आया ऋतुराज वसंत

चंचल भला हो लोककथाओं का, उनके मिथकीय चरित्रों और कथा के ताने-बाने का, जिसने समूचे समाज को उत्सवधर्मी बना दिया। हजारों-हजार साल से ये कथाएं जनमन में रची-बसी हैं, लोग उन्हें आज भी गाते हैं। इन कथाओं ने कुछ दिया हो या न दिया हो, लेकिन यह उस समाज की ऊंची उड़ान और कथा गढ़ने […]

चंचल

भला हो लोककथाओं का, उनके मिथकीय चरित्रों और कथा के ताने-बाने का, जिसने समूचे समाज को उत्सवधर्मी बना दिया। हजारों-हजार साल से ये कथाएं जनमन में रची-बसी हैं, लोग उन्हें आज भी गाते हैं। इन कथाओं ने कुछ दिया हो या न दिया हो, लेकिन यह उस समाज की ऊंची उड़ान और कथा गढ़ने की क्षमता को दर्शाता है। इनमें जड़-चेतन, जीव-जंतु सब अपने अस्तित्व के साथ साझेदारी करते हैं। यहां तक कि मौसम भी लपेटे में आ गया है। प्रकृति का ऐसा सुंदर गायन शायद ही किसी अन्य सभ्यता में मिले। तो लीजिए, एक कथा मौसम की सुनिए। वसंत की।

शिव मोक्ष याचक नहीं, अमर्त्य हैं। विष को अमृत बना कर ग्रहण करते हैं। यह वसंत उसकी कथा है। शिव को कामजित भी कहा जाता है। दक्ष की दो बेटियों में से एक का ब्याह शिव से हुआ था। दूसरी का कामदेव से। सती अपने पिता दक्ष के यहां यज्ञ के हवन कुंड में जल गई, क्योंकि दक्ष ने शिव को न बुला कर बहुत अपमानित किया था। शिव सती की काया लेकर निकले। मोह और माया की अद्भुत मिसाल इस कथा में है। शरीर गल कर गिरता है। वहां एक पीठिका स्थापित होती चलती है। शिव जब सती की काया से च्युत होते हैं, तो अपनी मोह-माया को मिटाने के लिए योग में चले जाते हैं।

ध्यान में बैठे इस योगी की अनुपस्थिति ने देवताओं को विचलित कर दिया। तय हुआ कि योगी को उठाने के लिए सौंदर्य के देवता कामदेव उन्हें अपने ढंग से विचलित करें। उधर हिमालय कन्या पार्वती उतावली हैं अपने पति शिव को पाने के लिए। कामदेव शिव को ध्यान से विचलित करने आ रहे हैं। यह तिथि है- माघ शुक्लपक्ष पंचमी। संधि काल है दो ऋतुओं का। शीत और ग्रीष्म का। सूर्य उत्तरायण हो चुके हैं। ताप का विस्तार हो रहा है। इस तिथि को वसंत पंचमी कहा जाता है।

काम देव चले हैं। वायु का वेग मंथर है, उसके ताप में खुनकी है। वनस्पतियों ने अपने वसन उतार दिए हैं, नई कोपलें आ रही हैं। कामदेव के स्वागत में अमराई में मंजरी ऐसे झांक रही है जैसे किसी मुग्धा की कंचुकी से झांकता कुच बाहर निकलने को व्याकुल हो। उसकी महक पर भंवरे भनभना रहे हैं। कचनार की कलियों ने मुंह खोल दिया है। कोयल की कूक से अमराई अंगड़ाई ले रही है। पपिहरा नदी किनारे बैठा विरहणियों को उकसा रहा है- पी कहां, पी कहां। वन में मोर पंख खोले पिहक रहा है। लोक इस निर्मल निश्छल मधुधारा में शामिल हो गया है। किसी खेत से किसी अधेड़ का कंठ खुलता है- ‘कहंवा बोले कोयलिया हो, कहंवा बोले मोर/ कहंवा बोले पपीहरा हो, कहंवा पिया मोर/ बगिया बोले कोयलिया हो, बनवा बोले मोर/ नदी किनारे पपीहरा हो, सेजिया पिया मोर।’

शिव और काम की कथा लोक में उतर कर उत्सव बन गई। कामदेव अपने पांचों वाण चलाते हैं- उन्माद, संतापन, शोषण, स्तंभन और सम्मोहन। शिव घायल होते हैं कामवाण से। बाहर आते हैं, तपस्या बाधित हुई है, ध्यान टूटा है। सामने पार्वती खड़ी हैं। पर यह हुआ कैसे? कारण और कारक बने कामदेव। शिव ने कामदेव को वहीं भस्म कर दिया। कामदेव की पत्नी रति आती है। विलाप करती है और पार्वती को श्राप देती है- कोख में कुछ भी नहीं पलेगा। और शिव से मांगती है अपने पति को। शिव भोले हैं, दयालु हैं, कामदेव को शरीर तो नहीं मिलेगा, लेकिन वह जिंदा रहेगा जब तक कि सृष्टि है। यह अनंग होगा। लेकिन हर शरीर में रहेगा। तबसे काम हर शरीर का देवता बना वहां विचरण कर रहा है।

लोक आज से मदनोत्सव में डूब जाता है। प्रकृति और पुरुष का अद्भुत उल्लास है यह उत्सव। इसे शृंगार मास भी कहते हैं। जो पति के साथ हैं, वे खुल कर खेलती हैं: ‘चलि चलअ अटरिया भाग पिया, बरसे कारी बदरिया/ अंटा चढ़त मोर कंठा टूट गे, सीढ़ी चढ़त भ हूक/ सेजिया चढ़त, मोर चोली मसक गे, होय गे जोबनवा क लूट/ अटरिया ऊंची…।’ प्रकृति, मन, उछाह रतिबंध का अद्भुत ताना-बाना दिखाई देता है इस लोकसंगीत में। आर्थिक तंगी और रेशम की चोली की ललक लेकर मुग्धा, नई नवेली ससुराल तो आ गई, लेकिन पति विदेश में है: ‘एक सुंदर नारि नगीना बनी अठ रंग है छवि नैन विशाल, आस मोर सैयां क लागि रहे ना आए।’ ‘रोय-रोय पाती लिखे अलबेलवा भेजय सुगना क बुलाय, जाय कहो मोर बांके बलम से बालम तोर सोक।’ ‘पिय पिय कहत पियर हम भइली, लोगवा जाने होयग रोग, बैदा अनाड़ी मरम ना जाने बालम तोर सोक।’

चैत तक चलता है यह मदनोत्सव। चैत आते ही चैता धुन आ जाती है। गिरिजा देवी के साथ में उस्ताद बिस्मिल्ला खां साहब की शहनाई पर एक चैता है: ‘चढ़त चैत चित लागे न रामा, बाबा के भवनवा… बीर बभनवा सगुनवा बिचारो कब होइहैं सैंया से मिलनवा हो रामा। बाबा के भवनवा…’

 

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