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आईने की तरह सोनू के सवाल

आज सोनू के सवाल सामान्य होकर भी असामान्य क्यों लग रहे हैं? यह अपने आप में एक सवाल बना हुआ है।

रजत रानी मीनू

खबर के मुताबिक, ग्यारह साल का बालक गिड़गिड़ा रहा था- ‘सर, मुझे किसी प्राइवेट स्कूल या सैनिक स्कूल में दाखिला करवा दीजिए। मैं पढ़ना चाहता हूं। मेरे माता-पिता की हैसियत नहीं है कि वे मुझे पढ़ा सकें। वे दूध-दही बेचने का काम करते हैं, मगर पिता शराब पीकर सब पैसा बर्बाद कर देते हैं। मेरा भविष्य बर्बाद हो जाएगा। आप सबकी समस्या सुनते है, मेरी समस्या सुन लीजिए।’ सोनू नाम का बच्चा बिहार के मुख्यमंत्री के जनता दरबार में अपनी समस्या रख रहा था। उसका यह भी कहना था कि सब बड़े-बड़े नेताओं अफसरों के बच्चे पढ़ रहे हैं, मैं भी पढ़ना चाहता हूं। मैं जिस सरकारी स्कूल में पढ़ता हूं, वहां पढ़ाई बिल्कुल नहीं होती। सोनू ने दीपक नाम के एक शिक्षक के बारे में कहा कि उन्हें अंग्रेजी तक पढ़नी नहीं आती है। वे पढ़ते हुए गड़बड़ा जाते हैं। तब वे छात्रों को क्या और कैसे पढ़ाएंगे?

यह बच्चा देखने में छोटा-सा अवश्य है, मगर उसके सवाल जरूरी हैं। अगर हम इस बच्चे के सवालों और उसकी सामान्य-सी शिक्षा की मांग पर विचार करें तो उसने कुछ अलग नहीं कहा। बिहार सहित हिंदी प्रदेशों में शिक्षा की खस्ता हालत पिछले करीब पचास वर्षों से रही है। अब और भी अधिक बिगड़ती जा रही है। इस पर चिंताएं जाहिर होती रही हैं, मगर सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधरने के बजाय लगातार बिगड़ती जा रही है।

दूसरी तरफ शिक्षा का निजीकरण बहुत तेजी से हो रहा है। कुकरमुत्ते की तरह निजी स्कूल खुलते जा रहे हैं। यह सब एक दिन में नहीं हुआ है और न इससे शासन-प्रशासन अनभिज्ञ रहा है। सोनू की शिक्षा के प्रति जागरूकता और शिक्षा के प्रति उसकी जबरदस्त भूख को इस शैक्षिक व्यवस्था की खस्ता हालत का विस्फोट कह सकते हैं।

आज सोनू के सवाल दुनिया में चर्चा का विषय बने हुए हैं। कुछ लोगों ने कोशिश की है कि उसे ‘अवतारी’ बनाया जाए। मगर वह सामान्य बालकों से थोड़ा जागरूक और समझदार है। इसका कारण यह है कि वह खुद शिक्षक भी है। पांचवीं तक पढ़ा सोनू पांचवीं तक के पैंतीस बच्चों को पढ़ाता है। जब उससे पूछा गया कि तुम खुद इतने छोटे हो और अपनी उम्र के बच्चों को कैसे पढ़ाते हो, तो उसने बहुत ही सहजता से जबाव दिया कि मुझे जितना आता है, उतना पढ़ा देता हूं। बल्कि उसका कहना है कि वह आठवीं कक्षा तक के बच्चों को पढ़ा सकता है। उसने वजह बताई कि जिस तरह की पढ़ाई सरकारी स्कूलों में होती है, उस तरह की पढ़ाई वह करवा सकता हूं।

इस सबके बीच उसने भीड़ में खड़े एक बच्चे को बुलाया, जो सातवीं कक्षा का छात्र था। उसने उस बच्चे से पूछा कि बिहार के मुख्यमंत्री कौन हैं, तो बच्चा चुप रहा। उसने दूसरा सवाल पूछा कि बिहार के शिक्षा मंत्री कौन हैं तो इस पर भी वह बच्चा चुप रहा। उसने एक और बच्चे को बुला कर दस तक की गिनती पूछी। उस बच्चे को सोनू पढ़ाता भी है। उस बच्चे ने गिनती सुना दी।

दरअसल, सोनू बिहार की शिक्षा की तस्वीर दिखाना चाहता है। जब सोनू से पूछा गया कि पढ़ कर क्या बनना चाहते हो, तो उसने अपने लक्ष्य को बहुत ही साफ तौर पर बताया कि मुझे आइएएस बनना है। उसने आइएएस का मतलब भी बताया और उसकी ड्यूटी के बारे में भी। इसके अलावा यह भी कहा कि आइएएस पूरे जिले को देखते हैं। अगर अफसर ईमानदारी से अपना काम करें तो बिहार की शिक्षा व्यवस्था सुधर सकती है और भ्रष्टाचार दूर हो सकता है। देश का प्रधानमंत्री कौन है, राष्ट्रपति कौन है, कौन गृहमंत्री, कितने राज्य हैं, किस राज्य में कौन-कौन मुख्यमंत्री हैं जैसे सवालों के जवाब उसकी जुबान पर मानो पहले से मौजूद थे।

इस बच्चे के बात करने के तरीके से सभी चकित थे, लेकिन उसके सवाल हमारी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा पाठ्यक्रम पर भी सोचने को विवश करते हैं। शिक्षा की दशा ऐसी क्यों हो रही है, जिसमें विद्यार्थियों को तो छोड़िए, बहुत से शिक्षकों तक को कई सामान्य सवालों के जवाब पता नहीं। वे सामान्य राष्ट्रीय उत्सवों, जैसे 15 अगस्त और 26 जनवरी को उत्सव के तौर पर मनाने के कारण, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत में अंतर, के बारे में नहीं बता पाते हैं।

आज सोनू के सवाल सामान्य होकर भी असामान्य क्यों लग रहे हैं? यह अपने आप में एक सवाल बना हुआ है। सोनू ने कुछ अलग नहीं कहा। उसने वही कहा जो अभी तक सामान्य जनता कह रही थी और उसके सवालों को अनसुना किया जा रहा था। आज सोनू की चर्चा पूरे देश में अवश्य है, मगर उसका सवाल अकेले का न होकर इस देश के सभी बच्चों का है कि शिक्षा का अधिकार कानून के तहत उन्हें शिक्षा लेने का अधिकार है। फिर भी वे शिक्षा से वंचित हो क्यों हो रहे हैं?

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