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दुनिया मेरे आगे: प्रकृति का पाठ

सागर जिले के राहतगढ़ प्रखंड में कल्याणपुरा प्राथमिक स्कूल के एक शिक्षक ने पक्षियों के अध्ययन और संरक्षण को लेकर मिसाल कायम की है। उन्होंने बच्चों में पक्षियों के प्रति इस कदर ललक पैदा कर दी है कि वे स्कूल के अलावा अपने सुबह-शाम और अवकाश के दिनों में भी पक्षियों का अवलोकन करते रहते हैं और दाना-पानी की व्यवस्था जुटाते रहते हैं।

शिक्षक छात्रों में सीखने की ललक पैदा करते हैं। यही ललक छात्रों को कुछ नया करने को प्रेरित करती है।

कालू राम शर्मा

शिक्षक दिवस को एक प्रेरणा के रूप में मान्यता मिल चुकी है। इस मौके पर पारंपरिक धारणाओं से थोड़ा इतर मैं एक स्थानीय, मगर अनूठा और दिल को छूने वाले उदाहरण के जरिए कुछ बातें करना चाहता हूं। पर्यावरण शिक्षा को लेकर यह एक जीती-जागती मिसाल है जो एक आस जगाती है कि देश में संवेदनशीलता मौजूद है। यह इसलिए और अहम मिसाल हो जाती है कि एक सरकारी स्कूल के बच्चों और शिक्षक की पहल का यह परिणाम है। स्कूली शिक्षा में काम करते हुए पिछले कुछ वर्षों से मैंने स्कूली बच्चों, युवाओं और शिक्षकों के साथ सक्रिय रूप से पक्षी दर्शन को लेकर काम किया है।

हालांकि इस तरह की पहलकदमी के तहत अनेक शिक्षक और युवाओं ने भी पक्षी दर्शन को अपने अध्ययन का केंद्र बनाया। ये वे लोग हैं जो पक्षियों को बचाने को लेकर हरदम सोचते रहते हैं और इनके विविध पहलुओं पर समझ बनाने की कोशिश करते रहते हैं। मेरे संपर्क में सरकारी स्कूलों में कार्यरत ऐसे अनेक शिक्षक आए जो अपने क्षेत्र के पक्षियों का खुद भी अवलोकन करते हैं और बच्चों को भी प्रेरित करते हैं।

सागर जिले के राहतगढ़ प्रखंड में कल्याणपुरा प्राथमिक स्कूल के एक शिक्षक ने पक्षियों के अध्ययन और संरक्षण को लेकर मिसाल कायम की है। उन्होंने बच्चों में पक्षियों के प्रति इस कदर ललक पैदा कर दी है कि वे स्कूल के अलावा अपने सुबह-शाम और अवकाश के दिनों में भी पक्षियों का अवलोकन करते रहते हैं और दाना-पानी की व्यवस्था जुटाते रहते हैं।

दरअसल, एक दिन वे शिक्षक बच्चों को स्कूल से बाहर पक्षी दर्शन के लिए ले गए तो उन्हें एक गिद्ध मरा हुआ मिला। शिक्षक और बच्चों ने यह समझना चाहा कि गिद्ध की मृत्यु के पीछे क्या वजह होगी। गौरतलब है कि इन दिनों गिद्धों की संख्या में बेतहाशा कमी आई है। इस विषय पर शिक्षक ने बच्चों के साथ बातचीत की। अब बच्चे और शिक्षक पक्षियों के अवलोकन के लिए स्कूल से जंगल में जाने लगे और गिद्धों समेत तमाम पक्षियों पर नजर रखने लगे हैं।

जाहिर है, जब स्कूल में होने वाले कामों को दिलचस्प तरीके से किया जाएगा तो उसकी खबर दूर-दूर तक फैलेगी। अब आसपास के गांवों में हर जगह यही चर्चा आम है। जब बच्चे घर से स्कूल जाते हैं तो उनकी नजर पक्षियों पर टिकी रहती है। तीसरी कक्षा के एक छात्र ने स्कूल जाने के रास्ते में पुल के नीचे मरे हुए उल्लू को देखा और स्कूल आकर शिक्षक से पूरा वाकया बताया। शिक्षक उस छात्र के साथ गए तब तक शायद कोई कुत्ता उसे उठा कर ले जा चुका था। वहां उल्लू के पंख बिखरे पड़े थे। अब बच्चों और शिक्षक ने मिल कर यह तय किया कि हम पक्षियों का अवलोकन तो करेंगे ही, इन्हें कोई मारे नहीं, इस पर भी काम करेंगे।

पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता की मिसाल वहां के बच्चों ने पेश की है। शिक्षक के नेतृत्व में बच्चे अब पक्षियों की मृत्यु के कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इस काम में गांव के लोगों को भी जोड़ा जा रहा है। स्कूल के बच्चों ने गांव में पक्षियों की देखभाल के प्रचार-प्रसार को लेकर रैली निकाली। दिलचस्प यह है कि बच्चों ने अपने-अपने घरों में पक्षी को लेकर प्रोजेक्ट बनाए।

स्कूली शिक्षा का जीवन की शिक्षा से जुड़ाव की यह अनूठी मिसाल है। बच्चे अपने घरों के आंगन में पक्षियों को दाना-पानी रखते हैं। बच्चे अब होमवर्क के रूप में अपने द्वारा अवलोकन किए गए पक्षियों के सुंदर चित्र बनाते हैं। बच्चों के सवालों के जवाब खोजने के लिए शिक्षक किताबों, पत्रिकाओं और इंटरनेट का सहारा लेते हैं। वे पक्षी विशेषज्ञों से फोन पर चर्चा करते हैं और सवालों के जवाब पता करके बच्चों को बताते हैं।

एक दिन शिक्षक ने कार्ड-बोर्ड के डिब्बे को स्कूल की दीवार पर लगा दिया। कुछ ही दिनों में गौरैया के एक जोड़े ने घास-फूस लाकर उसमें रखना शुरू किया। फिर उसमें अंडे दे दिए। शिक्षक ने इस अनुभव से सीख लेकर बच्चों को कई डिब्बे उपलब्ध करवाए, जिन्हें बच्चों ने अलग-अलग जगहों पर टांग दिया। अब दीवारों, पेड़ों आदि पर लगाए गए डिब्बों को अलग-अलग पक्षी घोंसला बनाने के लिए चुन रहे हैं।

एक स्कूल का मकसद विद्यार्थियों को अपने परिवेश के प्रति जागरूक बनाना और समस्त जीवों के प्रति संवेदनशीलता का भाव रखने और संरक्षित करने के लिए प्रेरित करना भी है। इस लिहाज से देखें तो बच्चों के साथ मिल कर सीखने-सिखाने के काम में लगे शिक्षक की मेहनत को समुदाय में शिक्षा का ताना-बाना बुनने के साहसिक कदम के तौर पर देखा जा सकता है। बच्चे उष्मा, ऊर्जा, उमंग से लबरेज हैं। गांव में जहां-जहां बच्चों को फाख्ता, गौरैया, कौवा आदि के घोंसले दिखाई देते हैं, वे उनकी सुरक्षा करते हैं।

बेशक किसी भी विषय का अध्ययन सार्थक और अर्थपूर्ण होना चाहिए। यह मिसाल सरकारी स्कूल के एक शिक्षक ने बच्चों के साथ मिल कर सामने रखा है। सार्वजनिक स्कूली शिक्षा व्यवस्था के मामले में यह चाहे एक छोटा या अपवाद उदाहरण हो, मगर इसे नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

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