खुद से हारे तो खुदकुशी - Jansatta
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खुद से हारे तो खुदकुशी

आत्महत्या की प्रवृत्ति किस कदर बढ़ रही है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने 2014 में हर घंटे पंद्रह खुदकुशी का रिकार्ड दर्ज किया था।

Author नई दिल्ली | January 28, 2016 12:02 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

आत्महत्या एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है। इसमें व्यक्ति को जिंदगी बोझ या कठिन लगने लगती है और वह खुदकुशी के बारे में सोचने और इस प्रक्रिया से लगातार गुजरने लगता है। आत्महत्या की प्रवृत्ति किस कदर बढ़ रही है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने 2014 में हर घंटे पंद्रह खुदकुशी का रिकार्ड दर्ज किया था। यानी हर साल एक लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं। इसका प्रमुख कारण है अत्यधिक तनाव। जब व्यक्ति अपनी उम्मीदों से हार जाता है, किसी खास से आहत होता है या फिर सामाजिक रूप से बेइज्जत होने पर और फिर सम्मान प्राप्त करने की उसकी सारी आशाएं खत्म हो जाती हैं, तब वह इस दिशा की तरफ बढ़ने लगता है। ऐसी स्थिति में उसे अपना जीवन व्यर्थ लगने लगता है और उससे उबरने के लिए आत्महत्या ही एक विकल्प दिखता है।

अभी हाल में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्रावास से निकाले जाने पर रोहित वेमुला द्वारा आत्महत्या का कदम उठाना भी सामाजिक बेइज्जती का ही एक उदाहरण है। एक दूसरी घटना में सोलह साल की तैराक चैंपियन सायरा ने, जो कि दिल्ली पब्लिक स्कूल गाजियाबाद की विद्यार्थी थी, कथित रूप से स्कूल की बस फीस नहीं दिए जाने और स्कूल प्रशासन द्वारा इसके लिए जोर देने पर आत्महत्या कर ली। न केवल पीड़ित, बल्कि आरोपी द्वारा भी आत्महत्या के कदम की खबरें सुनाई पड़ती हैं। दामिनी बलात्कार कांड के दोषी द्वारा जेल परिसर में आत्महत्या का कदम भी इसी प्रकार का उदाहरण माना जा सकता है।

न केवल सार्वजनिक अपमान के चलते लोग आत्महत्या की तरफ कदम बढ़ाते हैं, बल्कि व्यक्तिगत अपमान भी खुदकुशी के कारणों में शामिल होता है। पति या पत्नी का एक-दूसरे का विश्वास बरकरार न रखना, प्रेम में धोखा या माता-पिता, समाज या अभिभावकों के दबाव के कारण प्रेम में विफलता भी आत्महत्या की वजहों में शामिल है। विभिन्न स्तर की परीक्षाओं में विफलता या उसका डर, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में रैगिंग, बीमारी, व्यापार में घाटा या फिर किसानी से जुड़ी समस्याएं भी आत्महत्या का कारण बन जाती हैं। इतना ही नहीं, आदमी तब भी आत्महत्या करना चाहता है जब वह अपनी उम्मीदों पर खरा न उतरे और अपने अभिभावक और अपनों का सामना करने की हिम्मत उसमें बची न रह जाए। यानी अपने मान-सम्मान या प्रतिष्ठा के लोप का डर भी उसे आत्मघाती कदम को मजबूर करता है।

आत्महत्या वह भयावह प्रवृत्ति है, जो गरीब ही नहीं, अमीर, विचारक और अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ तक इसकी चपेट में आते रहे हैं। खुदकुशी करने वालों की सूची में कई विशेषज्ञों तक के नाम दर्ज हैं। हिटलर से लेकर कितने ही नामीगिरामी इस सूची में शामिल हैं। इसकी वजहें बहुत सारी हो सकती हैं, मगर सोचने वाली बात यह है कि आखिर इससे बचने का उपाय क्या है? जब व्यक्ति के जीवन में नकारत्मकता हावी हो जाए और वह अपना जीवन खत्म करने के बारे में सोचने लगे तो ऐसा क्या करने की जरूरत है, जिससे उसे बचाया जा सके। उसके अंदर सकारात्मकता का बीज कैसे बोया जाए कि फिर से वह जीवन को सुचारु रूप से चलाने को तैयार हो जाए।

समय चाहे कितना भी बदल गया हो, कितनी भी तीव्र गति से चल रहा हो, मगर सच्चाई, ईमानदारी और विश्वास आज भी अपनी जगह कायम है। झूठ, कपट और कैसे भी फायदा पाने का नुस्खा क्षणिक है, यह दूरगामी लाभ देने वाला नहीं है। हर किसी को अपने विस्तार के साथ ही अपनी सीमा का भी पता होना चाहिए और उसी हिसाब से खुद से और अपनों से वादा करना चाहिए। झूठा वादा अधिक दिन तक नहीं चलता और जब पता चलता है, तो विस्फोटक स्थिति हो सकती है। ऐसी विस्फोटक स्थिति से बचने के लिए सच का दामन न छोड़ें और कैसे भी हालत में इसे बनाए रखें। खासकर अपनों को बिल्कुल दगा न दें। साथ ही कुछ ऐसे साथी जरूर होने चाहिए, जिनके साथ आप कोई भी खुशी या गम बांट सकें और जरूरत पड़ने पर उससे मदद ले सकें। सच्चा साथी पाने के लिए सबसे पहले खुद भी सच्चा होना पड़ता है। जिनके जीवन में सच का साथ है, परिवार और दोस्तों का प्यार है, उनके पास कैसी भी कठिन स्थिति आए, वे इससे बच सकते हैं। आत्महत्या का शिकार तो हर्गिज नहीं हो सकते।

वैसे आत्महत्या के आंकड़ों और भयावहता को देखते हुए, इस भाव से पीड़ित व्यक्तियों को बचाने में समाज और सरकार द्वारा भी पहल की जा सकती है। प्रशासन द्वारा इसके लिए कोई हेल्पलाइन शुरू की जा सकती है। संबंधित व्यक्ति की काउंसलिंग या ऐसी सहायता की जा सकती है, जिससे उसमें जीवन के प्रति फिर से आशा का संचार हो।

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