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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी का लेख : रफ्तार का रोग

तेज रफ्तार से दौड़ रही जिंदगी में सभी तेजी से भागते नजर आते हैं। न किसी में सब्र है, न इंतजार करने की मानसिकता। कोई किसी के लिए रुकने को तैयार नहीं है।
लोग कहते हैं कि जल्दबाजी और हड़बड़ी की प्रवृत्ति बुढ़ापे में बढ़ती है। पर आजकल युवा ही ज्यादा जल्दबाजी करते दिखाई देते हैं।

तेज रफ्तार से दौड़ रही जिंदगी में सभी तेजी से भागते नजर आते हैं। न किसी में सब्र है, न इंतजार करने की मानसिकता। कोई किसी के लिए रुकने को तैयार नहीं है। आप हवाई जहाज, रेल, बस या लिफ्ट में जाने वालों पर गौर करें तो पाएंगे कि सभी को सबसे पहले चढ़ने और फिर सबसे पहले उतरने की जल्दी रहती है। लगता है कि दोनों के लिए कोई पुरस्कार मिलने वाला हो! सब जानते हैं कि न तो हवाई जहाज और न ही रेल या बस अपने गंतव्य से आगे जाएगी और सभी को उतरना है। फिर भी पहले चढ़ने और पहले उतरने की अफरातफरी में कई बार अप्रिय घटनाएं होती हैं। बच्चे, महिलाएं और वृद्ध लोग असहाय सब देखते रहते हैं।

यह उतावलापन यही दर्शाता है कि हम लोगों में एक दूसरे के प्रति सहानुभूति और सद्भावना तो दूर, सामान्य व्यवहार की नैतिकता का भी अभाव है। यहां तक कि सड़क पार करते वक्त भी लोग सबसे आगे आकर, बल्कि दूसरों को धकिया कर इस पार से उस पार जाना चाहते हैं। न वृद्धों की की चिंता है, न बच्चों की और न ही दुर्घटना का डर। सबसे आगे हो जाने की कोशिश में लोग बेवजह खतरा मोल लेते हैं। कतार में रहने और अपना नंबर आने का इंतजार करने की आदत कम लोगों में दिखती है।

लोग कहते हैं कि जल्दबाजी और हड़बड़ी की प्रवृत्ति बुढ़ापे में बढ़ती है। पर आजकल युवा ही ज्यादा जल्दबाजी करते दिखाई देते हैं। तो क्या वे समय से पहले बूढ़े हो गए हैं या फिर उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ गई है? फिर ऐसा क्यों है कि कोई किसी के लिए न तो रुकना चाहता है और न किसी को रास्ता देना चाहता है? निदा फाजली ने जब लिखा- ‘यहां किसी को कोई रास्ता नहीं देता, मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो…’ तो उनका इशारा जिंदगी के सफर और उसमें पनप रही तेज प्रतिस्पर्धा की तरफ ही था। उनका आशय यह कतई नहीं था कि लोग धक्का-मुक्की करें और जो सबको पटखनी दे दे, वही आगे बढ़ने का हकदार है।

चाहे कम शिक्षित हों या ज्यादा पढ़े-लिखे या फिर आधुनिक दिखने वाले संपन्न, अधिकतर लोग इसी मानसिकता के होते हैं कि जैसे और जितनी जल्दी हो, अपना काम करवा लें। बैंक, डाकघर या कहीं भी कतार में खड़े लोग इसी उधेड़बुन में रहते हैं। उन्हें इंतजार करना न पसंद है और न कबूल है। मैं समझ नहीं पाता कि पांच या दस मिनट पहले काम करवाकर वे क्या बचाते हैं। पान या चाय की दुकान पर घंटों यों ही बतियाने वाले लोग ऐसे पेश आते हैं, मानो वे अति-व्यस्त हों। दरअसल, सबसे पहले काम करवा लेने से समाज में रौब बढ़ता है, क्योंकि अपनी बारी का इंतजार करने वालों को दोयम दर्जे का माना जाता है और उन्हें हिकारत की नजर से देखा जाता है। बड़ों को देख कर बच्चे भी यही सीख लेते हैं।

यों इंतजार लगता है एक रूमानी खयाल की तरह कविता-शायरी तक सीमित होकर रह गया है। वरना इंतजार का भी अपना सुख है। वह इंसान क्या, जिसने कभी किसी का इंतजार ही न किया हो। मैं तो यही चाहता हूं कि जीवन में सभी को कभी न कभी किसी न किसी का इंतजार जरूर करना पड़े, तभी वह इंतजार की गहराई और उसके व्यापक असर को जान पाएगा। किसी शायर ने ठीक ही कहा है- ‘मुहब्बत इंजारे दायिमी का नाम है ऐ दिल, कोई आया तो क्या होगा, नहीं आया तो क्या होगा!’ पर असली जीवन में लगता है इंतजार, सब्र, दूसरों के प्रति संवेदना और लिहाज, सबका महत्त्व ही जैसे खत्म हो गया है।

अंग्रेजी में कहावत है- ‘शॉर्टकट कट्स द लाइफ शॉर्ट।’ गलत रास्ता या तरीके अपना कर छोटा रास्ता ढूंढ़ना, आगे निकलने का जुगाड़ करना और फिर इतराना दरअसल बेशर्मी का ही परिचायक है। नियमों और शिष्टाचार का खयाल रखते हुए इत्मीनान से काम करने वाले और दौड़-भाग से दूर रहने वाले अपवाद के रूप में ही मिलते हैं। सबसे पहले पहुंचने और हर मामले में खुद ही पहला व्यक्ति होने की प्रतिस्पर्धा में सभी तेजी से दौड़ रहे हैं। यह अंधी दौड़ हमें स्वकेंद्रित और खुदगर्ज बना रही है। कोई किसी के लिए रुकना नहीं चाहता। हम भूल जाते हैं कि जरूरी नहीं कि तेजी से आगे बढ़ता हुआ व्यक्ति सही अर्थों में अव्वल हो। आप मौके का इंतजार न करें, बल्कि मौके को आगे बढ़ कर झपटें। यह आक्रामक तेवर तो समझ में आता है कि खुद सक्रिय होकर अवसर का लाभ लें, लेकिन इसके लिए भागमभाग और किसी भी कीमत पर दूसरों से आगे ही नजर आने की कोशिश आत्मविश्वास की कमी और असुरक्षा के भाव को ही दर्शाती है। नियम-कायदों को धता बता कर आगे पहुंचने की कोशिश बड़ों को करते देख कर बच्चे भी वही बनते जा रहे हैं।

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