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दुनिया मेरे आगे: नए दौर का पाठ

शिक्षा प्राप्त करने की सबसे मजबूत व्यवस्था है, अध्यापक और विद्यार्थी का वैयक्तिक संबंध, जो कि कक्षा में ही उचित तरीके से विकसित हो पाता है। कक्षा का स्वाभाविक शैक्षिक परिवेश बच्चे को मानसिक तौर पर आगे बढ़ने पर सहयोग करता है।

Author Published on: June 1, 2020 12:54 AM
घरों में ऑनलाइन पढ़ते बच्चे।

अंजलि ओझा
अमूमन हर दौर में नए तकनीकी संसाधनों ने मनुष्य को चकित किया है और बहुत कुछ करने की क्षमता भी दी है, लेकिन बुनियादी ढांचे की तमाम कमियों के कारण इसकी पहुंच और क्षमता पर सवाल भी उठते रहे रहे हैं। मसलन, फिलहाल देश भर में इंटरनेट की पहुंच और नेटवर्क की जैसी हालत है, उसमें ऑनलाइन शिक्षा का दायरा कितना व्यापक हो सकता है?

देश में करोड़ों परिवारों की जो माली हालत है, जीवन-स्तर है, अभावों की तस्वीर है, उसमें यह पद्धति कितने लोगों की पहुंच में होगी? अगर मौजूदा तस्वीर के रहते इस व्यवस्था को लागू किया जाता है, तो सिद्धांत और व्यवहार, दोनों स्तर पर इसकी सफलता पर संदेह बना रहेगा।

सामान्य और अब तक की व्यवस्था वाली शैक्षिक स्थितियों में अध्यापक और विद्यार्थी के बीच आमने-सामने जो पुख्ता संवाद होता है, उसका विकल्प आनलाइन व्यवस्था में शिक्षक-विद्यार्थी संवाद नहीं हो सकता। यह समझना जरूरी है कि सभी विद्यार्थियों का घरेलू वातावरण भी एक समान नहीं होता।

किसी के घर में पठन-पाठन के लिए वांछनीय शांतिपूर्ण स्थितियां मौजूद न हों तो शोर-शराबे के बीच कक्षा में ध्यान लगा पाना कठिन है। जबकि सामान्य स्कूली व्यवस्था में समूचा शैक्षिक वातावरण सभी बच्चों के लिए एक जैसा होता है, वहां कक्षा के संचालन के दौरान अन्य किसी गतिविधि का स्थान नहीं होता।

दरअसल, आनलाइन शिक्षा के महत्त्वाकांक्षी प्रारूप में सबसे बड़ी बाधा अधिकतर आबादी के पास जरूरी संसाधनों की अनुपलब्धता है। शिक्षा को सर्वसुलभ बना देना एक कल्याणकारी कदम है, लेकिन इन संसाधनों का ठीक तरह से उपयोग तभी संभव है, जब इसकी पहुंच सभी जरूरतमंदों तक हो। नए जमाने के इस शैक्षिक माध्यम के प्रयोग ने शिक्षक और विद्यार्थी के बीच संपर्क के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था जरूर दे दी है, लेकिन इससे विशाल स्तर पर भेदभाव भी पैदा होने की पूरी आशंका है।

पहले ही हमारी शिक्षा व्यवस्था सरकारी और कॉ़न्वेंट के बीच के शैक्षणिक स्तर के बंटे होने की समस्या से दो-चार है। भारत में अमीर के लिए अलग शिक्षा और गरीब के लिए अलग शिक्षा एक अघोषित व्यवस्था की तरह चल रही है। गरीबों के बच्चे सरकारी प्राथमिक स्कूलों में टाट-पट्टी पर बैठ कर पढ़ते हैं, तो अमीरों के बच्चे महंगे निजी स्कूलों की अच्छी कुर्सी और मेज पर बैठ कर पढ़ते हैं। इन भेदभावपूर्ण स्थितियों ने शिक्षा के पवित्र आंगन को धन के आधार पर बांट दिया है।

जाहिर है, आनलाइन शिक्षा प्रणाली में यह भेदभाव अपनी जटिल परतों के साथ बना रहेगा। वह भी इसलिए कि इस तरह की व्यवस्था में अच्छे मोबाइल फोन और इंटरनेट की सुविधा आमतौर पर अमीरों के पास ही उपलब्ध है। निचले पायदान पर खड़ी आबादी आज भी या तो ऐसे मोबाइल से दूर या फिर पुराने बटन वाले मोबाइल से काम चलाती है। कुछ लोगों के पास ऐसे मोबाइल हैं भी तो वे इसके प्रयोग को लेकर अभी उतने अभ्यस्त नहीं हैं।

फिलहाल दुनिया एक भय के सागर में डूबी हुई है। सामान्य मानवीय गतिविधियां फिर से सहज होने के इंतजार में हैं। सब कुछ ठहरे होने की स्थिति में शिक्षा की तस्वीर भी तकलीफदेह है। गोया इंसानी सभ्यता को किसी ने कस कर जकड़ रखा हो। हम सब इसी उम्मीद में हैं जब मौजूदा दौर से निकल कर फिर से सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन इस बीच यह चिंता बनी हुई है कि कोई विद्यार्थी ज्ञान की क्रमवार शृंखला से एक बार अलग हो जाए, तो पुराना शैक्षिक स्तर बना पाना जल्दी संभव नहीं हो पाता, इसलिए हर व्यक्ति के बीच एक निर्धारित दूरी बन जाने के इस दौर में अगर विद्यार्थियों को कोई शिक्षा से जोड़े रख सकता है, तो वह डिजिटल माध्यम ही है।

विश्व ने पर्याप्त प्रगति कर ली है। हर व्यक्ति के हाथ में पूरा संसार है। बस एक स्पर्श और दुनिया भर की कोई भी सूचना उसी क्षण सामने होती है। अब यह हम पर निर्भर है कि हम इस शक्ति का उपयोग किस तरह से करते हैं।

मेरी राय में शिक्षा प्राप्त करने की सबसे मजबूत व्यवस्था है, अध्यापक और विद्यार्थी का वैयक्तिक संबंध, जो कि कक्षा में ही उचित तरीके से विकसित हो पाता है। कक्षा का स्वाभाविक शैक्षिक परिवेश बच्चे को मानसिक तौर पर आगे बढ़ने पर सहयोग करता है। बच्चे में सामूहिकता का विकास होता है। उसकी शारीरिक गतिविधि बनी रहती है।

वह तमाम सामाजिक कौशलों को सीखता है। लेकिन परिस्थितियां जिस तेजी से बदल रही हैं, उसमें व्यवस्था भी शायद बदले। लेकिन एक लोकतांत्रिक समाज, सरकार और व्यवस्था को ऐसे इंतजाम करने होंगे, ताकि सबसे हाशिये पर जीने वाली आबादी भी उसमें अपनी जगह पा सके। अगर किसी नई व्यवस्था में कमजोर तबके अपनी पहुंच नहीं पाते या उससे बाहर हो जाते हैं, तो उस पर सवाल बना रहेगा।

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