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अपनी सफाई

रास्ते से गुजरने वाले लोगों को इससे काफी परेशानी होती है, फिर भी लोग मुंह बिचकाते हुए या नाक पर रूमाल रख कर रोजाना वहां से गुजरने के अभ्यस्त हो जाते हैं।
Author नई दिल्ली | April 4, 2016 01:56 am
स्वच्छ भारत अभियान के एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

सड़क पर गुजरते हुए एक दिन नाली में लगभग दर्जन भर बल्ब फेंके हुए दिखे। जिस सड़क के किनारे बनी नाली में ये बल्ब डाले गए थे, वह कॉलोनी में रहने वाले लोगों के आने-जाने का मुख्य मार्ग है। उस रास्ते से रोज हजारों लोगों का गुजरना होता है। इन लोगों द्वारा इस्तेमाल कर लेने के बाद रास्ते पर फेंकी गई वस्तुओं (खाद्य सामग्री के पैकेट आदि), सड़क के किनारे कतार में बनी हुई दुकानों, घरों और रेहड़ी-खोमचे वालों का कचरा जगह-जगह खुली हुई इस नाली में जाता है। यह कचरा जगह-जगह नाली में जमा होकर लोगों के घरों से निकलने वाले गंदे पानी के निकास को भी अवरुद्ध करता है। कचरे के ढेर से नाली भर जाने के कारण उसका बदबूदार गंदा पानी सड़क पर बहने लगता है। रास्ते से गुजरने वाले लोगों को इससे काफी परेशानी होती है, फिर भी लोग मुंह बिचकाते हुए या नाक पर रूमाल रख कर रोजाना वहां से गुजरने के अभ्यस्त हो जाते हैं।

खैर, नाली में फेंके गए बल्ब की तरह जो लोग घरों का कूड़ा इन खुली हुई नालियों में फेंक देते हैं, वे भी इन नालियों में जमा कचरे से उठती बदबू और नाली से बाहर बहते दूषित पानी से जरूर परेशान होते होंगे। लेकिन आखिर किन वजहों से किसी व्यक्ति को नाली में कचरा फेंकने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती। शायद इसकी मुख्य वजह यह है कि साफ-सफाई तो सबको पसंद है, लेकिन इसमें अपनी सहभागिता और जरूरत को आमजन केवल अपने घर तक सीमित रखते हैं। मौजूदा समय में लोगों का नजरिया निजी बनाम सार्वजनिक के खांचों में बंट चुका है, जहां निजी को बचाने की होड़ में सार्वजनिकता को तिलांजलि दे दी गई है। इसलिए लोग अपने घरों को निजी मानते हुए वहां की साफ-सफाई को तो अपनी जिम्मेवारी मानते हैं, लेकिन घर के आसपास और सड़कों पर बनी नालियों को, जो सभी लोगों की सुविधा के लिए बनाई गई हैं, केवल सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी मानते हुए वहां फैली और फैलाई गई गंदगी से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।

उधर सफाई कर्मचारी समय-समय पर गंदगी से बजबजाती इन नालियों में बिना सुरक्षा उपकरणों के नंगे बदन सफाई के लिए घुसते हैं। इस दौरान रास्ते से गुजरने वाले हर व्यक्ति की निगाह इन कर्मचारियों पर पड़ती है। लेकिन लोग अपनी आंखों से वह असामाजिक नजारा देखते हुए अपने-अपने गंतव्य की ओर चले जाते हैं। छाती और कभी-कभार तो गर्दन तक कचरे के ढेर से भरी इन नालियों को साफ करते हुए उन सफाई कर्मचारियों की मन:स्थिति क्या होती होगी, इस पर सोचने तक की स्थिति में हम खुद को नहीं रखना चाहते। जबकि काम करने की उनकी इस नारकीय परिस्थिति में कहीं न कहीं हमारी भी भागीदारी है।

लोग सफाई कर्मचारी को सफाई करने के बदले मिलने वाले मेहनताने का ताना मारते हुए उनसे यह उम्मीद तो करते हैं कि नालियों के भरने से पहले ही उनकी सफाई के लिए मौजूद रहें, लेकिन इतने कम समय में इन नालियों के भर जाने के उन कारणों से वे अनजान बने रहना चाहते हैं, जो जाने-अनजाने उनकी ही कारगुजारियों का नतीजा होते हैं। क्या उन बल्बों को नाली में फेंकने वाले व्यक्ति को इस बात का अंदाजा नहीं होगा कि नाली की सफाई के लिए उतरने वाले व्यक्ति के शरीर को कांच के टूटे बल्ब जख्मी भी कर सकते हैं? क्या इस काम के बदले मिलने वाली तनख्वाह और सरकार द्वारा सफाई उपकरणों को उपलब्ध न करवाने का बहाना हमें उनके कार्य करने की अमानवीय स्थिति के प्रति आंख मूंद लेने का हक दे देता है? अपने घर की चौहद्दी के बाहर फैली गंदगी से प्रत्यक्ष तौर पर हर व्यक्ति का जुड़ाव है, लेकिन इस गंदगी को फैलाने में सामूहिकता के चलते लोगों को अपनी खाल बचाने का मौका मिल जाता है।

देश की सीमा पर लड़ने वाले जवानों का सीधा जुड़ाव हमारे समाज से नहीं होता, इसलिए उसे सरकारी तंत्र और उच्च सैन्य अधिकारियों द्वारा नियंत्रित और निर्देशित करके उचित सफलता हासिल की जा सकती है। लेकिन जैसे ही वह सीमा से हट कर देश के भीतर किसी अशांत क्षेत्र में लोगों के बीच वहां की स्थितियों से निपटने के लिए जाता है तो समाज के सकारात्मक रुख पर ही उसकी सफलता निर्भर होती है। हमें यह समझना होगा कि ‘स्वच्छ भारत अभियान’ जैसे सरकारी कार्यक्रम और सफाई कर्मचारियों के भरोसे ही स्वच्छ भारत की परिकल्पना पूरी नहीं हो सकती। इसलिए हमें उन सफाई कर्मचारियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए खुद को भी सार्वजनिक जगहों पर गंदगी फैलाने से बचने की जिम्मेदारी उठानी होगी।

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  1. R
    raj kumar
    Apr 4, 2016 at 1:29 am
    सफाई के प्रति हमारा भी कर्त्तव्य हे . इसे शायद हम मानना नहीं चाहते ये शायद सभी घरों व् सभी शहरो की कहानी हे कम से कम उत्तर भारत की कहानी यही हे इसके लिए हमारी शिक्छा व्यवस्था भी जिम्मेदार है. हम अपना घर तो जातां से साफ रखते हैं पर घर से बहार हमारी मानसिकता में ये क्यों नहीं आता की शहर भी तो हमारा ही है . जितनी जिम्मेदारी सफाई कर्मचारियों की है उससे ज्यादा हमारी भी है मैने सड़क पर चलते हुए कार वालों को बोतल या खली रेपर जहांतहांफेंकते अक्सर देखता हूँ. तब लगता है की ये लोग कहा से सभ्य है सोचिये
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