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दुनिया मेर आगेः छीजता एहसास

कुछ दिन पहले अपने मोबाइल का बिल अपने एटीएम कार्ड से अदा किया, लेकिन पैसा खर्चने का अहसास ही नहीं हुआ। न तो हाथों में रुपया था और न ही हाथ उठा कर रुपया दिया।
Author December 6, 2017 03:44 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

मनोज कुमार

कुछ दिन पहले अपने मोबाइल का बिल अपने एटीएम कार्ड से अदा किया, लेकिन पैसा खर्चने का अहसास ही नहीं हुआ। न तो हाथों में रुपया था और न ही हाथ उठा कर रुपया दिया। हवा में हवा से भुगतान कर दिया, तब भला पैसों का अहसास कैसे होता? बचपन से सुनता आ रहा था कि पैसा हाथ का मैल होता है। तब से अब तक इसका अर्थ समझने की कोशिश ही करता रह गया, लेकिन नहीं समझ पाया। शायद हाथों में पैसों से ज्यादा मैल थी, तो पैसों का अर्थ कैसे समझ आता। अब जब इ-मनी का दौर चल पड़ा है तो समझ में आया कि पैसा वाकई हाथों का मैल कैसे होता है। हम बचपन में दो रुपए भी अधिक खर्च कर देते थे या कोई महंगा सामान खरीदने की जिद करते, तो पिता की डांट का डंडा हमेशा तैयार रहता था। बढ़े खर्च पर कहते थे कि बाप की नहीं, आप की कमाई से खर्चोगे तो समझ में आएगा कि पैसे कित्ती मेहनत से कमाए जाते हैं।

यह सच आज पता चल रहा है। कमाई हो रही है लेकिन अहसास गुम होता जा रहा है। मुझे याद आता है कि एक दिन वह भी था जब अखबार की नौकरी में पहली दफा मुझे एक सौ अस्सी रुपए की तनख्वाह मिली थी। बात 1983-84 की है। इसके बाद बढ़ते-बढ़ते वेतन हजार रुपए तक पहुंच गया था। अनुभव बढ़ रहा था, तनख्वाह बढ़ रही थी और उधर अहसास भी बढ़ रहा था। लेकिन नकदी के बगैर भी लेन-देन होता है, यह पहली बार चेक से भुगतान देख कर जाना था। चेक से भुगतान मिलने लगा था। हमारे लिए पैसे का मतलब होता था सिक्के और नोट। मगर चेक देख कर जाना कि नहीं इस ‘माया’ के दूसरे रूप भी चलन में हैं। पहली बार चेक मुझे कागजों का खेल लगा था। चेक की भी सीमा थी, क्योंकि तब भी बैंक से कड़े-कड़े नोट मिलते थे चेक के बदले, जो हाथों को, जेब को और मन को भाते थे। अपने पास पैसा होने का अहसास होता था।

लेकिन आज के डिजिटलीकरण के दौर में रुपया पाने और देने का अहसास कम हो रहा है। हवा में पैसे आते हैं और हवा में ही खर्च हो जाते हैं। सुविधा की दृष्टि से इसे बेहतर कह सकते हैं लेकिन इस प्रणाली ने खर्च को बेतहाशा बढ़ाया है। नगद खर्च करते हुए रुपयों को गिनना, उन्हें देखना, मुट्ठी में भींचना, ज्यादा नोट होने पर फिर-फिर गिनना, सामने वाले को उससे बार-बार गिनवाना। यह सब जैसे खत्म हो गया है। बल्कि कई बार तो अंदेशा यह होता है कि जहां भेजना था, वहीं भेजा या दूसरी जगह चला गया। तब हमारी छोटी-मोटी भूल से बस इतना भर होता था कि हम सौ के बदले किसी को एक सौ दस का भुगतान कर बैठते थे, मगर अब तो हमारी छोटी चूक बड़े वारे-न्यारे कर देती है। एक गिनती इधर-उधर हुई नहीं कि पैसा गया कहीं का कहीं।

नई पीढ़ी तो इस भुगतान में महारत हासिल करती जा रही है। बात-बात पर मोबाइल और इंटरनेट के सहारे लेन-देन करने की उनकी आदत बढ़ गई है। कमाए गए पैसे इसी माध्यम से आते हैं और इसी माध्यम से चले जाते हैं। मैं उस दिन की कल्पना कर रहा हूं जब हर जगह इसी तरह का लेन-देन होगा। आज हम किसी की विदाई पर उसे सौ-पचास रुपए देते हैं, कहीं चढ़ावा चढ़ाते हैं, लेकिन वह दौर भी आएगा जब सब कुछ फोन के जरिए हो जाया करेगा। गुजरा जमाना लौट कर नहीं आता। और यह बात भी सही है कि इंसान तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ता है। जब मुद्रा का चलन नहीं था तब वस्तु-विनिमय होता था। हो सकता है कि किसी दिन मुद्रा पूरी तरह खत्म हो जाए और हमारे पास खूब रुपया भी हो, मगर हमें उसका अहसास न रहे। मगर अभी तो हमें अटपटा लग रहा है। हो सकता है कि हमारे बच्चों के बच्चों को ऐसा कुछ न लगे।

अब इस जमाने में कोई चवन्नी छाप नहीं बचा है। अठन्नी और रुपैया के मुहावरे भी एक दिन खत्म हो जाएंगे। चवन्नी छाप कहलाना तंज नहीं था बल्कि एक पहचान थी, एक ऐसी पहचान, जो सीधे अपनों से जोड़ती थी। यह भी तय है कि इ-मनी ने हमें मालामाल कर दिया है लेकिन चवन्नी खोकर हम कुछ कंगाल भी हो रहे हैं। हमारे पास शायद बहुत पैसा होगा लेकिन संवेदना का कोई बटुआ कहीं रीता न रह जाए। इ-मनी है, इ-बैंकिंग है, इ-मेल है, इ-पेमेंट है। अब तो छोटे-मोटे सौदा-सुलुफ भी इ-पेमेंट से हो रहे हैं। इस बाजार में भीड़ बढ़ रही है क्योंकि हम सब अब हवा से हवा में भुगतान कर रहे हैं। यह कितना फायदेमंद होगा या कितना नुकसानदेह? इस पर समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, मनोशास्त्री विचार करेंगे, लेकिन मेरे हाथों को बचपन से पैसे गिनने और रुपयों को छूने की आदत पड़ी हुई है, सो हमें तो बेचैनी होती है। लेकिन समय भाग रहा है और पीछे मुड़ कर देखने की उसकी आदत नहीं है।

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