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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी का लेख : चाहा क्या हुआ क्या

दुनिया में ऐसे लोग गिने-चुने ही हैं, जिनके सपने और हकीकत एक हों। आप असंख्य संपन्न, सुखी और भौतिक रूप से संतुष्ट लोगों पर नजर डालें तो पाएंगे कि उनमें डॉक्टर, वकील, इंजीनियर और उद्योगपति धनाढ्य भी हैं।

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या तो खुद के हिसाब से दुनिया को बदलो या फिर दुनिया के हिसाब से खुद को बदलो। व्यक्ति के पास दो ही विकल्प हैं। या तो वह अपनी शर्तें जिंदगी पर लादे या जो शर्तें जिंदगी उस पर थोपती है, उन्हें स्वीकार करे। अपनी शर्तें जिंदगी पर लादने के लिए अतिरिक्त प्रतिभा, कौशल और प्रयास की जरूरत होती है। और जो यह कर पाते हैं, वे जीवन में जो चाहते हैं, वह प्राप्त करते हैं। वे कभी अपनी इच्छा और लक्ष्य से समझौता नहीं करते। वे तब तक नहीं रुकते, जब तक उन्हें उनका लक्ष्य नहीं मिलता। पर ऐसा कर पाने वाले और जो चाहते हैं, वह बनने वाले लोग बहुत कम होते हैं। अधिकांश व्यक्तियों को तो जो जिंदगी उन्हें बनाती है और जो भी मौके उन्हें मिल पाते हैं, उन्हीं से संतोष करना पड़ता है।

दुनिया में ऐसे लोग गिने-चुने ही हैं, जिनके सपने और हकीकत एक हों। आप असंख्य संपन्न, सुखी और भौतिक रूप से संतुष्ट लोगों पर नजर डालें तो पाएंगे कि उनमें डॉक्टर, वकील, इंजीनियर और उद्योगपति धनाढ्य भी हैं। उनके पास अकूत पैसा, सुखी परिवार, समाज में साख और ख्याति है। लेकिन उनमें से लगभग सभी के मन में दबा-छिपा असंतोष है। कोई गायक बनना चाहता था तो कोई मूर्तिकार तो कोई शिल्पी तो कोई खिलाड़ी। कुछ में पर्याप्त प्रतिभा भी थी तो कुछ में नहीं थी। लेकिन चूंकि पारिवारिक परिस्थितियों के कारण वे अपनी चाहत को लंबे समय तक जारी नहीं रख पाए, इस कारण उन्हें उसे बीच में ही छोड़ना पड़ा। किसी भी कला को आप कुछ दिन छोड़ देते हैं, तो वह आपको और ज्यादा समय तक और कभी-कभी तो हमेशा के लिए छोड़ देती है। हालांकि मैंने अनेक डॉक्टरों, प्राध्यापकों और पत्रकारों को पूरी तल्लीनता से अपने शौक पूरा करते देखा है। वरना साठ साल की उम्र में बच्चों को क्रिकेट खेलते देख कर उनके दादाजी का भी उनमें घुल-मिल जाना क्या दर्शाता है?

टेलीविजन पर आजकल ‘टैलेंट हंट’ का शोर है। बच्चे ही नहीं, चालीस या पचास के अधेड़ भी साहस के साथ उसमें शिरकत करते हैं। तलत महमूद, मोहम्मद रफी, मुकेश, मेहंदी हसन और बेगम अख्तर की गजलों को समारोहों और महफिलों में सुनाने वाले वही अधेड़ लोग हैं, जिन्हें बचपन में अच्छा गा पाने के बावजूद अपना शौक छोड़ कर जीवन से समझौता करना पड़ा। सभी सुखी और संपन्न हैं। लेकिन जो वे चाहते थे, वह बन नहीं पाने का असंतोष उन्हें इन महफिलों में आकर अपनी कला का प्रदर्शन करने को मजबूर करता है। प्रतिष्ठित, कामयाब और ऊंचे पद पर होने के बावजूद कोई अकेले या महफिल में बांसुरी बजाता है तो कोई गिटार या वायलिन या पियानो। कोई पेंटिंग करता है तो कोई मूर्ति गढ़ता नजर आता है। कोई न खेल पाने का अरमान पूरा करता दिखाई देता है तो कोई लेखकीय कार्य करता हुआ मिलता है।

आप आसपास नजर डालेंगे तो पाएंगे कि अधिकतर लोग ऐसे हैं जो बनना कुछ चाहते थे और बन कुछ और गए। मशहूर शायर शहरयार हॉकी के खिलाड़ी बनना चाहते थे, पर एक कामयाब शायर हो गए। मजरूह सुल्तानपुरी हकीम बनते-बनते शायर हो गए और मशहूर अभिनेता फारूख शेख कभी बाटा शू कंपनी में सेल्समेन हुआ करते थे। आपको विभिन्न क्षेत्रों में अनेक लोग ऐसे मिलेंगे जो अपनी ख्याति के बावजूद मानेंगे कि उनके जीवन में कहीं न कहीं कोई अभाव रह गया है, जो उन्हें भीतर से सालता है। विफल कवि का समीक्षक बन जाना कुंठा का नहीं, इसी प्रवृत्ति का परिचायक है। अनेक समीक्षक पहले भी कवि रहे हैं और अभी भी कविता लिखते हैं। फिल्मी दुनिया में भी ऐसे अनेक व्यक्ति हैं, जिनकी भूमिका बदलती रही है।

जो व्यक्ति किसी विशेष परिस्थिति में अच्छा काम करता है, वह किसी भी परिस्थिति की चुनौती बखूबी स्वीकार कर सकता है। क्रियात्मकता और सकारात्मक सोच जरूरी है। यह सच है कि व्यवस्था आदमी के लिए है, आदमी व्यवस्था के लिए नहीं। लेकिन जब भी बात तालमेल बैठाने की आती है, आदमी को ही व्यवस्था के साथ तालमेल बैठाना पड़ता है। यह इंसान की ही फितरत है कि वह हर परिस्थिति और व्यवस्था में रह पाने में सक्षम है। उसकी सोचने-समझने की शक्ति उसे संबल देती है। वह अपनी बदली हुई भूमिका को खेल के विकास के रूप में स्वीकारता है। लब्बोलुआब यह है कि हौसला वाले लोग जो चाहते हैं, आमतौर पर वह प्राप्त कर लेते हैं। बाकी लोगों के लिए अपनी सुख-सुविधाओं, सफलता और संपन्नता के बावजूद जिंदगी से समझौता कर लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यहां तक कि वे अपने पुराने शौक को भी भुला बैठते हैं।

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