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पग पग पर परीक्षा

सदियों पहले जब वर्तमान शिक्षा प्रणाली नहीं थी, तब भी गुरुकुलों में परीक्षा देनी पड़ती थी।

सांकेतिक फोटो।

देवेश मिश्रा

डर मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। सभी प्राणियों में डर विद्यमान है। डर का स्तर भले कम-ज्यादा हो सकता है, लेकिन डरते सभी हैं। परीक्षा का डर भी ऐसा ही डर है, जिससे नर्सरी में पढ़ने वाले बच्चे से लेकर विश्वविद्यालय के शोध छात्र तक भयभीत हो जाते हैं। अक्सर देखा जाता है कि परीक्षा से बचने के लिए छोटे बच्चे कई बहाने बनाते हैं। उन्हें परीक्षा न देनी पड़े, इसके लिए वे हर संभव प्रयास करते हैं। सारी शिक्षा प्रणाली इस तरह बनाई गई है कि बिना परीक्षा दिए और उसमें उत्तीर्ण हुए अगली कक्षा में दाखिला ही नहीं मिल सकेगा।

सदियों पहले जब वर्तमान शिक्षा प्रणाली नहीं थी, तब भी गुरुकुलों में परीक्षा देनी पड़ती थी। उस वक्त परीक्षा का स्वरूप आज से बिल्कुल ही अलग था। गुरुकुलों के अंतर्गत तीन प्रकार की शिक्षा संस्थाएं हुआ करती थी। पहला, गुरुकुल। यहां विद्यार्थी अपने गुरु के आश्रम में रह कर शिक्षा ग्रहण करते थे। दूसरा, परिषद। यहां विद्यार्थियों को विशेषज्ञों द्वारा शिक्षा दी जाती थी। तीसरा, तपस्थली। यहां विद्यार्थियों को बड़े-बड़े सम्मेलनों में भेजा जाता था, जहां विद्वानों द्वारा भाषण दिए जाते थे। विद्यार्थी जब सफलतापूर्वक तीनों चरण पूरा कर लेता था तब गुरु उसे दीक्षा दे दिया करते थे। तब परीक्षा को लेकर विद्यार्थियों में आज जैसा भय नहीं था। उस वक्त ज्ञान को तरजीह दी जाती थी।

लेकिन वक्त के साथ-साथ भारत में गलाकाट प्रतिस्पर्धा में परीक्षा में अव्वल आने की होड़ बढ़ने लगी। ऐसा बताया जाता है कि वर्तमान परीक्षा प्रणाली की परिकल्पना हेनरी फिसचेल नामक अमेरिकी व्यापारी ने उन्नीसवीं सदी के अंत में की थी। मूल्यांकन आधारित परीक्षा प्रणाली में समय के साथ थोड़े-बहुत बदलाव जरूर आए, लेकिन इसका स्वरूप पूरी तरह नहीं बदल पाया।

हमेशा आगे रहने की जिद ने परीक्षा को और अधिक डरावना बना दिया है। विद्यालय जाने से पहले ही बच्चे के मन-मस्तिष्क में अव्वल आने के बीज बो दिए जाते हैं। समय के साथ-साथ यह बीज बड़ा होकर एक विशाल वृक्ष बन जाता है। उस वृक्ष को अभिभावकों के साथ-साथ अध्यापकों द्वारा भी खाद-पानी दिया जाने लगता है। अक्सर देखा गया है कि कई बच्चे इस दौरान हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं। दसवीं और बारहवीं के परिणाम आने के दौरान अखबारों में बच्चों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या की खबरें आम हो जाती हैं। परीक्षा परिणाम का भय कई मासूमों को निगल लेता है।

भारत की एक बड़ी आबादी लगातार किसी न किसी परीक्षा से जुड़ी रहती है। नीट जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में तो पंद्रह लाख से ऊपर बच्चे बैठते हैं। संघ लोक सेवा आयोग में भी दस लाख से ज्यादा बच्चे प्रत्येक साल परीक्षा देने के लिए तैयारी करते हैं। ऐसे ही राष्ट्रीय और राजकीय स्तर पर तमाम परीक्षाएं होती रहती हैं। विद्यार्थियों के बीच इससे तनाव बढ़ता जा रहा है। हालांकि परीक्षार्थियों को तनाव मुक्त होकर परीक्षा देने को कहा जाता है। इसके लिए उनकी काउंसिलिंग भी की जाती है। पर क्या उन्हें इतनी आसानी से तनाव मुक्त किया जा सकता है?

कोरोना महामारी के दौरान जब पहली पूर्णबंदी हुई, तो कई विद्यार्थी बड़े शहरों में फंस गए थे। हमारे शहर की एक लड़की कोटा में फंस गई थी। वह वहां आइआइटी में दाखिला लेने के लिए तैयारी कर रही थी। कोरोना के प्रकोप से वह काफी डर गई थी। उसने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या पूर्व उसने एक पत्र में लिखा कि मैं खुद को संभाल नहीं पा रही हूं। परीक्षा को लेकर मेरी तैयारी बहुत कमजोर है। मैं फेल हो जाऊंगी। इसलिए मैं मरने का फैसला कर रही हूं। ऐसी अनेक घटनाएं होती हैं। आखिर ऐसी शिक्षा-व्यवस्था किस काम की, जो हमसे हमारा जीवन ही छीन ले?

परीक्षा का उद्देश्य बस यही है कि हमारा सतत मूल्यांकन हो सके। ताकि हमें यह पता चल सके कि हमें आगे बढ़ने से पूर्व किन-किन चीजों में सुधार करने की जरूरत है। मनुष्य सुधार कर के ही यहां तक की यात्रा पूरी कर सका है, आगे भी वह सुधार की बदौलत ही लगातार बढ़ सकता है। डर कर न तो सुधार हो सकेगा और न ही ठीक से परीक्षा दी जा सकेगी। परीक्षा के भय से मुक्ति तभी मिल सकेगी जब अभिभावक और अध्यापक इसकी असल अहमियत बच्चों को समझा पाएंगे। समाज को यह समझना होगा कि परीक्षा के अंक विद्यार्थी की काबिलियत के असल परिचायक नहीं हैं।

जीवन कोई प्रश्न-पत्र नहीं है जिसे लेकर हैरान-परेशान हुआ जाए। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हमारी प्रतिस्पर्धा किसी से नहीं है। यहां सबकी अपनी-अपनी यात्रा है। न कोई किसी से आगे है और न ही कोई किसी से पीछे। इसलिए किसी को भी पछाड़ने की जरूरत नहीं है। यात्रा का आनंद लेना जरूरी है।

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