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दुनिया मेरे आगे: भरोसे का पाठ

आमतौर पर स्कूली शिक्षकों के बारे में कुछ धारणाएं प्रचलित हैं। उदाहरण के लिए उन्हें ‘गुरु’ का विशेषण देकर इतनी ऊंचाई पर बैठा दिया जाता है कि वे अपने रोजमर्रा के अनुभवों के सापेक्ष इस विशेषण के प्रयोग के औचित्य को नहीं स्वीकार कर पाते।

ऋषभ कुमार मिश्र

आमतौर पर स्कूली शिक्षकों के बारे में कुछ धारणाएं प्रचलित हैं। उदाहरण के लिए उन्हें ‘गुरु’ का विशेषण देकर इतनी ऊंचाई पर बैठा दिया जाता है कि वे अपने रोजमर्रा के अनुभवों के सापेक्ष इस विशेषण के प्रयोग के औचित्य को नहीं स्वीकार कर पाते। उन्हें अभिभावक जैसा दर्जा देकर बच्चों के सर्वांगीण विकास का दायित्व दे दिया जाता है। यहां ‘सर्वांगीण’ का अभिप्राय संज्ञानात्मक और बौद्धिक विकास के लिए रूढ़ कर दिया गया है। या फिर उन्हें राज्य एक ऐसे कर्मचारी के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जिसका काम राज्य के लक्ष्यों और विचारधारा को बिना सवाल किए लागू करना है। इन भूमिकाओं में उनकी सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता को गौण कर दिया जाता है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे ‘भावी नागरिकों’ का विकास करें, लेकिन इसके लिए उन्हें केवल इतनी आजादी है कि वे पाठ्यक्रम में दिए और परीक्षा में पूछे जाने वाले ज्ञान के दायरे में उक्त विकास कर सकते हैं। लेकिन इस तस्वीर के बरक्स कुछ समय पहले एक ऐसे भिन्न अनुभव से गुजरना हुआ, जिसमें अध्यापन वृत्ति की नई संभावनाएं दिखीं।

स्कूल में लगी शिकायत पेटी को एक दिन खोला गया तो उसमें किसी विद्यार्थी ने प्रधानाध्यापिका के बारे में लिखा था कि वे बहुत बोलती हैं। शिकायत प्रधानाध्यापिका के सामने थी, लेकिन वे इससे तनिक भी विचलित नहीं हुर्इं। इसे गंभीरता से लिया गया और तय किया गया कि प्रार्थना सभा में इस पर भी चर्चा होगी। विद्यालय के विद्यार्थी ऐसे परिवारों से नहीं आते हैं जहां परिवार में बच्चों को अपनी बातों को कहने और जिरह करने की आजादी है। वे भी ऐसे ही परिवारों से हैं, जहां बच्चे से पूछा नहीं जाता, बल्कि उसे बताया जाता है। यह स्कूल इस छवि के उलट उन्हें पूछने का मौका देता है। इसके लिए विद्यालय की संस्कृति को धन्यवाद दिया जाना चाहिए जहां बच्चे को हक है कि अपने विचार जाहिर कर सके। यहां बच्चे को विश्वास है कि उसकी आवाज सुनी जाएगी, शिक्षकों द्वारा यह संप्रेषित किया गया है कि बच्चे और शिक्षक अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का उपयोग कर सकते हैं, यह अभ्यास है कि आवाज को दबाने के बदले संवाद, समस्या-समाधान का तरीका होना चाहिए।

अगले दिन की प्रार्थना सभा में प्रधानाध्यापिका ने अपना पक्ष रखा, बिना किसी तल्खी, असंतुष्टि या किसी छिपी हुई हिदायत के। बल्कि उन्होंने बच्चों से सुझाव और उदाहरण मांगे कि उन्हें कब, कौन-सी बात गैरजरूरी लगी। ऐसा नहीं था कि विद्यार्थी चुप हो गए। नौवीं कक्षा के एक छात्र ने बताया कि प्रधानाध्यापिका ने उनकी कक्षा को खेलने से रोका था और इसके बाद एक लंबा भाषण दिया था। शिक्षिका ने सुझावात्मक या निर्देशात्मक टिप्पणी न करते हुए इस विद्यार्थी के सामने सवाल रखे। जैसे- एक बड़ी कक्षा में खेलने का समय उतना ही होना चाहिए जितना छोटी कक्षा में? खेलने और पढ़ने में कैसे संतुलन बैठाया जा सकता है? इसके बाद प्रधानाध्यापिका ने विद्यालय के सभी विद्यार्थियों को आमंत्रित किया कि वे ‘अधिक बोलने’ की कुछ घटनाओं का उदाहरण शिकायत पेटिका में डालें, जिस पर फिर चर्चा की जाएगी।

हेनरी जीरू अध्यापन कर्म की चर्चा करते हुए अध्यापकों को बौद्धिक बदलाव का नायक मानते हैं। यहां नायक और अधिनायक में फर्क करना जरूरी है। अधिनायक अपनी सत्ता और विचारों के सामने संवाद की संभावना को न्यूनतम करता है, जबकि नायक संवाद की हर संभावना को जीवित रखता है। प्रधानाध्यापिका ने अपने बारे में आई शिकायत पर प्रतिक्रिया न करते हुए बातचीत के जरिए बच्चों के विचारों को जानने की कोशिश की। अधिनायक अपने कद को औरों की अपेक्षा बड़ा रखने का यत्न करता है, जिससे उसकी सत्ता को चुनौती न मिले। जबकि नायक की उपस्थिति औरों की सत्ता को स्वीकारती है और उन्हें भी आगे आने का मौका देती है। प्रधानाध्यापिका ने बच्चों की शिकायत को स्वीकार कर अपने नायकत्व का प्रमाण दिया।

अधिनायक मातहतों को कमजोर होने का अहसास कराता है, जबकि नायक उन्हें ताकतवर होने की अनुभूति देता है। जब प्रधानाध्यापिका बच्चों से संवाद कर रही होंगी, उस समय बच्चों में इतना विश्वास जरूर पैदा हुआ होगा कि उनकी असहमति और प्रतिरोध को भी स्कूल में स्वीकार किया जाता है। यह उदाहरण प्रमाण है कि कैसे शिक्षक अधिनायक बनने के बदले नायकत्व को प्रतिष्ठित कर सकते हैं। यह नायकत्व उनकी खुद की अस्मिता को मजबूत करता है। विद्यालयी व्यवस्था और सामाजिक बदलाव के प्रति समर्पण के भाव को बल देता है।

एक ऐसे दौर में जब लोकतंत्र की परिकल्पना से अधिक उसका व्यवहार आवश्यक है, जब समाज और राजनीति से जुड़े मुद्दों से बच्चों को दूर रखने के बदले उनसे जूझने की समझ पैदा करनी है, जब स्कूल को कामकाजी श्रमिक पैदा करने के कारखाने के बदले आलोचनात्मक विवेक वाले नागरिक तैयार करने हैं ऐसे ही स्कूलों और स्कूलों का संचालन करने वाले शिक्षकों की जरूरत है जो बेहतर कल की उम्मीद को बनाए रखें।

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