रुका हुआ पहिया

कई महीनों बाद दो-तीन बच्चे सोसाइटी में साइकिल चलाते दिखे।

सांकेतिक फोटो।

कई महीनों बाद दो-तीन बच्चे सोसाइटी में साइकिल चलाते दिखे। देखा-देखी मेरी बेटी का भी साइकिल चलाने को मन मचला। अगले दिन वह भी अपनी साइकिल पर जमी धूल पोंछ और हवा भरवा कर मैदान में उतर गई। कुछ बच्चों को अब भी घर से बाहर खेलने की इजाजत नहीं मिली है। वे टीवी-कंप्यूटर और आॅनलाइन कक्षा के सहारे अपना दिन काट लेते हैं।

पिछले साल जब कोरोना के चलते पहली बार बंदी की घोषणा हुई तो गली-मुहल्लों में सन्नाटा पसर गया था। स्कूल-कॉलेज-दफ्तर सब बंद थे और लोगों के घरों से बाहर निकलने पर भी पाबंदी थी। हालांकि उसी बंदी में लाखों लोग मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों से पैदल, साइकिल, रिक्शा से चल कर अपने गांव पहुंचे थे। कुछ लोग पैदल चलते हुए धूप, भूख-प्यास के कारण अपनी जान भी गवां बैठे।

पिछले डेढ़ साल में बहुत कुछ बदल गया है। अधिकतर बच्चों की रंग-बिरंगी साइकिलें धीरे-धीरे कबाड़ में बदल रही हैं। दो साल में कुछ बच्चों को अपनी पुरानी साइकिल छोटी लगने लगेगी। जब कभी मैं दूसरी सोसाइटियों में जाता हंू तो हर अपार्टमेंट में बच्चों की दस-बीस रंगीन साइकिलें अनाथ-सी पड़ी दिखती हैं। लोग न तो उन्हें बेचते हैं और न किसी को देते हैं। साइकिल अगर चल नहीं रही है तो उसका क्या मतलब निकाला जाए?
कुछ लोगों को याद होगा कि कैसे पति-पत्नी मोटर साइकिल की सीट पर रख कर अपने बच्चे की पहली तिपहिया-दुपहिया साइकिल लाए थे! निश्चित रूप से जिन बच्चों के लिए वह साइकिल कभी शौक से खरीदी गई थी, अब या तो उन बच्चों का शौक नहीं रहा या साइकिल की वह उपयोगिता नहीं रही। मगर मां-बाप को वह दिन अब •ाी याद है।

वैसे साइकिल का इतिहास अधिक पुराना नहीं है। एक संभ्रांत जर्मन नागरिक कार्ल वॉन डरेस ने 1817 में दो पहियों की मदद से एक ऐसी मशीन बनाने की कोशिश की, जिस पर घोड़े की तरह सवारी की जा सके। इसका एक नाम बोन शेकर यानी हड््डी हिलाने वाली मशीन भी था। एक मॉडल में पीछे का पहिया आगे से बड़ा था। यूजीन मेयेर और जेम्स स्टारले के मॉडल में आगे वाला पहिया बड़ा और पीछे का पहिया छोटा था।

1860 के दशक में फ्रांस के पियरे लालमेंट, पियरे मिचोक्स और अर्नेस्ट मिचोक्स ने साइकिल का वह स्वरूप विकसित किया, जिसमें आगे के पहिए के साथ पैडल जुड़ा हुआ था। 1870 और 1880 के दशक में बड़े पहिए वाली साइकिल में लोगों की रुचि पैदा होने लगी। ऐसा कहा जाता है कि 1884 में एक अंग्रेज थॉमस स्टीवन ने बड़ी पहिए वाली साइकिल से दुनिया के कई देशों की यात्रा की थी। मगर इस साइकिल की लोकप्रियता में इसकी ऊंची सीट एक बाधा थी।

फिर 1885 में थॉमस स्टीवन के भतीजे जॉन केंप स्टारले ने दोनों पहियों को बराबर रखते हुए, चेन वाली एक सुरक्षित साइकिल बनाई। फिर आने वाले सालों में उसमें ब्रेक और टायर जुड़े। 1890 के दशक में कुछ ब्रिटिश लोग साइकिल लेकर भारत आए थे। 1960 के दशक से अपने देश में साइकिल हर शहर-गांव में दिखने लगी। अपने देश में 1970 से 1980 के दशक में मध्यवर्गीय खेतिहर परिवारों में साइकिल दहेज के रूप में दी जाने लगी। उन दिनों भी गांव में इक्का-दुक्का साइकिलें होती थीं।

उन दिनों साइकिल में हैंडल के साथ शीशा, घंटी, बच्चे के लिए आगे के डंडे पर छोटी सीट, पीछे कैरियर भी लगा होता था। कुछ लोग हैंडल के आगे एक टोकरी लगवाते थे, जिसमें रेडियो रखा जा सके और सफर में गाना सुना जा सके। साइकिल पर नाम लिखवाने और ताला लगवाने का •ाी रिवाज था। कुछ शौकीन लोग उसमें रंगीन झालर और बत्ती भी लगवा लेते थे। दशकों बाद अफगानिस्तान के काबुल में 2016 में मुझे बत्ती और झालर वाली साइकिल दिखी थी। वह एक चौकीदार की साइकिल थी। मैंने उसे चलाया भी। उन दिनों बच्चे साइकिल पहले कैंची चलाना सीखते थे, फिर सीट पर बैठ कर चलाते थे। छोटी साइकिल तब अधिक प्रचलन में नहीं थी।

अब साइकिल के अनेक प्रकार आ गए हैं। बाजार में पांच हजार से लेकर तीन लाख रुपए तक की साइकिलें मिलती हैं। पहले महिला और पुरुष की साइकिल अलग होती थी। अब अनेक रंग-रूप के विकल्प मौजूद हैं। हमारे एक दोस्त ने तीन साल पहले साइकिल से ही देश के सत्रह राज्यों का सत्ताईस हजार किलोमीटर का सफर तय किया था। अपने देश में उच्च पदों के लोगों का साइकिल से दफ्तर जाना तौहीन माना जाता है। पर ओस्लो, लंदन, वाशिंगटन जैसे शहरों में प्रोफेसर-डॉक्टर, अधिकारी भी साइकिल की सवारी करते हैं। जल्दी ही दिवाली आने वाली है। वर्षों से जो साइकिल चली नहीं है, उस पर धूल जम गई है, उसे साफ करें। आपको जरूरत नहीं है, तो जो महिलाएं आपकी सोसाइटी में काम करने आती हैं, उन्हें दे दें। किसी दूसरे बच्चे को दे दें। साइकिल के पहियों और जीवन, दोनों को चलते रहने दें।

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