पष्टीकरण देते हुए कितने भोले लगते हैं, ‘अजी क्या हुआ, मात्र पंद्रह प्रतिशत ही तो विलंब से आया हूं।’ वाह प्रतिशत! इतना ही नहीं बंधु, आंकड़ों का प्रतिशत ही वह हथियार है, जिससे आप राजनीति से लेकर समाज तक में अपनी शोभा दोगुनी या विरोधी को मटियामेट कर सकते हैं। यही हाल आजकल देश में चल रहा है। जनता चिल्ला रही है कि इन कठिन दिनों में आकाश छूती महंगाई ने हमारा हुलिया बिगाड़ दिया है। परचून कीमतें इतनी तेजी से बढ़ीं कि इन्होंने पिछले दशक के रिकार्ड पस्त कर दिए।

अब इनकी वृद्धि दर पांच प्रतिशत से लेकर तेरह प्रतिशत है। पांच प्रतिशत खाद्य सामग्री में और तेरह प्रतिशत तक रोजमर्रा के फल-सब्जियों की कीमत में। लेकिन इसका मुकाबला करने वाला इन्हीं कीमतों में वृद्धि को शून्य प्रतिशत से भी नीचे बता सकता है। अंतर केवल इतना होगा कि वह थोक कीमतों के परिवर्तन की बात करेगा, जबकि आप परचून कीमतों की बात कर रहे हैं।

फिर पानी भरे गिलास को आधा खाली या आधा भरा हुआ बता कर अलग-अलग राग अलापने वाले कम नहीं। चुनाव करीब आ रहे हैं। अब सत्ता पक्ष बताएगा कि उसने अपने कार्यकाल में कितने प्रतिशत नई नौकरियां पैदा कीं और सत्तापेक्षी कहेगा कि उनके इलाके में बेरोजगारी में कितने प्रतिशत वृद्धि हुई।

लीजिए साहब, यह सच तो दृष्टिबाधितों का हाथी हो गया। कानून व्यवस्था का निगहबान थानेदार बताता है कि उसने पिछले बरस की तुलना में कितने प्रतिशत अपराधी अधिक पकड़े। समाज का ठेकेदार आपको अपराधों का प्रतिशत और वृद्धि बता कर और अधिक डरा देता है। आप डरेंगे तभी तो वह तारणहार बन कर अपनी शोभा का झंडा बुलंद कर सकेगा। मगर आंकड़ों की असल संख्या और प्रतिशत वृद्धि की तुलना का भ्रमजाल तोड़िए। सच बताइए कि अपनी फसल का इस साल भी उचित दाम न मिलने के कारण जो किसान मंडी के चौराहे पर फंदा लगा कर मर गया, उसकी दारुण व्यथा कम नहीं थी। चाहे इस साल इन अभागों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम नहीं।

लीजिए, इधर कोरोना भी इस बरस परीक्षाएं नहीं दे रहा तो क्या, औसत प्रतिशत के आधार पर पिछले बरस जो फेल हो गया, उसे इस बरस भी यही भाग्य दे दें, चाहे इस बीच उसने पढ़-पढ़ कर अपनी आंखें फोड़ ली हों। प्रतिशत के रस्से से संख्या को बांध तो लें, लेकिन एक अकेले नेह भरे दीये को हमेशा ही पंक्ति को नहीं दिया जा सकता बंधु। जिंदगी जब आंकड़ा हो जाती है तो उसे प्रतिशत में शीर्षक दे देना कितना दिलासा भरा लगता है। लेकिन भूख तो भूख है, मौत तो मौत है। उसे आंकड़ों और प्रतिशत में कब तक बांधेंगे!

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