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दुनिया मेरे आगेः आधुनिकता का परदा

हाल ही में दिल्ली में एक व्यक्ति सड़क हादसे में घायल हो गया तो कोई उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया। वह रात भर सड़क किनारे पड़ा तड़पता-कराहता रहा।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

राज वाल्मिकी

जिस दौर में देश और दुनिया हर पल तेजी से बदल रही है, हमारी रोजमर्रा की जिंदगी अत्याधुनिक तकनीकों पर निर्भर होती जा रही है, तब हमारे आसपास ऐसी घटनाएं घट रही हैं जिन्हें देख कर मन बेहद हैरानी और अफसोस से भर जाता है। ऐसा लगता है कि हम आधुनिक तकनीकी की दुनिया में गुम हैं और चुपके-से हमारी संवेदनाएं मरती जा रही हैं। हाल ही में दिल्ली में एक व्यक्ति सड़क हादसे में घायल हो गया तो कोई उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया। वह रात भर सड़क किनारे पड़ा तड़पता-कराहता रहा। एक युवक से जब पानी मांगा तो उसने उसकी जेब से बारह रुपए निकाल लिए और कहा कि कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता। उसका बाकी सामान भी कुछ लोग लेकर भाग गए।

किस पर भरोसा करें! एक खबर पढ़ कर भरोसे पर सवाल पैदा होने लगा कि किसी दस वर्ष की बच्ची से उसका मामा ही बलात्कार कैसे कर सकता है! एक दलित महिला ने बेगारी करने से मना किया तो उस पर जानलेवा हमला किया गया और नाक काट दी गई। गोरखपुर में भयानक लापरवाही की वजह से सत्तर से ज्यादा बच्चे मारे गए। देश की राजधानी में सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान सफाई कर्मचारियों की जान जा रही है। इतनी तेजी से घटनाएं और खबरें हमारे सामने आ रही हैं कि कई बार अचानक मन में सवाल उठता है कि हम आखिर किसी सभ्य समाज का हिस्सा होने का दावा कैसे कर पाते हैं!
यह सब कुछ हमारे सामने हो रहा है और हमारी संवेदनाएं हमें विचलित नहीं कर पा रही हैं। सफाई कर्मचारी आंदोलन के एक अध्ययन के मुताबिक केवल दिल्ली में सीवर में उतर कर गैस की चपेट में आने से पिछले तकरीबन तीन महीनों के दौरान तीन दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। 2013 में ही सरकार ने मैला साफ करने का निषेध करके इस काम में लगे लोगों के पुनर्वास के लिए कानून भी बना दिया है।

लेकिन आज भी अगर सीवर में उतरे लोगों की मौत की खबरें आम हैं तो इसके लिए कौन जवाबदेह है? रोजाना तकनीकी उपलब्धियों की कहानी दुनिया को सुनाते हुए हम उस वक्त क्या एक मिनट के लिए ठहर कर सोचते हैं कि आज भी सीवर की सफाई के लिए कुछ लोगों को बिना किसी सुरक्षा उपकरण के उसमें उतर कर क्यों जान गंवानी पड़ती है? कहां हैं हमारी वे तकनीकी ऊंचाइयां, जिनके जरिए हम मंगल या चांद पर जाने का दावा करते हैं! क्या यह सब इसलिए चलता रहा है कि सीवर में उतरने वाले लगभग सारे लोग समाज के सबसे कमजोर तबकों और जातियों के लोग होते हैं? हो सकता है कि खुद को सभ्य कहने-मानने वाले लोगों के मन में ये सवाल उठते हों, लेकिन सब कुछ जानते हुए भी आखिर क्यों चुप्पी छाई रहती है? हमारी संवेदनाएं क्यों सोई रह जाती हैं?
आधुनिक तकनीक ने हमारे जीवन की रफ्तार भी बहुत तेज कर दी है।

अब हमारे पास दूसरों के दुख-दर्द जानने, उनके दुख में शामिल होने या इंसानियत का इजहार करने के लिए समय नहीं है। बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी मोबाइल एक ऐसा प्रिय खिलौना बन गया है कि उसके लिए हमारे पास वक्त होता है। वाट्सऐप, फेसबुक या ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के मंच हमारा अधिकतर समय नष्ट कर देते हैं। पहले अगर किसी राह चलते व्यक्ति से कोई टकरा जाता था तो कोई दूसरा व्यक्ति कह देता था कि भाई, जरा संभल कर चलिए। अब तो कोई व्यक्ति सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल भी हो जाए तो हम यह सोच कर निकल जाते हैं कि कौन पुलिस थाने, अदालत और अस्पताल के चक्कर में पड़े। कहीं अस्पताल में प्रसव पीड़िता को बिस्तर नहीं मिला तो कहीं जमीन या रास्ते में ही प्रसव हो गया, तो कहीं शव ले जाने के लिए शव वाहन या एम्बुलेंस नहीं मिला। कई लोगों के अपने परिजन का शव खुद उठा कर ले जाने की खबरें सुर्खियों में आर्इं।

इसके अलावा, जिन माता-पिता ने हमें पाल-पोस कर बड़ा किया, किसी लायक बनाया, उनके वृद्ध होने पर वे हमें बोझ लगने लगते हैं। शहरों में फलते-फूलते वृद्धाश्रम इसके प्रमाण हैं। कई बार हमारे बुजुर्ग हमारी उपेक्षा के कारण बीमार होकर दवाइयों और उचित देखभाल के अभाव में जल्दी ही इस दुुनिया से विदा हो जाते हैं। मेरे लिए तो इस खबर पर यकीन करना भी मुश्किल हो रहा था कि एक अस्सी साल की बुजुर्ग महिला मुंबई के अपने घर में अकेले रहती थीं और उनका बेटा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अमेरिका में रहता था। लंबे समय बाद जब वह भारत आया और अपने घर में गया तो उसे वहां अपनी मां का कंकाल मिला। यानी वे अकेले में ही कब मर गर्इं, कब उनकी लाश सूख कर कंकाल बन गई, किसी को पता भी नहीं चला। आधुनिकता और जरूरत की दलील पर हमने इस तरह का समाज बनाया है!

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