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जीवन के लिए जद्दोजहद

सड़क किनारे उस छोटी-सी इमारत के एक कमरे के बाहर दीवार पर लिखा था- ‘लोहार की दुकान’। वह छोटा कमरा र्इंट से कमजोर तरीके से जोड़ा गया लग रहा था, जैसे कि र्इंटों को एक के ऊपर एक रख दिया गया हो।

Author November 23, 2015 10:11 PM

सड़क किनारे उस छोटी-सी इमारत के एक कमरे के बाहर दीवार पर लिखा था- ‘लोहार की दुकान’। वह छोटा कमरा र्इंट से कमजोर तरीके से जोड़ा गया लग रहा था, जैसे कि र्इंटों को एक के ऊपर एक रख दिया गया हो। हालांकि यह इस दुकान के लिए कोई खास बात नहीं थी। लेकिन सच यह है कि उसके सामने से गुजरे तीन साल बीत गए हैं, लेकिन आज भी उसकी तस्वीर आंखों के सामने तैर रही है। यों जैसे कल की ही बात हो। दरअसल, उस दिन मैं आॅटो से दिल्ली विश्वविद्यालय के पास ही जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन की ओर जा रही थी। उसी दिन पहली बार मेरी नजर उस दुकान पर पड़ी थी। सड़क के दाहिने तरफ स्थित वह आधुनिकता के झोंके के बीच अपने अस्तित्व को बचाने की नाकाम कोशिश करती लगी थी। लेकिन उस ‘लोहार की दुकान’ के आसपास बनी आधुनिक परचून की दुकानें उसके बचे होने का ही एक अजीब और अविश्वसनीय दृश्य बना रही थीं। उस इलाके में उस जैसी कोई और दुकान दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रही थी। शायद इसीलिए वह दृश्य मेरी नजरों में ठहरा रह गया।
उसे देखते हुए मैं सोच रही थी कि आखिर कितने दिन और! कई तरह के खयाल दिमाग में आने लगे। कई सवाल उभरे कि आज की तारीख में नई पीढ़ी के कितने लोग ‘लोहार’ शब्द से परिचित होंगे और भट्ठी में तपती देह की मेहनत से तैयार औजारों या घरेलू उपयोग के सामानों की तैयारी के बारे में क्या लोग सोच भी पाते होंगे! आज आधुनिक तकनीकी के दौर में अपनी गुजर-बसर के लिए इस तरह की दुकानों से कितनी आमदनी हो पाती होगी? इस पर निर्भर लोगों के हालात क्या होंगे? आखिर किन वजहों से बाजार की चकाचौंध में टिके रहने के लिए की जाने वाली लगातार जद्दोजहद के बावजूद ऐसी दुकान चलाने वालों ने अपना व्यवसाय नहीं बदला या नया विकल्प नहीं चुना?
यह मुझे रुचि का प्रश्न कम लगता है। उससे ज्यादा यह दिल्ली जैसे शहर में किसी तरह टिके रहने और अपना अस्तित्व बचाने की गरज का मामला है। यह किसी व्यक्ति या समूह की आर्थिक सीमा या मजबूरी हो सकती है, जिसने उसे व्यवसाय बदलने की इजाजत नहीं दी हो। ‘लोहार की दुकान’ तो एक उदाहरण है। इस वर्ग के तमाम ऐसे लोग हैं जो इसी तरह की कशमकश में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
बहरहाल, ‘लोहार की दुकान’ के आसपास उसके समकक्ष कोई और दुकान नहीं दिखी, लेकिन शहर में अभी ऐसे लोगों की बड़ी तादाद है जो इस हैसियत और तकनीक वाले व्यवसाय पर निर्भर हैं जो आधुनिक तकनीकी के दौर में पिछड़ रहे हैं। बाजार ने उनके गुजारे के लिए कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। समाज ऐसे लोगों और उनके गुजारे के तरीकों को देखता है, सहानुभूति जताता है, लेकिन उसके लिए कोई कुछ करता नहीं। यानी कह सकते हैं कि वक्त के साथ और आधुनिक टेक्नोलॉजी से निर्मित वस्तुओं के युग में इनकी उपयोगिता धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। कपड़े सीने की दुकान यानी टेलरिंग और बुनाई जैसे काम अब अगर कहीं दिखते भी हैं तो किसी बड़े बाजार के कोने में सिमटे हुए। त्रासदी यह है कि अपनी इस रोजी-रोटी के साधन को वे आधुनिक तकनीकी में बदलना भी चाहें तो यह उनकी आर्थिक हैसियत के मद्देनजर इतना आसान नहीं। आर्थिक लाचारी और संसाधनों के अभाव में वे बाजार की प्रतियोगिता में फेल हो जाते हैं और उनका जीवन उलझ जाता है। आधुनिक मशीनों के सामने उनकी कला की सादगी और मौलिकता भी दम तोड़ देती है।
दूसरी ओर, दिल्ली जैसे महानगर में उन सभी व्यवसायों की सादगी और मौलिकता आभिजात्य प्रदर्शनियों में खूब सराही जाती है। ऐसे आयोजनों में टिकट की कीमत अगर कम भी हो तो लोग उधर का रुख नहीं करते। इसका कारण लोगों की रुचि में आया बदलाव है जो इन व्यवसायों और उत्पादों की मांग को कम कर रहा है। लेकिन एक सच यह भी है कि शहरों-महानगरों में ऐसी प्रदर्शनियों में लोक-शिल्प के नाम पर वस्तुएं काफी महंगी बेची जाती हैं, लेकिन उस कीमत के मुकाबले वास्तविक कलाकारों को बहुत कम पैसे दिए जाते हैं। यही वजह है कि एक ओर गुजारे और जीवन बचाने के लिए लोहारी या बढ़ईगीरी जैसे पेशे खत्म होते जा रहे हैं, दूसरी ओर पारंपरिक कला के नाम पर इन्हें संरक्षित पेशों की तरह देखा जाने लगा है। जाहिर है, वे तमाम लोग और समूह हाशिये पर जा रहे हैं जो परंपरागत रूप से अपने जीवन के लिए इन पेशों पर निर्भर थे। सरकार के पास घोषणा के लिए योजनाएं हैं, लेकिन उनका व्यावहारिक रूप ऐसा है कि वे वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंच ही नहीं पातीं।

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