ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः बराबरी की राह में

किसी भी क्षेत्र का विकास वहां का वातावरण, जमीन की उर्वरा-शक्ति, लोगों का जीवन स्तर, जनसंख्या का अनुपात, रोजगार की उपलब्धता और कार्य करने की क्षमता आदि पर निर्भर करता है।

प्रतीकात्मक फोटो

किसी भी क्षेत्र का विकास वहां का वातावरण, जमीन की उर्वरा-शक्ति, लोगों का जीवन स्तर, जनसंख्या का अनुपात, रोजगार की उपलब्धता और कार्य करने की क्षमता आदि पर निर्भर करता है। लेकिन जब जीने के उपलब्ध अवसर कम और जनसंख्या अधिक हो तो समाज में असंतुलन की स्थिति पैदा हो जाती है। इसी के बाद गरीबी की हालत और उसमें जीवन के लिए गलाकाट प्रतियोगिता सहित बहुत-सी विकृतियां हावी होने लगती हैं। सवाल है कि इसका समाधान क्या हो? हर साल ग्यारह जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में इस दिन को महत्त्व देने का एक प्रमुख उद्देश्य अपनी संपूर्ण आबादी को बेहतर जीवन-स्तर प्रदान करने की ओर बढ़ना और जनसंख्या नियंत्रण के उपायों पर जोर देना भी शामिल रहता है। मगर यह कैसे होगा?

मेरे खयाल से इन लक्ष्यों को सिर्फ भाषण और कागजों तक सीमित रखने से हासिल नहीं किया जा सकता है। जब तक इसमें महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जाए, तब तक हल अधूरा रहेगा। इसके लिए महिलाओं का सशक्तीकरण जरूरी है और इसके बीज तमाम घरों की बच्चियों की परवरिश में छिपे हैं। हम जानते हैं कि जीवन की शुरुआत से लेकर अंतिम दौर तक कम या ज्यादा लोग एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, मगर उम्र बढ़ने के साथ-साथ इसमें फासला आता है। इसीलिए बच्चों की परवरिश का एक महत्त्वपूर्ण पहलू उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए तैयार करना भी रहा है। इसमें बच्चों को अपने बल से न केवल उठना-बैठना या चलना सिखाना शामिल है, बल्कि अपने हित में जरूरी फैसले करने के लिए भी उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है।

HOT DEALS
  • Moto C Plus 16 GB 2 GB Starry Black
    ₹ 7999 MRP ₹ 7999 -0%
    ₹0 Cashback
  • Apple iPhone 6 32 GB Space Grey
    ₹ 27200 MRP ₹ 29500 -8%
    ₹3750 Cashback

मगर रुकावटें वहां आती हैं, जहां आत्मनिर्भरता की समझदारी में झोल आता है। विकास की परिभाषा जब स्त्री-पुरुष के लिए अलग-अलग रखी जाती है और उसका अभ्यास भी समाज में किया-कराया जाता है, तब भेदभाव और अंतर पैदा होना स्वाभाविक है। सच तो यह है कि पुरुष को आसमान और स्त्री को जमीन समझना जितना बुरा नहीं, उससे अधिक बुरा इसका परिणाम होता है जो हर समाज को झेलना पड़ता है। चूंकि महिला सृजनकारी होती है तो स्वभाविक रूप से वे जैसी होंगी, वैसी ही परिस्थितियां अपने आसपास पैदा करेंगी। इसलिए दोषपूर्ण परवरिश के नतीजे में आज भी समाज में महिलाओं की दयनीय हालत दिखाई पड़ती है। इसका असर उनके आसपास रहने वाले लोगों पर भी पड़ता है। सामान्य बात है कि जब तक वे सक्षम और स्वयं पर निर्भर नहीं होंगी, न उनका अपने बारे में सोचना आसान होगा और न वे अपने विवाह और बच्चे संबंधी जरूरी फैसले ही ले सकेंगी। आज अगर जनसंख्या तेजी से बढ़ती ही जा रही है तो उसके जड़ में यह कारण भी है कि अब तक महिलाएं अपने जीवन के बारे में फैसला ले पाने में सक्षम नहीं हुर्इं हैं।

दरअसल, महिलाओं को अब तक वह माहौल नहीं मिला कि पुरुष के बराबर या उससे ज्यादा घर-बाहर कहीं से भी पैसे कमा कर ला पाए और स्त्री-पुरुष के फर्क को समझना छोड़ दें। यही वजह है कि कहीं बेटे की आस में कई-कई बेटियां पैदा हो जाती हैं तो कहीं बेटियों को पैदा ही नहीं होने दिया जाता। मैंने ऐसे न जाने कितने पुरुषों को देखा है जो पत्नी पर तब तक बच्चा पैदा करते रहने का दबाव डालते हैं, जब तक बेटा न पैदा हो जाए। कन्या भ्रूणहत्या के पीछे प्रमुख रूप से यही कारण शामिल रहता है- अधिक बच्चा पैदा करना या फिर बार-बार गर्भपात। इससे महिला का शरीर कमजोर होता है, वह अलग से। ऐसे में जब तक दो या एक बच्चे का चलन नहीं बढ़ेगा, उनकी अच्छी देखभाल और बच्चे का बेहतर विकास संभव नहीं होगा। ऐसे में बेशक हम हर वर्ष विश्व जनसंख्या दिवस मनाते रहें, लेकिन जब तक जनसंख्या नियंत्रण में हम सफल नहीं होंगे, हमारे देश के लिए यह चिंता का विषय बना रहेगा। जैसा कि हम सब जानते हैं कि अपना देश चीन के बाद विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। चीन ने लंबे समय तक इसी जनसंख्या नियंत्रण के लिए एक बच्चे की नीति लागू कर दी थी।

कहने का आशय यह है कि सिर्फ विवेक से सफलता नहीं मिलती। जरूरत इस बात की है कि परिवार नियोजन की बेहतर और प्रगतिशील नीतियों के साथ-साथ बाल विवाह जैसी कुरीति खत्म करने के लिए महत्त्वपूर्ण पहल की जाए, ताकि महिलाएं शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्ण विकसित होने के बाद ही मां बने। पहल तो इस अर्थ में भी जरूरी है कि हर स्तर पर स्त्री-पुरुष के बीच बराबरी स्थापित हो, ताकि भेदभाव की स्थिति खत्म हो। इसके अलावा, इक्कीसवीं सदी के दौर में यह अंधविश्वास भी खत्म हो जाना चाहिए कि बेटा के हाथ से ही मोक्ष मिलेगा। जब तक महिलाओं की सोच और जीवन-स्थितियां नहीं बदलेंगी, वे सशक्त नहीं होंगी और विकास की राह में रुकावटें कायम रहेंगी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App