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दुनिया मेरे आगेः पत्थर पे घिस जाने के बाद

जीवन में विषम परिस्थितियों से जब भी संघर्ष करना पड़ा, बड़े-बुजुर्गों से सुनी हुई इन पंक्तियों ने धीरज बंधाया- ‘रंग लाती है हिना पत्थर पे घिस जाने के बाद, सुर्खरू होता है इंसां ठोकरें खाने के बाद’।

प्रतीकात्मक तस्वीर

जीवन में विषम परिस्थितियों से जब भी संघर्ष करना पड़ा, बड़े-बुजुर्गों से सुनी हुई इन पंक्तियों ने धीरज बंधाया- ‘रंग लाती है हिना पत्थर पे घिस जाने के बाद, सुर्खरू होता है इंसां ठोकरें खाने के बाद’। आज इन्हीं पंक्तियों को याद करते-करते हिना यानी मेहंदी की जिजीविषा के बारे में सोचने लगा। विचारों में बहते-बहते मेहंदी के उन गुणों पर ध्यान गया जिन पर कभी गंभीरता से सोचा नहीं था। हथेलियों पर फूल खिला कर संपन्न से लेकर विपन्न तक, हर वर्ग की महिलाओं के जीवन में उत्फुल्लता का रंग भर देने वाली मेहंदी, स्वयं पिस कर सुर्खरू हो जाती है पर घर्षण का रोना नहीं रोती, आकर्षण के गीत गाती है।

बात संघर्ष से शुरू हुई है तो पहले मेहंदी की जिजीविषा को ही लें। पशुओं की पहुंच से बाहर रहने की तो उसकी हैसियत नहीं, पर कोई भी प्रहार करने के बाद पछताए जरूर, इसलिए वह कांटों का सुरक्षा कवच पहन लेती है। पहले शहरों में मेहंदी की झाड़ियों की बाड़ (हेज) आलीशान बंगलों को सजाती थी। अब खुली जगहों पर निरंतर आवासीय भवन बनते चले जाते हैं। सजावटी हेज बनती भी है तो नीलकांटे और कई विदेशी मूल की झाड़ियों से। पर मेहंदी है कि लुप्त होने के बजाय लोकप्रियता के नए शिखर चूमती जाती है। जितनी हृदयहीनता से उसकी झाड़ी नगरों-महानगरों से दूर की जा रही है, उतनी ही शिद्दत से वह गांवों से लेकर महानगरों तक को अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है। दिलचस्प यह कि अब उसकी पत्तियों को चुनने और पीसने का श्रम महिलाओं को नहीं करना पड़ता है।

तुरंता फार्मूले के इस युग में पेस्ट के रूप में प्लास्टिक के तिकोनों में मिलने वाली मेहंदी से शृंगार करने वाली महानगरीय युवतियां शायद उसकी झाड़ी पहचान भी नहीं सकेंगी। एक वर्गहीन समतावादी समाज की संरचना में लीन मेहंदी गलियों के नुक्कड़ पर उतनी ही शान से अधिकार जमाए दिखती है जितनी सहजता से वह महानगरों की भव्य दुकानों में प्रसाधन के महंगे से महंगे आयातित और देशज उपकरणों और सामग्रियों के साथ हिली-मिली दीखती है। किसी दयालु व्यक्ति या संस्था की संवेदना पर आश्रित गरीब कन्याओं के सामुदायिक विवाह में भी नववधू की हथेली पर मेहंदी सजती है और अतिसंपन्न घरानों की स्वयं गहनों से लदी दुल्हन की हथेली से लेकर बांह तक पर भी। अंत में सिर पर सवार होकर वह केशराशि भी रंग डालती है।
पाश्चात्य प्रसाधन सामग्रियों की बाढ़ में भारतीयता की पहचान लुप्त होती जा रही है। आलता लापता हो गया, महावर यायावर बन कर कहीं चली गई। भारतीय नारी की पहचान स्थापित करने वाली बिंदी को भी कामकाजी महिलाएं चिंदी-चिंदी करने के मार्ग पर हैं। उत्तर भारत में, विवाहिताओं के कई प्रतीक भी दूर जाने की तैयारी में है। लुप्त होते हुए पारंपरिकशृंगार साधनों के बीच मेहंदी की दिनोंदिन बढ़ती लोकप्रियता विस्मयकारी है।

साड़ी जैसा शालीन और सुंदर पारंपरिक परिधान कार्यालयों, कारखानों, अस्पतालों आदि में कार्यरत नारी के लिए असुविधाजनक होने के कारण अपनी लोकप्रियता खोकर, कम से कम शहरों में, पारंपरिक उत्सवों वाला परिधान बन कर रह गया है। उसकी जगह पहले सलवार सूट ने ली जो कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक महिलाओं के लिए सुविधाजनक परिधान के रूप में बहुत लोकप्रिय हो गया। और अब नगरों से लेकर कस्बों तक में जींस टॉप पहनने वाली पीढ़ी उसे भी त्याग कर पाश्चात्य परिधान को ही रोजमर्रा के कामकाजी जीवन में सबसे अधिक सुविधाजनक पाती है। अपनी पसंद का पहनना-ओढ़ना सही ही है। इसके बावजूद इस दौर में महिलाओं के बीच मेहंदी शृंगार की दिनोंदिन बढ़ती लोकप्रियता चौंकाती है। जींस टॉप में सुसज्जित सॉफ्टवेयर इंजीनियर लड़कियों की मेहंदी से सजी उंगलियां कंप्यूटर के कीपैड पर चलती या बैंक के कैश काउंटर वाली युवती की मेहंदी-सज्जित उंगलियां नोटों की गड्डियों पर थिरकती हुई दिखती हैं।

समाज को धर्म-जाति आदि के नाम पर बांटने के लिए क्या-क्या नुस्खे नहीं अपनाए गए। एक विशेष तरह की टोपी पहन लेने को, दाढ़ी रखने या न रखने को राष्ट्रीयता बनाम सांप्रदायिकता की तराजू में बैठा दिया गया। बस मेहंदी ही है जो हर तरह के परदे से बाहर निकली हथेलियों में भी सहजता से मुस्कराती नजर आती है और शॉर्ट पैंट पहन कर डेढ़-दो सौ रुपए वाला कॉफी का कप पकड़ने वाली युवा हथेलियों पर भी। अब केवल तीज, करवा चौथ और ईद पर ही मेहंदी के शृंगार के दिन लद गए। (बच्चन जी से क्षमायाचना के साथ) अब तो दिन को ईद, रात दिवाली रोज मनाती है मेहंदी।

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