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दुनिया मेरे आगेः ठहरा हुआ मौसम

शिमला शहर के मुख्य बस अड्डे से मालरोड की तरफ चढ़ाई वाला एक पैदल रास्ता। इस रास्ते की शुरुआत में खुले आसमान के नीचे एक परिवार का बसेरा है। रास्ते पर कम्बल लपेटे एक व्यक्ति लेटा हुआ था।

संजय ठाकुर

शिमला शहर के मुख्य बस अड्डे से मालरोड की तरफ चढ़ाई वाला एक पैदल रास्ता। इस रास्ते की शुरुआत में खुले आसमान के नीचे एक परिवार का बसेरा है। रास्ते पर कम्बल लपेटे एक व्यक्ति लेटा हुआ था। इससे थोड़ी दूरी पर टांग-बाजू सिकोड़े दुबक कर एक महिला बैठी थी और उसके पास ही कूड़े के ढेर के बगल में दो-तीन बच्चे खेल रहे थे! बच्चों के शरीर पर कपड़े नाम भर के थे। जो थे, उनके लिए ‘चीथड़े’ सही शब्द है। जबकि मौसम में खूब सर्दी थी। एक तरफ सर्दी नया रिकॉर्ड बना रही थी तो दूसरी तरफ जिंदगी बगैर रंग और कैनवास के एक दर्दनाक और झकझोरने वाली तस्वीर उकेर रही थी।

शिमला को खूबसूरत नजारों के लिए जाना जाता है। मगर वहीं यह नजारा भी था, जो मानो दर्द और संवेदनाओं का इम्तिहान ले रहा हो। आसपास से गुजरने वाले लोग दिल को झकझोरने वाले इस नजारे को देख कर चुपचाप आगे बढ़ते रहे, कुछ अनदेखा भी करके निकल गए। वे अगर कुछ करते भी, तो क्या करते… कहां तक और कितना करते! उसके बाद भी मेरा वहां से गुजरना हुआ और उस परिवार को मैंने वहीं देखा। वहां से गुजरते हुए बेशक मैंने अपने साथ-साथ लोगों की संवेदना के पैमाने और सीमाओं के बारे में सोचा। लेकिन मैं हर बार सोचता रहा कि हमारी ‘व्यवस्था’ क्या इन्हें जमीन के एक छोटे-से टुकड़े पर एक छत भी नहीं दे सकती!

शहरों में जब हम सड़कों के किनारे से गुजरते हैं तो अक्सर किसी निर्माण की सूचना या शिलान्यास पट्टिका लगी दिख जाती है। यह एक विडंबना ही है कि एक शिलान्यास पट्टिका के निर्माण और शिलान्यास समारोह पर लाखों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं, जबकि देश की एक बड़ी आबादी के लिए सिर ढकने की छत ही मयस्सर नहीं है। यह स्थिति उस तस्वीर के बरक्स है जिनमें सार्वजनिक शौचालयों तक के उद्घाटन पर लाखों रुपए लुटाए जाते हैं। किसी सार्वजनिक कार्यक्रम के आयोजन या समारोह पर करोड़ों रुपए सरकारी तौर पर भी खर्च कर दिए जाते हैं। लेकिन सबको सब कुछ सहज लगता है। यह सहज लगना ही असली समस्या है!

ऐसे में अगर कोई ईमानदारी से देखना चाहे तो उन लोगों को देखे जो कड़ाके की ठंड या चिलचिलाती धूप में खुले आसमान के नीचे दिन गुजारने को मजबूर हैं तो ‘व्यवस्था’ का अव्यवस्थित रूप उसे जरूर दिखाई देगा। किसी शिलान्यास पट्टिका के निर्माण और शिलान्यास समारोह पर जितना धन खर्च किया जाता है, उतने खर्च में कम से कम बीस गरीब परिवारों के लिए छत जुटाई जा सकती है। फिर ऐसे शिलान्यास जैसी व्यवस्था के प्रपंचों की संख्या तो वैसे भी बहुत ज्यादा है, जिसके आसपास ही तमाम बेघर लोगों की लाचारगी व्यवस्था को मुंह चिढ़ाती रहती है। धन के ऐसे प्रवाह को अगर गरीब परिवारों की तरफ मोड़ दिया जाए तो निश्चित ही इन परिवारों की छत और रोटी की समस्या हल हो सकती है। व्यवस्था के हामियों को इतनी-सी बात समझ क्यों नहीं आती!

अशांति केवल लूटपाट, कत्ल या बलात्कार की घटनाओं से ही व्याप्त नहीं होती। इसका कोई भी कारण हो सकता है। अब अगर यही देख लिया जाए कि गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है तो यह संख्या भी कुछ सवाल उठाती है। ये बेचैन करने वाले सवाल हैं। उन सवालों से भी कोई मानव-मन कभी तो अशांत होता होगा! जगह-जगह भीख मांगते लोगों को देख कर किसी मानव-मन में कभी तो हलचल मचती होगी! जब तक ऐसी परिस्थितियां बनी रहेंगी, ‘व्यवस्था’ पर सवाल भी उठेंगे। और जब तक ऐसे हालात कायम हैं तो फिर माहौल शांत कैसे रह सकता है! चीत्कार करती मानवता को देख कर जब तक कोई एक भी मानव-मन अशांत रहेगा, तब तक न तो शांति की परिभाषा ही पूरी होगी और न शांति का अस्तित्व परिपूर्ण कहला सकता है।

बहरहाल, कुछ दिन पहले फिर तेज धूप चमकी। अब मौसम बदल गया था। जहां मैंने सर्दी में ठिठुर रहे उस परिवार को देखा था, वहां अब भी एक परिवार था। शायद वही हो या कोई और! ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। आसपास ही ऐसे परिवार भी होंगे, जो गिनती में चार होंगे, लेकिन उनके घर में चौदह कमरे होंगे। यानी कहीं खुले आसमान के नीचे भी वक्त काटने की मुश्किल, तो कहीं ऐसे घर, जिनमें रहने वाले कम। बात है, तो बस इतनी-सी कि क्या उनका भी कभी मौसम बदलेगा, जिनकी सुबह बगैर छत के, खुले आसमान के नीचे शुरू होती है और फिर दिन रोटी की तलाश में या तो कूड़ा बीनने में चला जाता है या फिर कहीं सड़क किनारे खड़े या फिर लोगों के पीछे भागते-भागते भीख मांगते हुए कट जाता है। ‘व्यवस्था’ की नजर क्या कभी उन पर भी पड़ेगी!